ओडिशा: क्या जांच में हुई चूक? सुभद्रा खदान की मंजूरी पर एनजीटी में उठे गंभीर सवाल

सुभद्रा कोल माइन को मिली पर्यावरणीय मंजूरी पर सवाल उठने के बाद एनजीटी ने मामले में प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को पक्षकार बनाया है।
कोयले का बढ़ता कारोबार; प्रतीकात्मक तस्वीर: सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट
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सारांश
  • ओडिशा की सुभद्रा ओपन कास्ट कोयला खदान को मिली पर्यावरणीय मंजूरी अब गंभीर कानूनी और वैज्ञानिक सवालों के घेरे में है।

  • नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने मामले की सुनवाई के दौरान ओडिशा राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को पक्षकार बनाते हुए जवाब तलब किया है, जिससे स्पष्ट है कि विवाद केवल एक खदान परियोजना तक सीमित नहीं, बल्कि पूरी पर्यावरणीय मंजूरी प्रक्रिया की विश्वसनीयता से जुड़ा है।

  • याचिका में आरोप लगाया गया है कि खदान को मंजूरी देते समय हवा में मौजूद कैंसरकारी प्रदूषक ‘बेंजीन’ के आधारभूत आंकड़ों का वैज्ञानिक और मानक अनुरूप मूल्यांकन नहीं किया गया। साथ ही, जिन प्रयोगशाला रिपोर्टों के आधार पर मंजूरी दी गई, उनकी वैधता और एनएबीएल मान्यता को लेकर भी गंभीर प्रश्न उठाए गए हैं।

  • आरोप यह भी है कि विशेषज्ञ मूल्यांकन समिति ने तकनीकी तथ्यों की स्वतंत्र जांच करने के बजाय परियोजना पक्ष के आश्वासनों पर भरोसा किया और पूर्व में दर्ज शिकायतों को नजरअंदाज कर दिया।

  • यह मामला अब पर्यावरण प्रभाव आकलन (ईआईए) प्रक्रिया में पारदर्शिता, वैज्ञानिक कठोरता और जवाबदेही की परीक्षा बन गया है। एनजीटी का अंतिम फैसला भविष्य में पर्यावरणीय मंजूरियों के मानकों और निगरानी व्यवस्था पर दूरगामी असर डाल सकता है।

ओडिशा के अंगुल में प्रस्तावित सुभद्रा ओपन कास्ट कोयला खदान को मिली पर्यावरणीय मंजूरी (ईसी) का मामला अब गरमाता जा रहा है।

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) की ईस्टर्न बेंच ने पर्यावरणीय मंजूरी को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए ओडिशा राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (एसपीसीबी) को पक्षकार बनाने का निर्देश दिया है। साथ ही इस मामले में प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को जवाब दाखिल करने को कहा है।

एनजीटी ने 29 मई, 2026 को कहा है कि विवाद में पर्यावरण से जुड़े कई बुनियादी और बेहद महत्वपूर्ण सवाल शामिल हैं, जिनका सही और न्यायसंगत निपटारा करने के लिए प्रदूषण बोर्ड की भागीदारी और उसका रुख जानना अनिवार्य है। इसके साथ ही अदालत ने बोर्ड को इस पूरे विषय पर अपना जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है।

क्या है पूरा मामला?

यह पूरा मामला केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (एमओईएफसीसी) द्वारा 6 मार्च 2024 को महानदी कोलफील्ड्स लिमिटेड (एमसीएल) के पक्ष में सुभद्रा ओपन कास्ट कोयला खदान के लिए जारी मंजूरी से जुड़ा है।

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यह मंजूरी ओडिशा के अंगुल जिले की सदर और छेंदीपाड़ा तहसीलों में स्थित सुभद्रा ओपन कास्ट कोयला खदान परियोजना के लिए दी गई थी। परियोजना की प्रस्तावित उत्पादन क्षमता 25 मिलियन टन प्रतिवर्ष (एमटीपीए) है और इसका खनन पट्टा क्षेत्र 1,111.85 हेक्टेयर में फैला है। यह क्षेत्र गोपाल प्रसाद, कुमुदा, निशा, कंकारेई और राईझरण समेत कई गांवों को प्रभावित करता है।

इस मामले में संजय कुमार मिश्रा ने याचिका दायर कर पर्यावरण मंत्रालय की विशेषज्ञ मूल्यांकन समिति की कार्यप्रणाली पर गंभीर आरोप लगाए हैं।

याचिकाकर्ता का तर्क है कि इस खदान को मंजूरी देते समय इलाके की वायु गुणवत्ता, विशेष रूप से हवा में मौजूद 'बेंजीन' जैसे खतरनाक और कैंसरकारी प्रदूषक तत्व के आंकड़ों का सही और वैज्ञानिक मूल्यांकन नहीं किया गया। याचिका में कहा गया है कि पर्यावरण मंजूरी देते समय जिन शुरुआती आंकड़ों (बेसलाइन डेटा) को आधार बनाया गया, वे तय भारतीय मानकों यानी 'आईएस 5182 (पार्ट 11)' के अनुरूप ही नहीं थे।

हालांकि विशेषज्ञ मूल्यांकन समिति (ईएसी) की बैठक के मिनट्स में इसके मानकों के अनुरूप होने का दावा किया गया था।

संदेह के घेरे में प्रयोगशाला की रिपोर्ट

इस विवाद में सबसे चौंकाने वाला मोड़ प्रयोगशाला की विश्वसनीयता और उसकी रिपोर्ट को लेकर आया है। याचिकाकर्ता के अनुसार, जिस प्रयोगशाला ने यह आधारभूत आंकड़े तैयार किए, उसके पास एनएबीएल की मान्यता होना जरूर है, लेकिन बेंजीन परीक्षण के नतीजे ऐसे रिपोर्ट प्रारूप पर जारी किए गए जो एनएबीएल मान्यता प्राप्त नहीं था।

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रिपोर्ट में संबंधित परीक्षण के लिए एनएबीएल मान्यता का कोई स्पष्ट उल्लेख भी नहीं किया गया, जो मान्यता प्राप्त रिपोर्टिंग प्रक्रियाओं के विपरीत है।

याचिका में यह भी आरोप लगाया गया है कि पर्यावरण मंत्रालय की विशेषज्ञ समिति ने अपने कर्तव्यों का ईमानदारी से पालन करने के बजाय, केवल खनन कंपनी द्वारा दिए गए हलफनामे और आश्वासनों पर आंख मूंदकर भरोसा कर लिया। समिति ने उन तकनीकी और वैज्ञानिक पहलुओं की जांच करने की जहमत नहीं उठाई जो पर्यावरण प्रभाव आकलन (ईआईए) के नियमों के तहत बेहद जरूरी हैं।

इसके अलावा, मंजूरी जारी करते समय इस परियोजना के खिलाफ दर्ज कराई गई एक पुरानी और प्रासंगिक शिकायत को भी पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया। इससे पर्यावरण प्रभाव आकलन और पर्यावरणीय मूल्यांकन प्रक्रिया की निष्पक्षता और विश्वसनीयता पर सवाल खड़े होते हैं।

क्या है याचिकाकर्ता की मांग?

अब इस मामले में याचिकाकर्ता ने ट्रिब्यूनल से मांग की है कि पर्यावरण मंत्रालय को इस पूरी परियोजना का नए सिरे से मूल्यांकन करने का निर्देश दिया जाए।

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ऐसे में अब सबकी नजर एनजीटी में होने वाली अगली सुनवाई पर टिकी है। यह मामला केवल एक कोयला खदान की मंजूरी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भी तय करेगा कि पर्यावरणीय मंजूरी की प्रक्रिया में वैज्ञानिक जांच, पारदर्शिता और जवाबदेही को कितना महत्व दिया जाता है।

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