कचरा प्रबंधन में नहीं चलेगी लापरवाही: ‘बल्क वेस्ट जेनरेटर’ को देना होगा कचरे का पूरा हिसाब

21 अप्रैल 2026 को हुई सुनवाई में ट्रिब्यूनल ने स्पष्ट कर दिया कि ‘बड़े कचरा उत्पादकों’ को कचरे के वैज्ञानिक निपटान की जिम्मेदारी हर हाल में निभानी होगी
प्लास्टिक कचरे का जमा पहाड़, प्रतीकात्मक तस्वीर: आईस्टॉक
प्लास्टिक कचरे का जमा पहाड़, प्रतीकात्मक तस्वीर: आईस्टॉक
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सारांश
  • नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने 21 अप्रैल 2026 को हुई सुनवाई में पर्यावरणीय नियमों के सख्त पालन को लेकर दो अहम मामलों में व्यापक हस्तक्षेप किया। एक ओर ट्रिब्यूनल ने सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट रूल्स, 2026 के तहत बड़े कचरा उत्पादकों (बल्क वेस्ट जेनरेटर) की जिम्मेदारियों को स्पष्ट करते हुए कहा कि अब संस्थानों को कचरे के वैज्ञानिक निपटान और उसके पूर्ण रिकॉर्ड की जवाबदेही हर हाल में निभानी होगी।

  • इसी क्रम में भोपाल रेलवे स्टेशन जैसे बड़े सार्वजनिक संस्थानों से उनके द्वारा उत्पन्न ठोस और तरल कचरे की मात्रा, निपटान प्रणाली, अनुपालन स्तर और कमियों (गैप एनालिसिस) पर विस्तृत रिपोर्ट मांगी गई है।

  • ट्रिब्यूनल ने यह भी स्पष्ट किया कि नए नियमों में सर्कुलर इकोनॉमी और एक्सटेंडेड प्रोड्यूसर रिस्पॉन्सिबिलिटी को शामिल कर कचरा प्रबंधन को अधिक वैज्ञानिक और बाध्यकारी बनाया गया है, जबकि पहली बार लागू की गई एक्सटेंडेड बल्क वेस्ट जनरेटर रिस्पॉन्सिबिलिटी के तहत ऑन-साइट निस्तारण को प्राथमिकता और वैकल्पिक व्यवस्था के लिए प्रमाणपत्र अनिवार्य किया गया है।

  • दूसरी ओर, ट्रिब्यूनल ने केन और धसान नदियों में कथित अवैध खनन के मामले को गंभीर मानते हुए दो सदस्यीय संयुक्त समिति गठित करने का आदेश दिया है, जिसे मौके पर जाकर जांच कर छह सप्ताह के भीतर तथ्यात्मक रिपोर्ट और कार्रवाई की स्थिति प्रस्तुत करनी होगी।

  • आरोप है कि एक खनन कंपनी ने प्रतिबंधित इन-स्ट्रीम माइनिंग और अवैध अस्थायी मार्गों का उपयोग कर नदी के प्राकृतिक प्रवाह को बाधित किया, जिससे पर्यावरणीय नुकसान की आशंका बढ़ी है। इस मामले में संबंधित मंत्रालयों और राज्य एजेंसियों से भी जवाब तलब किया गया है।

  • कुल मिलाकर, इन दोनों मामलों में एनजीटी का सख्त रुख यह संकेत देता है कि अब न केवल कचरा प्रबंधन नियमों का पालन अनिवार्य होगा, बल्कि नदियों और प्राकृतिक संसाधनों के दोहन पर भी कठोर निगरानी और समयबद्ध कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी।

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट रूल्स, 2026 के पालन को लेकर कड़ा रुख अपनाते हुए बड़े कचरा उत्पादकों (बल्क वेस्ट जेनरेटर) की जवाबदेही तय करने की दिशा में अहम कदम उठाया है।

21 अप्रैल 2026 को हुई सुनवाई में ट्रिब्यूनल ने स्पष्ट कर दिया कि ‘बड़े कचरा उत्पादकों’ की श्रेणी में आने वाली संस्थाओं को कचरे के वैज्ञानिक निपटान की जिम्मेदारी हर हाल में निभानी होगी। इसी क्रम में पश्चिम मध्य रेलवे के अंतर्गत आने वाले भोपाल रेलवे स्टेशन की कचरा प्रबंधन व्यवस्था पर भी सवाल उठाए गए और उससे उत्पन्न ठोस व तरल कचरे के निपटान, क्षमता और नियमों के पालन की विस्तृत जानकारी मांगी गई।

‘बल्क वेस्ट जेनरेटर’ पर बढ़ी जवाबदेही

इस मामले में मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की ओर से बताया गया कि पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने नए सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट रूल्स, 2026 लागू कर दिए हैं, जो 2016 के पुराने नियमों की जगह लेते हैं।

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इन नए नियमों में सर्कुलर इकोनॉमी और एक्सटेंडेड प्रोड्यूसर रिस्पॉन्सिबिलिटी (ईपीआर) के सिद्धांतों को शामिल किया गया है। इसमें कचरे को सही तरीके से अलग करने और उसके वैज्ञानिक प्रबंधन पर खास ध्यान दिया गया है। साथ ही इसके तहत 20,000 वर्ग मीटर से अधिक क्षेत्र, रोजाना 40,000 लीटर से ज्यादा पानी की खपत करने, या हर दिन 100 किलो कचरा उत्पन्न करने वाली इकाइयों को ‘बल्क वेस्ट जनरेटर’ की श्रेणी में रखा गया है।

नए नियम: क्या बदला, क्या सख्त हुआ

नियमों में पहली बार एक्सटेंडेड बल्क वेस्ट जनरेटर रिस्पॉन्सिबिलिटी (ईबीडब्ल्यूजीआर) लागू की गई है, जिसके तहत बड़े कचरा उत्पादकों को अपने कचरे के निपटान की पूरी जिम्मेदारी उठानी होगी।

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उन्हें गीले कचरे का जितना हो सके अधिकतम निपटान उस साइट (ऑन-साइट) पर ही करना होगा या जहां ऑन-साइट प्रोसेसिंग मुमकिन न हो, वहां इसके लिए ईबीडब्ल्यूजीआर प्रमाणपत्र लेना अनिवार्य होगा।

सुनवाई के दौरान बताया गया कि पश्चिम मध्य रेलवे के अंतर्गत आने वाला भोपाल रेलवे स्टेशन भी ‘बल्क वेस्ट जनरेटर’ की श्रेणी में आता है। ऐसे में स्टेशन को भी सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट रूल्स 2026 का सख्ती से पालन करना होगा। इस तरह, एक बल्क जनरेटर के तौर पर, भोपाल रेलवे स्टेशन भी सॉलिड वेस्ट के निपटान के लिए जिम्मेदार है।

एनजीटी ने मांगी डिटेल रिपोर्ट

ट्रिब्यूनल ने रेलवे स्टेशन द्वारा उत्पन्न कुल कचरे, उसके निपटान के तरीके, नियमों के पालन में कमी (गैप एनालिसिस) और सुधार के लिए उठाए कदमों की विस्तृत जानकारी मांगी है। साथ ही, तरल कचरे (लिक्विड वेस्ट) के प्रबंधन, उसकी मात्रा और उपचार क्षमता को लेकर भी रिपोर्ट प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं।

कुल मिलाकर, इस मामले में एनजीटी का सख्त रुख साफ संकेत देता है कि अब बड़े कचरा उत्पादकों के लिए नियमों की अनदेखी करना आसान नहीं होगा। साथ ही उन्हें पर्यावरणीय जिम्मेदारियों से बचने की कोई गुंजाइश नहीं दी जाएगी।

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केन-धसान नदियों में अवैध खनन की जांच के आदेश, एनजीटी ने छह सप्ताह में मांगी रिपोर्ट

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) की केंद्रीय पीठ ने केन और धसान नदियों में कथित अवैध खनन के मामले को गंभीरता से लेते हुए दो सदस्यीय संयुक्त समिति गठित करने के निर्देश दिए हैं। आरोप है कि एक खनन कंपनी ने नदी के भीतर प्रतिबंधित खनन (इन-स्ट्रीम माइनिंग) किया और रेत परिवहन के लिए गैर-कानूनी तरीके से अस्थाई मार्ग (एक्सेस रोड) बना दिए।

इससे नदियों के प्राकृतिक प्रवाह में बाधा आई और पर्यावरण को नुकसान पहुंचा।

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एनजीटी ने 21 अप्रैल, 2026 को दिए अपने आदेश में समिति से मौके पर जाकर मामले की जांच करने और छह सप्ताह के भीतर तथ्यात्मक व क्या कुछ कार्रवाई की गई है उसपर रिपोर्ट सौंपने को कहा है।

इसके साथ ही, अदालत ने पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, मध्य प्रदेश सरकार, राज्य के खनिज संसाधन विभाग और मध्य प्रदेश राज्य पर्यावरण संरक्षण बोर्ड समेत अन्य एजेंसियों से इस मामले में जवाब तलब किया है।

यह मामला एक माइनिंग कंपनी ‘यूफोरिया माइंस एंड मिनरल्स’ से जुड़ा है। इस कंपनी पर आवेदक राज किशोर सिंह ने आरोप लगाया है कि उसने मध्य प्रदेश रेत (खनन, परिवहन, भंडारण और व्यापार) नियम, 2019 का खुला उल्लंघन किया है। एनजीटी ने स्पष्ट किया कि यदि आरोप सही पाए जाते हैं, तो जिम्मेदारों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।

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