

छत्तीसगढ़ में अवैध खनन के बढ़ते संकट पर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल की सख्ती ने साफ संकेत दे दिया है कि अब लापरवाही बर्दाश्त नहीं होगी। अदालत ने जहां रात में निगरानी बढ़ाने, बिना अनुमति खनन-परिवहन रोकने और उल्लंघन पर तुरंत कानूनी कार्रवाई के निर्देश दिए हैं।
वहीं मीडिया रिपोर्ट में सामने आया है कि कई मामलों में सिर्फ वाहन जब्त कर खानापूर्ति की गई, जबकि आरोपियों पर ठोस कार्रवाई नहीं हुई और कई केस फाइलों में ही दब गए। बिना सीमांकन खनन, अधूरी कार्रवाई और शिकायतों के बावजूद निष्क्रियता ने प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
ऐसे में असली चुनौती अब इन सख्त आदेशों को जमीन पर लागू करने की है, वरना पर्यावरणीय नुकसान और कानून की अनदेखी का सिलसिला यूं ही जारी रहेगा।
छत्तीसगढ़ में रेत और मुरुम के अवैध खनन पर लगाम लगाने के लिए नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने कड़ा रुख अपनाया है। 20 अप्रैल 2026 को दिए अपने आदेश में एनजीटी ने स्पष्ट कहा कि राज्य में सस्टेनेबल सैंड माइनिंग गाइडलाइंस 2016 और एन्फोर्समेंट एंड मॉनिटरिंग गाइडलाइंस 2020 का सख्ती से पालन सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
एनजीटी ने जिला प्रशासन को निर्देश दिए कि राज्य में कहीं भी बिना अनुमति के रेत का खनन या परिवहन नहीं होना चाहिए। इसके लिए खनन विभाग को विशेष रूप से रात के समय निगरानी बढ़ाने को कहा गया है, क्योंकि अवैध गतिविधियां अक्सर अंधेरे का फायदा उठाकर होती हैं।
रात में विशेष मॉनिटरिंग, बिना अनुमति खनन-परिवहन पर रोक
साथ ही, छत्तीसगढ़ पर्यावरण संरक्षण मंडल को नियमित निगरानी और नियमों के पालन की जिम्मेदारी सौंपी गई है। यदि कहीं भी अवैध खनन या परिवहन पकड़ा जाता है, तो अदालत ने तुरंत कानूनी कार्रवाई, मुकदमा दर्ज करने और पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति वसूलने के निर्देश दिए हैं। यह सख्ती ऐसे समय में आई है जब दैनिक भास्कर, रायपुर में प्रकाशित एक खबर में अवैध खनन और पर्यावरण नियमों के उल्लंघन को उजागर किया गया था।
9 नवंबर 2025 की इस रिपोर्ट में बताया गया कि 100 से ज्यादा मामलों में सिर्फ वाहन जब्त किए गए, लेकिन आरोपियों के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।
रिपोर्ट के मुताबिक, राज्य के कई जिलों में रेत, मुरूम और गिट्टी का अवैध खनन और परिवहन लगातार जारी है।
फाइलों में अटके मामले, रिकॉर्ड गायब होने के आरोप
हाल के दिनों में खनन विभाग ने कई वाहन तो पकड़े, लेकिन मामलों को आगे बढ़ाने में ढिलाई बरती गई। आरोपियों के खिलाफ आगे कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। कई केस फाइलों में ही दबकर रह गए, और कुछ तो रिकॉर्ड से ही गायब होने की भी बात सामने आई।
स्थिति तब और चिंताजनक हो जाती है जब नई रेत खदानों की नीलामी के बीच ही, बिना सीमांकन के खनन शुरू कर दिया गया। नियमों के अनुसार, खदान की स्पष्ट सीमाएं तय होने के बाद ही खनन होना चाहिए, लेकिन इस प्रक्रिया की खुलेआम अनदेखी की जा रही है।
सिंगारभाठा गांव का मामला भी इसी लापरवाही की मिसाल है, जहां अवैध मुरूम खनन के खिलाफ कार्रवाई तो हुई, लेकिन घटना के बाद कोई एफआईआर दर्ज नहीं की गई। स्थानीय लोगों का आरोप है कि लगातार खनन के चलते इस जगह को माफिया ने तालाब में बदल दिया है।
याचिका में आरोप लगाया गया है कि ग्रामीणों और जनप्रतिनिधियों की शिकायतों के बावजूद न तो वाहन मालिकों को पूछताछ के लिए बुलाया गया और न ही कोई मामला दर्ज हुआ, जिससे प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
हालांकि, राज्य सरकार की ओर से अदालत में पेश वकील ने अदालत को जानकारी दी है कि खनन विभाग ने कार्रवाई शुरू कर दी है। माइनिंग डिपार्टमेंट से मिली जानकारी के मुताबिक वित्त वर्ष 2025-26 में अवैध मुरूम खनन के 28 और अवैध परिवहन के 106 मामले दर्ज किए गए।
नियमों के तहत जुर्माना भी वसूला गया है, केस दर्ज किए गए और आरोपियों को न्यायिक हिरासत में भेजा गया, जिन्हें बाद में जमानत पर रिहा कर दिया गया।
देखा जाए तो एनजीटी के सख्त निर्देशों ने साफ कर दिया है कि अब अवैध खनन पर किसी भी तरह की ढिलाई बर्दाश्त नहीं की जाएगी। लेकिन असल चुनौती इन आदेशों को जमीन पर उतारने की है। अगर प्रशासन ने गंभीरता नहीं दिखाई, तो पर्यावरण को हो रहा नुकसान और कानून की अनदेखी दोनों ही जारी रहेंगे।