छत्तीसगढ़ में कोयला खनन को सुप्रीम कोर्ट की हरी झंडी, लेकिन जनसुनवाई कराने का भी दिया आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि खनन जारी रह सकता है, लेकिन पर्यावरणीय मंजूरी की प्रक्रिया नई जनसुनवाई पूरी किए बिना पूरी नहीं मानी जा सकती।
प्रतीकात्मक तस्वीर
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सारांश
  • सुप्रीम कोर्ट और नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) के दो अहम आदेशों ने एक बार फिर स्पष्ट कर दिया है कि विकास परियोजनाओं और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाए रखना न्यायपालिका की प्राथमिकता है।

  • सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ के गारे पालमा (सेक्टर-II) कोयला खदान में महाराष्ट्र स्टेट पावर जनरेशन कंपनी लिमिटेड को खनन जारी रखने की अनुमति देते हुए कहा कि केवल नई जनसुनवाई लंबित होने के आधार पर खनन नहीं रोका जा सकता।

  • हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि पर्यावरणीय मंजूरी की प्रक्रिया नई जनसुनवाई के बिना पूरी नहीं मानी जाएगी और इसकी निगरानी अब एनजीटी करेगा।

  • दूसरी ओर, एनजीटी ने कोलकाता के न्यू टाउन स्थित एक सीमेंट मिक्सिंग प्लांट से कथित वायु प्रदूषण की शिकायत को गंभीरता से लेते हुए पश्चिम बंगाल प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को विस्तृत जांच और जरूरत पड़ने पर सख्त कार्रवाई के निर्देश दिए हैं।

  • ट्रिब्यूनल ने प्रभावित नागरिकों और परियोजना पक्ष, दोनों को सुनवाई का अवसर देने पर भी जोर दिया। दोनों आदेश यह संदेश देते हैं कि विकास कार्य जारी रह सकते हैं, लेकिन पर्यावरणीय कानूनों, जनभागीदारी और प्रदूषण नियंत्रण के मानकों से कोई समझौता स्वीकार नहीं किया जाएगा।

महाराष्ट्र स्टेट पावर जनरेशन कंपनी लिमिटेड को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत मिली है। शीर्ष अदालत ने छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले में स्थित गारे पालमा (सेक्टर-II) कोयला खदान में कंपनी को खनन जारी रखने की अनुमति दे दी है।

हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि पर्यावरणीय मंजूरी (ईसी) देने से पहले नई सिरे से जनसुनवाई कराना अनिवार्य था और यह प्रक्रिया अब हर हाल में पूरी की जानी चाहिए।

क्या था पूरा विवाद और एनजीटी का फैसला?

गौरतलब है कि महाराष्ट्र स्टेट पावर जनरेशन कंपनी लिमिटेड ने नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल द्वारा 15 जनवरी 2024 के उस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी, जिसमें 11 जुलाई 2022 को इस प्रोजेक्ट के लिए कंपनी को दी गई पर्यावरणीय मंजूरी रद्द कर दी थी।

एनजीटी ने पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय से मामले की दोबारा समीक्षा करते हुए नई जनसुनवाई से प्रक्रिया शुरू करने का निर्देश दिया था।

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सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एनजीटी के आदेश में प्रयुक्त "अफ्रेश" शब्द का स्पष्ट अर्थ है कि संबंधित अधिकारियों के लिए नई सिरे से जनसुनवाई (सार्वजनिक परामर्श) कराना अनिवार्य था। चूंकि ऐसा नहीं किया गया, इसलिए इस मामले में एनजीटी का फैसला सही नहीं माना जा सकता, कि केवल इसी आधार पर खनन पूरी तरह रोक दिया जाए।

सुप्रीम कोर्ट ने 'नई जनसुनवाई' को क्यों बताया अनिवार्य?

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि चूंकि अधिकांश जरूरी शर्तों का पालन पहले ही किया जा चुका है, इसलिए महाराष्ट्र स्टेट पावर जनरेशन कंपनी लिमिटेड को खनन जारी रखने की अनुमति दी जाती है। अदालत ने स्पष्ट किया कि सिर्फ इस वजह से कि अब तक नई जनसुनवाई नहीं हुई है, कंपनी के खनन कार्य में कोई बाधा नहीं आएगी।

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हालांकि साथ ही, अदालत ने यह भी दोहराया कि पर्यावरणीय मंजूरी देने से पहले नई जनसुनवाई कराना आवश्यक था और इस प्रक्रिया को अब पूरा किया जाना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने अपील को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए मामला को आगे की कार्रवाई के लिए भोपाल स्थित एनजीटी की केंद्रीय पीठ को भेज दिया है। अदालत ने एनजीटी को निर्देश दिया कि वह नई जनसुनवाई कराए जाने की निगरानी करे और उसके बाद उचित आदेश पारित करे। साथ ही, यदि दोनों पक्षों ने अन्य मुद्दे भी उठाए हैं, तो एनजीटी उन पर भी गुण-दोष के आधार पर फैसला कर सकती है।

इस मामले में अब अगली सुनवाई 3 अगस्त 2026 को एनजीटी में होगी। सुप्रीम कोर्ट ने ट्रिब्यूनल से इस मामले का जल्द से जल्द निपटारा करने का निर्देश भी दिया है।

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कोलकाता के न्यूटाउन में सीमेंट प्लांट से प्रदूषण की शिकायत पर एनजीटी ने लिया संज्ञान, जांच के दिए आदेश

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने कोलकाता के न्यू टाउन में एक रेजिडेंशियल कॉम्प्लेक्स, मैगनोलिया मर्लियन के पास कथित तौर पर सीमेंट मिक्सिंग प्लांट से फैल रहे गंभीर वायु प्रदूषण पर सख्त रुख अपनाया है। 30 जुलाई, 2026 को ट्रिब्यूनल ने पश्चिम बंगाल प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (डब्ल्यूबीपीसीबी) से इस मामले की तुरंत विस्तृत जांच कर सख्त कार्रवाई करने को कहा है। जानकारी मिली है कि यह प्लांट एफटीसी कंक्रीट प्राइवेट लिमिटेड का है।

एनजीटी ने पश्चिम बंगाल प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (एसपीसीबी) को निर्देश दिया कि वह आवेदक और संबंधित परियोजना पक्ष के प्रतिनिधियों को जांच प्रक्रिया में शामिल करे, तथ्यों का सत्यापन करे और यदि पर्यावरणीय नियमों का उल्लंघन पाया जाए तो कानून के अनुसार दंड और सुधार के लिए उचित कार्रवाई करे।

बोर्ड को यह भी सुनिश्चित करने को कहा गया है कि कार्रवाई से प्रभावित सभी पक्षों, आवेदक और परियोजना पक्ष को प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप अपना पक्ष रखने का पूरा अवसर दिया जाए।

क्या है पूरा मामला

एसपीसीबी को अपनी जांच रिपोर्ट तीन महीने के भीतर एनजीटी के समक्ष प्रस्तुत करनी होगी।

गौरतलब है कि इस मामले में दायर याचिका में आरोप लगाया गया है कि सीमेंट मिक्सिंग प्लांट से उड़ने वाली घनी धूल लगातार आसपास के रिहायशी परिसर में जमा हो रही है। स्थिति इतनी गंभीर है कि लोग अपने घरों की खिड़कियां और दरवाजे तक नहीं खोल पा रहे।

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भारी मात्रा में जमा हो रहे धूलकणों के कारण एयर कंडीशनर की बाहरी यूनिटें जाम हो रही हैं और उनके खराब होने का खतरा भी बढ़ गया है। शिकायतकर्ताओं का कहना है कि इससे क्षेत्र के निवासियों के स्वास्थ्य और जीवन की गुणवत्ता पर गंभीर असर पड़ रहा है।

अब इस मामले में पश्चिम बंगाल प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की जांच रिपोर्ट तय करेगी कि सीमेंट प्लांट पर पर्यावरणीय नियमों के उल्लंघन का आरोप कितना सही है और प्रभावित लोगों को प्रदूषण से राहत दिलाने के लिए क्या कार्रवाई की जाती है।

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