

कभी उदयपुर की जीवनरेखा रही आयड़ नदी आज कंक्रीट, कचरे और सीवर के दबाव में अपनी पहचान खोती जा रही है।
एनजीटी के समक्ष प्रस्तुत एमिकस क्यूरी की रिपोर्ट बताती है कि नदी का प्राकृतिक स्वरूप तेजी से नष्ट हो रहा है। नदी के किनारों, बाढ़ क्षेत्र और तल पर बड़े पैमाने पर कंक्रीट बिछाने से उसकी जल वहन क्षमता और भूजल रिचार्ज की क्षमता गंभीर रूप से प्रभावित हुई है।
दूसरी ओर, ठोस कचरा और बिना उपचार का सीवर सीधे नदी में गिर रहा है, जिसका प्रदूषित पानी उदयसागर झील तक पहुंचकर पूरे पारिस्थितिकी तंत्र के लिए खतरा बन चुका है।
रिपोर्ट केवल आयड़ नदी की बदहाली तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे राजस्थान में ठोस और तरल कचरा प्रबंधन की गंभीर कमियों को भी उजागर करती है। हजारों टन ठोस कचरे के वैज्ञानिक निपटान और करोड़ों लीटर सीवेज के उपचार की पर्याप्त व्यवस्था अब भी नहीं है, जबकि कई शहरी निकायों के पास आवश्यक बजट और बुनियादी आंकड़े तक उपलब्ध नहीं हैं।
यह रिपोर्ट स्पष्ट चेतावनी देती है कि यदि नदियों के प्राकृतिक स्वरूप, जल स्रोतों और वैज्ञानिक कचरा प्रबंधन को प्राथमिकता नहीं दी गई, तो पर्यावरणीय संकट और अधिक गहरा होगा तथा आने वाली पीढ़ियां स्वच्छ नदियों और सुरक्षित जल संसाधनों से वंचित हो सकती हैं।
कभी उदयपुर की पहचान और जीवनधारा रही आयड़ नदी आज कंक्रीट, कचरे और सीवर के बोझ तले दम तोड़ती नजर आ रही है। राजस्थान में पर्यावरणीय स्थिति पर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) के समक्ष 13 जुलाई 2026 को प्रस्तुत एमिकस क्यूरी की टिप्पणी में नदी की बदहाल तस्वीर सामने आई है। गौरतलब है कि आयड़, बेराच नदी की ही एक सहायक धारा है।
रिपोर्ट के अनुसार, उदयपुर शहर से गुजरने वाली आयड़ नदी के कई किलोमीटर लंबे हिस्से में भारी मात्रा में ठोस कचरा और सीवर का गंदा पानी बह रहा है। इससे भी अधिक चिंताजनक बात यह है कि नदी के प्राकृतिक किनारों, बाढ़ क्षेत्र (फ्लडप्लेन) और तल के आसपास के हिस्सों को बड़े पैमाने पर कंक्रीट से ढक दिया गया है। इस अंधाधुंध तरीके से बिछते कंक्रीट ने नदी की प्राकृतिक बनावट को नष्ट कर दिया है।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि प्राकृतिक रूप से जल सोखने वाले किनारों के खत्म होने और बहाव का रास्ता संकरा होने से नदी की जल वहन क्षमता गंभीर रूप से घट गई है। ऐसी स्थिति में नदी न तो सामान्य रूप से बह सकती है और न ही भूजल को रिचार्ज कर सकती है।
सबसे बड़ी चिंता यह है कि यही प्रदूषित पानी सीधे उदयसागर झील में पहुंच रहा है, जिससे झील के पारिस्थितिकी तंत्र पर भी गंभीर खतरा पैदा हो गया है।
राजस्थान में कचरा और सीवर प्रबंधन की तस्वीर चिंताजनक
रिपोर्ट में केवल आयड़ नदी ही नहीं, बल्कि पूरे राजस्थान में ठोस और तरल कचरे के प्रबंधन में मौजूद गंभीर खामियों को भी उजागर किया है।
राजस्थान के 309 शहरी स्थानीय निकायों (यूएलबी) में हर दिन 4,392.52 टन ठोस कचरे के वैज्ञानिक निपटान की व्यवस्था नहीं है। यह कचरा हर दिन पुरानी डंपिंग साइट्स (लीगेसी वेस्ट साइट्स) में जमा हो रहा है, जिससे प्रदूषण लगातार बढ़ रहा है। इसी तरह, 76 शहरी स्थानीय निकायों में हर दिन 102.1 करोड़ लीटर तरल कचरे (सीवेज) के उपचार की क्षमता का अभाव है। राज्य में हर दिन कुल 228.1 करोड़ लीटर सीवेज पैदा हो रहा है।
यह भी सामने आया है कि राजस्थान में 230 सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) मौजूद हैं। वहीं अगस्त 2026 से दिसंबर 2027 के बीच 80 नए एसटीपी स्थापित किए जाने की योजना है।
हालांकि, एमिकस क्यूरी ने यह भी रेखांकित किया कि झालावाड़, करौली और कोटा को छोड़कर अधिकांश शहरी निकायों ने सीवेज नालों की संख्या संबंधी जानकारी नहीं दी है। रिपोर्ट में झालावाड़ के चमरिया खाल को एक नाले के रूप में दर्ज किया गया है।
रिपोर्ट में इस बात पर भी चिंता जताई गई है कि सीवेज के ट्रीटमेंट के बाद निकलने वाले कीचड़ (स्लज) का क्या इस्तेमाल हो रहा है, नदियों के पानी की गुणवत्ता कैसी है, और कितने बरसाती नालों में सीवेज बहाया जा रहा है, इन बुनियादी बातों के विषय में कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है।
कई शहरों में कचरा प्रबंधन के लिए बजट तक नहीं
पर्यावरण को बचाने की कोशिशें कागजों और बजट के फेर में कैसे उलझती हैं, यह भी इस रिपोर्ट से साफ होता है। रिपोर्ट के अनुसार, 308 शहरी निकायों में से 20 निकायों को तरल अपशिष्ट प्रबंधन (लिक्विड वेस्ट मैनेजमेंट) के लिए कोई बजटीय आवंटन नहीं मिला है। वहीं कई निकायों को बजट मिला भी तो बेहद अनियमित तरीके से, और कुछ को तो पहली बार फंड नसीब हुआ है।
यह रिपोर्ट केवल एक नदी की दुर्दशा का दस्तावेज नहीं, बल्कि तेजी से बढ़ते शहरीकरण और अव्यवस्थित विकास की चेतावनी भी है।
यदि नदियों के प्राकृतिक स्वरूप को बचाने, सीवर और कचरे के वैज्ञानिक प्रबंधन तथा जल स्रोतों की सुरक्षा के लिए समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो आयड़ जैसी नदियां केवल नक्शों में रह जाएंगी और उनके साथ जुड़ी झीलें तथा भूजल स्रोत भी गंभीर संकट में पड़ जाएंगे।