कचरा संकट पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, 2026 नियमों के कड़ाई से पालन के दिए निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि कचरा प्रबंधन में अब ढिलाई नहीं चलेगी और हर स्तर पर जवाबदेही तय होगी।
प्रतीकात्मक तस्वीर: आईस्टॉक
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सारांश
  • देश में हर दिन पैदा हो रहे 1.7 लाख टन कचरे के बढ़ते संकट पर सख्त रुख अपनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2026 के कड़ाई से पालन के लिए राष्ट्रव्यापी निर्देश जारी किए हैं। अदालत ने साफ कर दिया है कि अब कागजी दावों से काम नहीं चलेगा—हर शहर, हर नगर निकाय और हर बड़े कचरा उत्पादक को तय समयसीमा में जवाबदेह होना होगा।

  • जिला कलेक्टरों से बुनियादी ढांचे का ऑडिट, फोटो प्रमाण सहित रिपोर्टिंग और 31 मार्च 2026 तक बड़े कचरा उत्पादकों की पूर्ण अनुपालना सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए हैं।

  • साथ ही, नगर निगमों की रैंकिंग सार्वजनिक पोर्टल पर जारी कर पारदर्शिता बढ़ाने का आदेश दिया गया है।

  • अदालत ने माना कि कचरे की प्रोसेसिंग अब भी बड़ी चुनौती है और वास्तविक स्थिति दावों से मेल नहीं खाती। 25 मार्च 2026 तक संयुक्त हलफनामा दाखिल करने के निर्देशों के साथ स्पष्ट संदेश है—अब ढिलाई नहीं, बल्कि जवाबदेही, पारदर्शिता और जमीनी कार्रवाई ही कचरा संकट का समाधान होगी।

देश में रोजाना 1.7 लाख टन कचरा पैदा हो रहा है, लेकिन उसका बड़ा हिस्सा आज भी ठीक से प्रोसेस नहीं हो पा रहा। इस गंभीर स्थिति पर चिंता जताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2026 के कड़ाई से पालन के लिए सख्त निर्देश जारी किए हैं।

अदालत ने साफ कहा कि अब सरकारों और स्थानीय निकायों को इन नियमों को लागू करने के लिए जरूरी तंत्र और जवाबदेही सुनिश्चित करनी होगी।

जनप्रतिनिधि बनेंगे बदलाव के अगुवा

अदालत ने निर्देश दिया कि नगर निकायों में पार्षद, मेयर, अध्यक्ष और वार्ड सदस्य स्रोत पर कचरा अलग करने (सेग्रीगेशन) से जुड़े जागरूकता अभियान की अगुवाई करेंगे।

साथ ही, पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय से सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्य सचिवों को ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2026 के पालन के लिए औपचारिक निर्देश जारी करने को कहा गया है।

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अब जिला कलेक्टर ठोस कचरा प्रबंधन की पूरी व्यवस्था का बुनियादी ढांचा ऑडिट करेंगे। वे तय समयसीमा में कमियों की पहचान कर रिपोर्ट मुख्य सचिव को भेजेंगे। साथ ही हर स्थानीय निकाय को यह बताना होगा कि वह नियमों का 100 फीसदी पालन कब तक सुनिश्चित करेंगे।

जिला कलेक्टरों को यह अधिकार दिया जाए कि वे अपने क्षेत्र में नगर निगम, नगरपालिका और ग्राम पंचायतों द्वारा ठोस कचरा प्रबंधन की पूरी व्यवस्था की निगरानी करें। यदि कोई स्थानीय निकाय नियमों का पालन नहीं करता है, तो इसकी रिपोर्ट राज्य और केंद्र स्तर के संबंधित विभागों को भेजी जाए।

स्थानीय निकायों को अपनी रिपोर्ट के साथ ईमेल के जरिए फोटो प्रमाण भी भेजने होंगे, ताकि यह साबित हो सके कि जमीन पर वाकई काम हुआ है। प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों को चार श्रेणियों - गीला, सूखा, सैनिटरी और विशेष देखभाल वाले कचरे के लिए जरूरी ढांचे को जल्द से जल्द तैयार कराने का निर्देश दिया गया है।

बड़े कचरा उत्पादकों को अल्टीमेटम

सर्वोच्च अदालत ने यह भी निर्देश दिया है कि सभी पहचाने गए बड़े कचरा उत्पादकों को तुरंत नियमों और सुप्रीम कोर्ट के आदेश की प्रति भेजी जाए। अदालत ने स्पष्ट किया कि 31 मार्च 2026 तक सभी बड़े कचरा उत्पादकों को पूरी तरह कानून के अनुरूप होना होगा।

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अदालत ने पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय को निर्देश दिया है कि वह देश के सभी बड़े नगर निगमों को उनके कामकाज के आधार पर श्रेणीबद्ध (रैंक) करे। यह रैंकिंग इस बात की तुलना करके होगी कि उन्होंने 2016 के ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियमों के तहत क्या उपलब्धियां हासिल की थीं, और 2026 के नए, ज्यादा सख्त नियमों के अनुसार वे कितना बेहतर काम कर रहे हैं।

यानि पुराने नियमों के मुकाबले नए नियमों के तहत उनका प्रदर्शन कितना मजबूत और प्रभावी है, इसकी जांच की जाएगी।

इन नतीजों को एक सेंट्रल ऑनलाइन पोर्टल पर सार्वजनिक किया जाएगा, ताकि आम लोग देख सकें कि कौन-सा शहर कितना अच्छा काम कर रहा है। इससे पारदर्शिता बढ़ेगी और नगर निगमों की जवाबदेही तय होगी।

25 मार्च तक दाखिल करना होगा हलफनामा

अदालत ने 25 मार्च 2026 तक अधिकारियों से संयुक्त शपथपत्र दाखिल करने को कहा है, जिसमें यह प्रमाणित किया जाए कि स्थानीय निकाय केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के पोर्टल पर पंजीकृत हैं। मटेरियल रिकवरी फैसिलिटी काम कर रही हैं। चार खंडों वाले कचरा वाहनों की व्यवस्था हो चुकी है और पर्यावरणीय मुआवजे के लिए एस्क्रो खाता बनाया गया है।

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इस मामले में अगली सुनवाई 25 मार्च 2026 को होगी।

चौंकाने वाले आंकड़े

सुनवाई के दौरान अदालत ने केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) द्वारा 2021-22 के लिए जारी वार्षिक रिपोर्ट का भी हवाला दिया। रिपोर्ट के अनुसार देश में हर दिन करीब 1.7 लाख टन ठोस कचरा पैदा हो रहा है।

इसमें से करीब 1.56 लाख टन इकट्ठा किया जाता है, करीब 91 हजार टन का उपचार होता है, जबकि 41 हजार टन सीधे लैंडफिल में जा रहा है।

न्यायमूर्ति पंकज मिथल और न्यायमूर्ति एस वी एन भट्टी की पीठ ने कहा, “स्थानीय निकाय जो दावा कर रहे हैं, वह जमीनी हकीकत से मेल नहीं खाता। भोपाल और इंदौर जैसे शहरों में कलेक्शन एफिशिएंसी में सुधार हुआ है, लेकिन प्रोसेसिंग अब भी बड़ी चुनौती बनी हुई है।”

अदालत ने माना कि जो कचरा प्रोसेस नहीं हो पाता, वह अक्सर लैंडफिल या पुराने डंपसाइट्स में ढेर होता जाता है। वहीं, जो कचरा न तो इकट्ठा होता है और न ही उसका सही रिकॉर्ड रखा जाता है, वह देश के लिए लगातार गंभीर चुनौती बना हुआ है।

कुल मिलाकर कहें तो सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश साफ संकेत देता है कि अब कागजी दावों से काम नहीं चलेगा। कचरा प्रबंधन में ढांचा, पारदर्शिता और जवाबदेही—तीनों अनिवार्य होंगे। अब देखना है कि राज्य और स्थानीय निकाय तय समयसीमा में इस सख्ती को जमीनी हकीकत में बदल पाते हैं या नहीं।

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