

भोपाल के अचारपुरा में कथित अवैध खनन ने सिर्फ पहाड़ियों और पर्यावरण को लेकर सवाल नहीं खड़े किए हैं, बल्कि हजारों लोगों के पानी के भविष्य पर भी चिंता बढ़ा दी है।
मनीखेड़ी कोट पंचायत क्षेत्र में स्थित तालाब पर अचारपुरा, मनीखेड़ी, राताताल और करदई समेत आसपास के 8,000 से अधिक लोग निर्भर हैं। आवेदन में आरोप लगाया गया है कि मानसून से पहले तालाब से लगी पहाड़ियों और वन क्षेत्र में दो से तीन मशीनों से दिन-रात खुदाई की गई और तालाब की सीमा को भी नुकसान पहुंचाया गया। इसके चलते इस वर्ष पानी पुलिया तक नहीं पहुंच पाया।
तालाब आसपास के क्षेत्र से ऊंचाई पर स्थित है और करीब 10 से 12 किलोमीटर के दायरे में भूजल पुनर्भरण में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका बताई गई है। ऐसे में तालाब के जल्द सूखने से गर्मियों में भूजल स्तर गिरने और पेयजल संकट बढ़ने की आशंका जताई गई है।
इन आरोपों की जांच के लिए एनजीटी ने तीन सदस्यीय संयुक्त समिति गठित की है, जिसे मौके का निरीक्षण कर छह सप्ताह में रिपोर्ट देनी होगी। समिति तालाब का क्षेत्रफल, राजस्व रिकॉर्ड और वेटलैंड की स्थिति भी जांचेगी।
भोपाल के अचारपुरा औद्योगिक क्षेत्र में तालाब और आसपास की पहाड़ियों में कथित अवैध खनन के मामले में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने सख्त रुख अपनाया है।
आरोप है कि इस क्षेत्र में पर्यावरण सम्बन्धी नियमों को ताक पर रख अवैध खनन किया गया है। ऐसे में 24 सितंबर 2026 को दिए अपने आदेश में ट्रिब्यूनल ने तीन सदस्यीय संयुक्त समिति गठित कर मौके की जांच करने और छह सप्ताह के भीतर रिपोर्ट पेश करने के निर्देश दिए हैं।
समिति यह भी जांच करेगी कि संबंधित तालाब का क्षेत्रफल कितना है, राजस्व रिकॉर्ड में उसकी क्या स्थिति दर्ज है और क्या इस क्षेत्र को आर्द्रभूमि (वेटलैंड) के रूप में नोटिफाई किया गया है। यदि जांच में नियमों का उल्लंघन पाया जाता है तो उसके सुधार के लिए क्या कदम उठाए जा सकते हैं, समिति से उसकी भी जानकारी देने को कहा गया है।
यह मामला सिर्फ पहाड़ियों पर खनन तक सीमित नहीं है। स्थानीय लोगों के मुताबिक, तालाब के सूखने के साथ आने वाली गर्मियों में आसपास के इलाकों में पानी का संकट गहरा सकता है। अचारपुरा, मनीखेडी, राताताल और करदई समेत आसपास के क्षेत्रों की 8,000 से अधिक लोग इस तालाब के पानी पर सीधे तौर पर निर्भर है।
तालाब की घटती जलधारण क्षमता बनी चिंता
एनजीटी के सामने दायर आवेदन में कहा गया है कि बारिश खत्म होने और गर्मी शुरू होने के बाद तालाब के जल्द सूखने की आशंका है। मनीखेडी कोट पंचायत क्षेत्र में स्थित इस तालाब का दायरा एक किलोमीटर से ज्यादा है। आवेदन के मुताबिक, तालाब की बाउंड्री क्षतिग्रस्त होने के कारण इस वर्ष पानी पुलिया तक भी नहीं पहुंच पाया।
तालाब आसपास के क्षेत्र से ऊंचाई पर स्थित है, इसलिए इसका पानी करीब 10 से 12 किलोमीटर के दायरे में भूजल के पुनर्भरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
ऐसे में तालाब के लगभग खाली हो जाने से गर्मियों में भूजल स्तर तेजी से नीचे जाने की आशंका जताई गई है। इसका सीधा असर उन लोगों पर पड़ सकता है, जिनकी पेयजल जरूरतें आसपास के भूजल स्रोतों पर निर्भर हैं।
रात-दिन पहाड़ियों पर खनन का आरोप
आवेदन में आरोप लगाया गया है कि मानसून से पहले करीब चार महीने तक क्षेत्र की पहाड़ियों में लगातार खुदाई की गई। स्थानीय लोगों के अनुसार, कई बार एक साथ दो और कभी-कभी तीन मशीनों से दिन-रात खुदाई होती रही। लोगों का कहना है कि तालाब से लगी पहाड़ी और वन क्षेत्र में मई और जून के दौरान बड़े पैमाने पर खनन किया गया। शुरुआत में कुछ लोगों को लगा कि शायद तालाब को गहरा करने और उसकी जलधारण क्षमता बढ़ाने के लिए मिट्टी और चट्टान हटाई जा रही है।
लेकिन बाद में ग्रामीणों ने तालाब की सीमा और मेड़ को नुकसान पहुंचाए जाने पर सवाल उठाए। उनका आरोप है कि सीमा को जानबूझकर कमजोर किया गया, जिससे भविष्य में तालाब और आसपास के क्षेत्र में खनन करना आसान हो सके।
हालांकि इन आरोपों की पुष्टि होना अभी बाकी है। इसी की जांच के लिए एनजीटी ने संयुक्त समिति को मौके पर जाकर तथ्य जुटाने और रिपोर्ट देने को कहा है।
राजस्व रिकॉर्ड और आद्रभूमि का भी होगा परीक्षण
एनजीटी ने समिति को तालाब के वास्तविक क्षेत्रफल की जांच करने के साथ राजस्व रिकॉर्ड को भी खंगालने के निर्देश दिए हैं। समिति यह भी देखेगी कि संबंधित क्षेत्र को वेटलैंड यानी आर्द्रभूमि के रूप में अधिसूचित किया गया है या नहीं। समिति से पर्यावरण को नुकसान की स्थिति में सुधार के लिए जरूरी उपाय सुझाने और की गई कार्रवाई पर रिपोर्ट भी पेश करने का निर्देश दिया गया है।
इसके साथ ही एनजीटी ने मध्य प्रदेश सरकार की ओर से भोपाल के जिलाधिकारी, मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, भोपाल नगर निगम, भोपाल के खनन अधिकारी, केंद्रीय भूजल बोर्ड के उत्तर मध्य क्षेत्र, मनीखेड़ी कोट पंचायत के सचिव और तालाब क्षेत्र में खनन करने वाले व्यक्ति/ऑपरेटर को भी अपना जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए हैं।
देखा जाए तो तालाब में घटता पानी और क्षतिग्रस्त होती उसकी सीमा केवल एक जलस्रोत के खत्म होने का सवाल नहीं है। इसके साथ आसपास के भूजल, कृषि और हजारों लोगों की रोजमर्रा की पानी की जरूरतें भी जुड़ी हैं। ऐसे में अब एनजीटी द्वारा गठित समिति की जांच से यह स्पष्ट होगा कि तालाब और पहाड़ियों में वास्तव में क्या हुआ और पर्यावरणीय नुकसान की भरपाई के लिए किन कदमों की जरूरत है।