हिमाचल के कचरा प्रबंधन के दावों पर एनजीटी को शक, ‘100 फीसदी निपटान’ पर उठे सवाल

एनजीटी ने हिमाचल सरकार के 100 फीसदी कचरा निपटान के दावे पर सवाल उठाते हुए दो सप्ताह में तथ्यात्मक रिपोर्ट पेश करने का निर्देश दिया है
प्रतीकात्मक तस्वीर: आईस्टॉक
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सारांश
  • एनजीटी ने हिमाचल प्रदेश के ‘100 फीसदी कचरा निपटान’ के दावे पर गंभीर सवाल उठाते हुए दो हफ्ते में तथ्यात्मक और सत्यापित रिपोर्ट मांगी है, जिससे राज्य के आंकड़ों की विश्वसनीयता पर संदेह गहरा गया है।

  • वहीं, एक अन्य मामले में दिल्ली सरकार ने रिपोर्ट में जानकारी दी है कि 2023 की बाढ़ के बाद यमुना के बाढ़ क्षेत्र की पहचान और सीमांकन की प्रक्रिया तेज कर दी गई है, संवेदनशील इलाकों में फ्लड वॉल बनाने, अतिक्रमण हटाने और जमीन पर चिन्हांकन का काम जुलाई 2026 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है।

हिमाचल सरकार द्वारा कचरा प्रबंधन को लेकर किए दावों पर सवाल खड़े हो गए हैं। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने राज्य की उस रिपोर्ट की विश्वसनीयता पर संदेह जताया है, जिसमें कहा गया था कि 16 शहरी निकायों में कचरा पैदा होने और उसके निपटान के बीच कोई अंतर नहीं है।

एनजीटी के अध्यक्ष न्यायमूर्ति प्रकाश श्रीवास्तव ने रिपोर्ट की विश्वसनीयता पर सवाल उठाते हुए कहा कि एनेक्सचर-6 में किया गया यह दावा—कि रोजाना उत्पन्न होने वाले करीब 100 फीसदी कचरे का निपटान हो रहा है, उसपर ‘विश्वास करना मुश्किल’ है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि रिपोर्ट में दिया गया चार्ट पढ़ने योग्य नहीं है। ऐसे में यह भी आंकड़ों की सटीकता और पारदर्शिता दोनों पर संदेह पैदा करता है।

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हिमाचल सरकार की ओर से पेश वकील ने रिपोर्ट की दोबारा जांच के लिए दो सप्ताह का समय मांगा, जिसे ट्रिब्यूनल ने स्वीकार कर लिया है। एनजीटी ने निर्देश दिया है कि मुख्य सचिव के एफिडेविट के साथ नई और तथ्यात्मक रिपोर्ट दो हफ्तों के भीतर दाखिल की जाए, जिसमें जमीनी हकीकत साफ तौर पर सामने आए। इस मामले में अगली सुनवाई 20 मई 2026 को होगी।

गौरतलब है कि यह रिपोर्ट 18 मार्च 2026 को शहरी विकास विभाग के विशेष सचिव द्वारा दाखिल की गई। ट्रिब्यूनल के 16 मार्च 2023 को दिए आदेश के मुताबिक, हर छह महीने में प्रगति रिपोर्ट मुख्य सचिव द्वारा सत्यापित रूप में पेश की जानी चाहिए थी।

हालांकि, इस बार दाखिल रिपोर्ट में कई खामियां सामने आई हैं, जिससे राज्य के कचरा प्रबंधन के दावों पर सवाल खड़े हो गए हैं।

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यमुना बाढ़ क्षेत्र की सीमांकन प्रक्रिया तेज, 2023 की बाढ़ के बाद सरकार सतर्क: रिपोर्ट

दिल्ली में 2023 की विनाशकारी बाढ़ के बाद अब यमुना बाढ़ क्षेत्र (फ्लडप्लेन) को चिन्हित करने की प्रक्रिया तेज कर दी गई है। 23 मार्च 2026 को दिल्ली सरकार ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि बाढ़ से निपटने और भविष्य के खतरे को कम करने के लिए कई अहम कदम उठाए गए हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक, सिंचाई एवं बाढ़ नियंत्रण विभाग ने जानकारी दी है कि दिल्ली में 2023 में आई बाढ़ के बाद, केंद्रीय जल आयोग (सीडब्ल्यूसी) के चेयरमैन की अध्यक्षता में एक संयुक्त बाढ़ प्रबंधन समिति (जीएफएमसी) बनाई गई थी।

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समिति को यह जिम्मेदारी दी गई कि वह मौसम से जुड़े पहलुओं का अध्ययन करे और हथिनी कुंड, वजीराबाद, दिल्ली के पुराने रेलवे पुल और ओखला बैराज पर पांच से 500 साल में एक बार आने वाली संभावित बाढ़ का अनुमान लगाए। इसके साथ ही, समिति को यमुना के इस हिस्से के महत्वपूर्ण स्थानों पर पांच से 100 साल में आने वाली बाढ़ के दौरान अधिकतम जल स्तर का आकलन करने का भी काम सौंपा गया था।

समिति ने अगस्त 2024 में अपनी रिपोर्ट सबमिट की। इसके बाद 100 वर्षों में एक बार आने वाली संभावित बाढ़ की सीमा तय की गई। इसके आधार पर जियोस्पेशियल दिल्ली लिमिटेड (जीएसडीएल) ने बाढ़ क्षेत्र के विस्तृत नक्शे तैयार किए।

समिति ने अगस्त 2024 में अपनी रिपोर्ट सबमिट की। इसके बाद 100 वर्षों में एक बार आने वाली संभावित बाढ़ की सीमा तय की गई।

18 अक्टूबर 2024 को यह जानकारी जियोस्पेशियल दिल्ली लिमिटेड (जीएसडीएल) को भेजी गई, ताकि वह एक मीटर के अंतराल पर जियो-कोऑर्डिनेट्स के साथ बाढ़ क्षेत्र के नक्शे तैयार कर सके। इसके लिए सर्वे ऑफ इंडिया से मिले डिजिटल सरफेस मॉडल (डीएसएम) आंकड़े भी साझा किए गए। हालांकि, सर्वे ऑफ इंडिया के आंकड़ों में कुछ गड़बड़ियां मिलने पर जीएसडीएलने उसकी जगह डिजिटल एलिवेशन मॉडल (डीईएम) आंकड़ों का इस्तेमाल किया।

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इसके आधार पर और केंद्रीय जल आयोग व संयुक्त बाढ़ प्रबंधन समिति की रिपोर्ट को ध्यान में रखते हुए जीएसडीएल ने 100 वर्षों में एक बार आने वाली बाढ़ की सीमाओं के नक्शे तैयार किए। ये नक्शे अब जमीन पर चिन्हांकन के लिए दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) को सौंप दिए गए हैं, और यह काम 31 जुलाई 2026 तक पूरा होने की उम्मीद है।

रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि मजनूं का टीला से निगम बोध घाट तक का ‘नीली छतरी’ इलाका सबसे ज्यादा संवेदनशील है। 2023 की बाढ़ में यहां पानी ऊपर से बह रहा था और भविष्य में भी ऐसा खतरा बना हुआ है। इसे देखते हुए इस पूरे हिस्से में बाढ़ रोकने के लिए दीवार (फ्लड वॉल) बनाई जाएगी। सीडब्ल्यूसी का तैयार किया गया मॉडल भी बताता है कि 100 साल में एक बार आने वाली बाढ़ के दौरान उस जगह पर ओवरटॉपिंग होने की संभावना है। इसे देखते हुए, सिंचाई एवं बाढ़ नियंत्रण विभाग मजनू का टीला से निगम बोध घाट तक के हिस्से में एक फ्लड वॉल बनाने जा रहा है।

वहीं डीडीए ने जानकारी दी है कि सिंचाई एवं बाढ़ नियंत्रण विभाग से ड्राइंग मिल गई है। ड्राइंग के आधार पर, रेवेन्यू डिपार्टमेंट के साथ मिलकर ग्राउंड ट्रुथिंग की जानी है। यह काम 31 जुलाई, 2026 तक पूरा होने की उम्मीद है। इसके साथ ही, बाढ़ क्षेत्र से अतिक्रमण हटाने का काम भी जारी है। मई 2022 से फरवरी 2026 के बीच करीब 1,426.6 एकड़ जमीन खाली कराकर डीडीए ने अपने कब्जे में ली है।

गौरतलब है कि नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने इस मामले में 22 अगस्त 2023 को टाइम्स ऑफ इंडिया में प्रकाशित एक खबर पर स्वतः संज्ञान लिया है।

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इस खबर में बताया गया था कि वजीराबाद से पल्ला तक यमुना के 22 किलोमीटर लंबे हिस्से में बाढ़ क्षेत्र में हुए अवैध निर्माणों के कारण दिल्ली में बाढ़ की स्थिति और गंभीर हो गई है। अब सरकार के इन कदमों को दिल्ली में भविष्य की बाढ़ से बचाव के लिए अहम माना जा रहा है, लेकिन असली चुनौती इन्हें जमीन पर तेजी और प्रभावी तरीके से लागू करने की होगी।

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