

राजस्थान की चंद्रलोई नदी (चंबल की सहायक नदी) में मगरमच्छों की मौत की जांच में एक ऐसा तथ्य सामने आया है, जो केवल इस घटना तक सीमित नहीं है बल्कि देश में प्रतिबंधित रसायनों की निगरानी और पर्यावरणीय जवाबदेही पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है। राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) द्वारा गठित संयुक्त समिति को नदी के पानी में एल्ड्रिन नाम का प्रतिबंधित कीटनाशक मिला है। अब अधिकरण में जवाब दाखिल करने वाले राजस्थान के वन विभाग ने इस निष्कर्ष को स्वीकार करने के बावजूद इसकी रोकथाम संबंधी जिम्मेदारी लेने से इनकार कर दिया है।
एल्ड्रिन ऑर्गेनोक्लोरीन समूह का एक कीटनाशक है। भारत सरकार ने इसे प्रतिबंधित कीटनाशकों की सूची में शामिल किया है, क्योंकि यह पर्यावरण में लंबे समय तक बना रहता है और मिट्टी और पानी को प्रदूषित करता है। यह धीरे-धीरे खाद्य श्रृंखला में जमा होता है तथा मनुष्यों और वन्यजीवों के तंत्रिका तंत्र पर गंभीर दुष्प्रभाव डाल सकता है। इसी कारण इसके निर्माण, आयात और उपयोग पर भारत में 1990 के दशक में ही प्रतिबंध लगा दिया गया था। ऐसे में किसी नदी के पानी में इसका मिलना यह सवाल खड़ा करता है कि आखिर यह रसायन वहां पहुंचा कैसे, कब से मौजूद है और इसके लिए जिम्मेदार कौन है।
मामले की शुरुआत दिसंबर 2024 में हुई, जब कोटा की चंद्रलोई नदी में लगभग छह से सात फुट लंबे चार लुप्तप्राय मगरमच्छ मृत पाए गए। यह कोई पहली घटना नहीं थी। वर्ष 2022 में भी इसी नदी में औद्योगिक अपशिष्ट से हुए प्रदूषण के कारण करीब 50 मगरमच्छों की मौत हो चुकी थी। ये मगरमच्छ वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की अनुसूची-एक (सी) के तहत संरक्षित प्रजाति हैं, जिन्हें कानून के तहत सर्वोच्च स्तर का संरक्षण प्राप्त है।
राष्ट्रीय हरित अधिकरण ने 19 दिसंबर 2024 को इस मामले का स्वतः संज्ञान लिया और जांच के लिए एक संयुक्त समिति गठित की। समिति में राजस्थान राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, राज्य के मुख्य वन्यजीव वार्डन तथा भारतीय वन्यजीव संस्थान, देहरादून के एक नामित प्रतिनिधि को शामिल किया गया। समिति ने 24 और 25 जनवरी 2025 को घटनास्थल का निरीक्षण किया और अपनी रिपोर्ट अधिकरण के समक्ष प्रस्तुत की। अब कोटा के उप वन संरक्षक (वन्यजीव), जिला मजिस्ट्रेट और प्रभागीय वन अधिकारी की ओर से अधिकरण में दाखिल जवाब में एक स्पष्ट विरोधाभास दिखाई देता है।
एक ओर जवाब में संयुक्त समिति के इस निष्कर्ष को दर्ज किया गया है कि नदी के पानी में एल्ड्रिन जैसे प्रतिबंधित कीटनाशकों की मौजूदगी गंभीर चिंता का विषय है। दूसरी ओर, वन विभाग यह दलील देता है कि इसकी जिम्मेदारी उसकी नहीं है, क्योंकि कीटनाशकों के उपयोग का नियमन कृषि विभाग के अधिकार क्षेत्र में आता है, जबकि औद्योगिक अपशिष्ट और प्रदूषण नियंत्रण का दायित्व प्रदूषण नियंत्रण प्राधिकरणों का है।
यानी विभाग समिति के निष्कर्ष को नकारता नहीं है, बल्कि खुद को उससे अलग कर लेता है। वन विभाग ने अपने जवाब में यह भी कहा है कि संयुक्त समिति द्वारा कराए गए बायो-असे परीक्षण में पानी के नमूनों में मछलियों की 90 से 100 प्रतिशत जीवन-रक्षा दर दर्ज की गई। साथ ही यह भी बताया गया कि हैबिटेट सेंटर में लगभग 50 मगरमच्छ अब भी जीवित हैं, जिसे एक स्थिर आबादी का संकेत माना गया है।
हलफनामे में एक अन्य रिस्पॉन्डेंट के हवाले से जवाब में यह तर्क भी दिया गया है कि इन तथ्यों के आधार पर केवल जल-विषाक्तता को मगरमच्छों की मौत का कारण नहीं माना जा सकता। लेकिन यहीं सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है। यदि पानी इतना विषैला नहीं था कि उससे व्यापक स्तर पर जीवों की मृत्यु हो, तो फिर उसमें एल्ड्रिन जैसा प्रतिबंधित कीटनाशक पहुंचा कैसे? और यदि वही मौतों का कारण नहीं था, तो फिर मगरमच्छों की मौत किस वजह से हुई? इन सवालों का कोई स्पष्ट उत्तर नहीं है।
जवाबदेही का सवाल भी अब तक अनुत्तरित है। जब जांच समिति स्वयं नदी में प्रतिबंधित कीटनाशक की मौजूदगी दर्ज कर चुकी है, तब भी यह स्पष्ट नहीं है कि उसके स्रोत की जांच कौन करेगा, किस एजेंसी को इसकी जिम्मेदारी सौंपी जाएगी और भविष्य में ऐसी घटनाओं की रोकथाम के लिए कौन जवाबदेह होगा।
अपने बचाव में वन विभाग ने यह भी बताया है कि उसने नदी किनारे बसे गांवों में किसानों के बीच कीटनाशकों के सुरक्षित उपयोग को लेकर जागरूकता बैठकें आयोजित कीं। विभाग ने जुलाई 2025 से जनवरी 2026 के बीच चलाए गए रेप्टाइल (सरीसृप) जागरूकता अभियान 2025-26 का विस्तृत ब्यौरा भी अधिकरण के समक्ष रखा है। इसमें कोटा के लगभग एक दर्जन स्कूलों में आयोजित कार्यक्रमों, धन्यवाद-पत्रों और तस्वीरों को रिकॉर्ड का हिस्सा बनाया गया है।
यहीं वन विभाग का जवाब सबसे अधिक सवालों के घेरे में आता है। जिस मामले की मूल चिंता नदी में प्रतिबंधित कीटनाशक की मौजूदगी और मगरमच्छों की मौत है, उसमें विभाग ने रेप्टाइल जागरूकता अभियान का विस्तृत दस्तावेजीकरण तो प्रस्तुत किया है, लेकिन नदी में प्रदूषण के स्रोत की पहचान, प्रतिबंधित कीटनाशक की मौजूदगी की जांच, नियमित जल-गुणवत्ता निगरानी या मगरमच्छों के संरक्षण के लिए किसी ठोस और समयबद्ध कार्ययोजना का उल्लेख नहीं किया है।
यह जवाब उप वन संरक्षक (वन्यजीव) अनुराग कुमार भटनागर के शपथ-पत्र के साथ राष्ट्रीय हरित अधिकरण में दाखिल किया गया है, जिसमें उन्होंने प्रस्तुत तथ्यों को सत्य होने की पुष्टि की है। मामला फिलहाल राष्ट्रीय हरित अधिकरण की प्रधान पीठ में लंबित है।