कचरा प्रबंधन पर सुप्रीम कोर्ट का सख्त अल्टीमेटम: “जमीनी तैयारी नहीं तो नए नियम भी बेअसर”

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि ठोस कचरा प्रबंधन के लिए आवश्यक बुनियादी ढांचा सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट रूल्स, 2026 के अनुसार सुनिश्चित किया जाना चाहिए
दिल्ली की सीमा पर सटे गाजीपुर लैंडफिल साइट पर आग में दहकता कचरे का पहाड़ ; फोटो: विकास चौधरी/सीएसई
दिल्ली की सीमा पर सटे गाजीपुर लैंडफिल साइट पर आग में दहकता कचरे का पहाड़ ; फोटो: विकास चौधरी/सीएसई
Published on
सारांश
  • देश में ठोस कचरा प्रबंधन की बदहाल स्थिति पर न्यायपालिका ने सख्त रुख अपनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा है कि सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट रूल्स, 2026 केवल कागजों तक सीमित नहीं रहने चाहिए और 1 अप्रैल 2026 से पहले जरूरी बुनियादी ढांचा तैयार करना अनिवार्य है।

  • भोपाल नगर निगम पर करोड़ों के पर्यावरणीय जुर्माने से जुड़े मामले में कोर्ट ने कई मंत्रालयों और वरिष्ठ अधिकारियों को पक्षकार बनाने के निर्देश दिए हैं।

  • वहीं दूसरी ओर, एक अन्य मामले में मध्य प्रदेश के मुलताई में दशकों से जमा ‘लीगेसी वेस्ट’ और अव्यवस्थित डंपिंग पर एनजीटी ने नगर पालिका से विस्तृत रिपोर्ट तलब की है। दोनों मामलों ने स्पष्ट कर दिया है कि कचरा संकट पर अब सिर्फ नियम नहीं, बल्कि तत्काल जमीनी कार्रवाई और जवाबदेही जरूरी है।

सुप्रीम कोर्ट ने ठोस कचरा प्रबंधन को लेकर सख्त टिप्पणी करते हुए 11 फरवरी, 2026 को कहा कि यह पक्का करना जरूरी है कि कचरा प्रबंधन के लिए जरूरी बुनियादी ढांचा वेस्ट मैनेजमेंट रूल्स, 2026 के नियमों के हिसाब से तैयार किया जाए।

यह मामला नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) की भोपाल स्थित केंद्रीय पीठ के दो अलग-अलग आदेशों से जुड़ा है। इन आदेशों में भोपाल नगर निगम पर पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति के तौर पर 1.8 करोड़ रुपए और 121 करोड़ रुपए का जुर्माना लगाया था। सुप्रीम कोर्ट ने इन्हीं दो सिविल अपीलों पर सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की है।

1 अप्रैल से लागू होंगे नए नियम

अदालत ने बताया कि पहले शहरों में ठोस कचरा प्रबंधन के लिए वर्ष 2000 के नियम लागू थे। बाद में इन्हें 2016 के नियमों से बदला गया। अब इनकी जगह सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट रूल्स, 2026 लाए गए हैं, जो एक अप्रैल 2026 से प्रभावी होंगे।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कानून और नियमों की व्यवस्था होने के बावजूद जमीनी स्तर पर कई कारणों से अपेक्षित परिणाम नहीं मिल रहे हैं।

bhoअदालत के अनुसार, हालांकि नए नियमों का आना एक अच्छा कदम है, लेकिन प्रशासन को इनके लागू होने से पहले सभी तैयारियां पूरी करनी होंगी। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि अगर प्रभावी तारीख से पहले जरूरी काम नहीं किए गए, तो 2026 के नियम भी जमीनी हकीकत नहीं बदल पाएंगे।

यह भी पढ़ें
कर्नाटक में गहराता कचरा संकट, हर दिन बिना उपचार के बच रहा 2,567 टन कचरा: रिपोर्ट
दिल्ली की सीमा पर सटे गाजीपुर लैंडफिल साइट पर आग में दहकता कचरे का पहाड़ ; फोटो: विकास चौधरी/सीएसई

कई मंत्रालयों और अधिकारियों को पक्षकार बनाने के निर्देश

न्यायमूर्ति पंकज मित्तल और न्यायमूर्ति एस वी एन भट्टी की पीठ ने भोपाल नगर निगम को निर्देश दिया कि वह इस मामले में केंद्र और राज्य सरकार के कई वरिष्ठ अधिकारियों को पक्षकार बनाए।

इनमें पर्यावरण मंत्रालय, आवास एवं शहरी कार्य मंत्रालय, पंचायती राज मंत्रालय के सचिवों के साथ-साथ मध्य प्रदेश के मुख्य सचिव और शहरी विकास विभाग के वरिष्ठ अधिकारी शामिल हैं।

नगर निगम को आदेश दिया गया है कि वह आवश्यक संशोधन कर अगली सुनवाई से पहले संशोधित दस्तावेज अदालत में पेश करे। इस मामले में अगली सुनवाई 19 फरवरी 2026 को होनी है।

सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी साफ संकेत देती है कि देश में कचरा प्रबंधन को लेकर अब सिर्फ नियम नहीं, बल्कि जमीनी कार्रवाई और ठोस तैयारी भी जरूरी है।

यह भी पढ़ें
दिल्ली में हर दिन पैदा हो रहा 11,000 टन से अधिक ठोस कचरा, स्वास्थ्य आपातकाल की बन सकता है वजह
दिल्ली की सीमा पर सटे गाजीपुर लैंडफिल साइट पर आग में दहकता कचरे का पहाड़ ; फोटो: विकास चौधरी/सीएसई

मध्य प्रदेश: मुलताई में ‘लीगेसी वेस्ट’ संकट पर एनजीटी की नजर, नगर पालिका से मांगी रिपोर्ट

मध्य प्रदेश के बैतूल जिले के मुलताई नगर में वर्षों से जमा कचरे के गंभीर संकट पर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने सख्त रुख अपनाया है।

12 फरवरी 2026 को एनजीटी ने मुलताई नगर पालिका परिषद से पूछा है कि शहर में सालों से कितना “लीगेसी वेस्ट” यानी पुराने कचरा जमा है। परिषद को यह भी बताना होगा कि रोजाना कितना कचरा पैदा हो रहा है। निपटान की वास्तविक क्षमता कितनी है, इसका भी आकलन करना होगा। साथ ही कमी (गैप) का विश्लेषण और उसे पूरा करने के लिए अब तक की गई व आगे की कार्रवाई पर विस्तृत रिपोर्ट पेश करने को कहा गया है।

आरोप: 50 वर्षों से हो रही कचरे की डंपिंग

आरोप है कि मुलताई के राजीव गांधी वार्ड में खसरा नंबर 957 की 2.225 हेक्टेयर भूमि पर 1972-73 से नगर पालिका परिषद का कब्जा है। इस जमीन का उपयोग लंबे समय से नगर निगम ठोस कचरे के लिए “ट्रेंचिंग ग्राउंड” यानी कचरा डालने की जगह के रूप में कर रहा है।

याचिका के अनुसार, मुलताई शहर में घर-घर जाकर हर दिन करीब छह टन ठोस कचरा एकत्र किया जाता है। लेकिन नगर पालिका की निपटान क्षमता इससे कम है। नतीजतन, बड़ी मात्रा में कचरा वर्षों से वहीं पड़ा है, जिसे “लीगेसी वेस्ट” के रूप में देखा जा रहा है।

यह भी पढ़ें
बंधवाड़ी डंपसाइट पर अभी भी कचरा डाल रहे हैं गुरुग्राम और फरीदाबाद: सीपीसीबी
दिल्ली की सीमा पर सटे गाजीपुर लैंडफिल साइट पर आग में दहकता कचरे का पहाड़ ; फोटो: विकास चौधरी/सीएसई

नियमों की अनदेखी और अव्यवस्थित डंपिंग

यह भी आरोप है कि नगर पालिका इस साइट पर बिना वैज्ञानिक प्रबंधन के कचरा डंप कर रही है। कचरे के पृथक्करण (सेग्रिगेशन), संग्रहण, परिवहन और सुरक्षित निपटान जैसे बुनियादी नियमों का पालन नहीं हो रहा।

एनजीटी के निर्देश के बाद अब नगर पालिका को यह स्पष्ट करना होगा कि मुलताई में कचरा प्रबंधन की वास्तविक स्थिति क्या है और वर्षों से जमा कचरे के पहाड़ को हटाने के लिए ठोस कदम कब उठाए जाएंगे।

Related Stories

No stories found.
Down to Earth- Hindi
hindi.downtoearth.org.in