कब समझेंगें कटते पेड़ों का महत्त्व: भारत सहित दुनिया में 'अर्बन हीट आइलैंड' का असर आधा कर रहे पेड़

स्टडी के हवाले से पता चला है कि शहरों में मौजूद पेड़ 'अर्बन हीट आइलैंड के प्रभाव' से पैदा होने वाली अतिरिक्त गर्मी को 48.6 फीसदी तक कम कर रहे हैं
कितने जरुरी हैं ये कटते पेड़; प्रतीकात्मक तस्वीर: आईस्टॉक
कितने जरुरी हैं ये कटते पेड़; प्रतीकात्मक तस्वीर: आईस्टॉक
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सारांश
  • शहरों में कटते पेड़ों की कीमत अब सिर्फ हरियाली के नुकसान से नहीं, बल्कि बढ़ती जानलेवा गर्मी से चुकानी पड़ रही है। नए अध्ययन ने दिखाया है कि दुनिया के 8,919 बड़े शहरी क्षेत्रों, जहां 360 करोड़ लोग रहते हैं, में पेड़ “अर्बन हीट आइलैंड” के असर से पैदा होने वाली अतिरिक्त गर्मी को औसतन 48.6 फीसदी तक कम कर रहे हैं।

  • यानी जिन शहरों को कंक्रीट, डामर और इमारतें तपा रही हैं, वहां पेड़ अब भी जीवन बचाने वाली प्राकृतिक ढाल बने हुए हैं।

  • अध्ययन के मुताबिक, पेड़ों की छाया और पत्तियों से निकलने वाली नमी शहरों का तापमान औसतन 0.15 डिग्री सेल्सियस तक घटा रही है। यदि ये पेड़ न हों, तो दुनिया के शहर औसतन 0.31 डिग्री सेल्सियस और ज्यादा गर्म हो सकते हैं।

  • करीब 91.4 करोड़ लोगों को कम से कम 0.25 डिग्री सेल्सियस और 20.3 करोड़ लोगों को 0.5 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा राहत मिल रही है।

  • लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है, जहां गर्मी सबसे ज्यादा है, वहां पेड़ सबसे कम क्यों हैं? अध्ययन बताता है कि गरीब और घनी आबादी वाले शहरों में हरियाली बेहद कम है, जबकि अमीर देशों के शहर ज्यादा छांव में हैं।

  • यही असमानता आने वाले वर्षों में भारत जैसे देशों के शहरों को हीट हॉटस्पॉट बना सकती है। वैज्ञानिकों की चेतावनी साफ है: पेड़ सिर्फ सुंदरता नहीं, तेजी से गर्म होती दुनिया में शहरों का जीवन-रक्षक बुनियादी ढांचा हैं।

कंक्रीट, डामर और ऊंची इमारतों से घिरे शहर साल-दर-साल पहले से ज्यादा गर्म होते जा रहे हैं। लेकिन इस बढ़ती तपिश के बीच पेड़ अब भी लोगों के लिए राहत की सबसे बड़ी ढाल बने हुए हैं। एक नए अध्ययन में सामने आया है कि वैश्विक स्तर पर पेड़ शहरों में “अर्बन हीट आइलैंड” यानी शहरी गर्मी के प्रभाव को करीब आधा कम कर रहे हैं।

हालांकि चिंता की बात है कि पेड़ों से मिलने वाली यह राहत दुनिया में हर जगह समान नहीं है। सबसे ज्यादा गर्म और आर्थिक रूप से कमजोर शहरों में, जहां लोगों को ठंडक की सबसे ज्यादा जरूरत है, वहां पेड़ों की कमी के चलते फायदे बेहद सीमित हैं।

क्या है ‘अर्बन हीट आइलैंड’

बता दें कि “अर्बन हीट आइलैंड” वह स्थिति है, जब शहरों की सड़कों, छतों और कंक्रीट की सतहों में गर्मी जमा हो जाती है और शहर आसपास के ग्रामीण इलाकों की तुलना में कहीं ज्यादा गर्म महसूस होने लगते हैं।

ऐसा इसलिए होता है क्योंकि शहरों में सड़कें, कंक्रीट, इमारतें और डामर जैसी सतहें दिनभर सूरज की गर्मी सोख लेती हैं और फिर धीरे-धीरे उसे छोड़ती रहती हैं। साथ ही पेड़ों और हरियाली की कमी, वाहनों का धुआं, एसी और उद्योगों से निकलने वाली गर्मी भी तापमान को बढ़ाती है।

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यह अध्ययन हम्बोल्ट यूनिवर्सिटी (जर्मनी), पैसिफिक नॉर्थवेस्ट नेशनल लेबोरेटरी (अमेरिका), द नेचर कन्जर्वेंसी, वेस्टर्न सिडनी यूनिवर्सिटी सहित अन्य संस्थानों से जुड़े शोधकर्ताओं द्वारा किया गया है, जिसके नतीजे अंतराष्ट्रीय जर्नल नेचर कम्युनिकेशन्स में प्रकाशित हुए हैं।

अपने इस अध्ययन में शोधकर्ताओं ने दुनिया के 8,919 बड़े शहरी क्षेत्रों का विश्लेषण किया है, जोकि 360 करोड़ लोगों का घर हैं। इस दौरान वैज्ञानिकों ने शहरों को छोटे-छोटे हिस्सों में बांटकर तापमान को मापा, ताकि यह पता चल सके कि किन इलाकों में पेड़ वास्तव में लोगों को राहत पहुंचा रहे हैं।

पेड़ों की छाया से आधी हुई शहरों की अतिरिक्त गर्मी

अध्ययन के मुताबिक शहरों में मौजूद पेड़अर्बन हीट आइलैंड प्रभाव” से पैदा होने वाली अतिरिक्त गर्मी को 48.6 फीसदी तक कम कर रहे हैं। दुनिया के सभी शहरों का औसत देखें तो पेड़ों की छाया और पत्तियों से पैदा होने वाली नमी तापमान को औसतन 0.15 डिग्री सेल्सियस तक कम कर रही है। वहीं कुछ शहरों में यह असर और भी ज्यादा रहा, जहां तापमान में 2.7 डिग्री सेल्सियस तक की कमी दर्ज की गई।

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नतीजे दर्शाते हैं कि यदि पेड़ न हों, तो “अर्बन हीट आइलैंड” प्रभाव के कारण वैश्विक स्तर पर शहरों का तापमान औसतन 0.31 डिग्री सेल्सियस और बढ़ सकता है।

वैज्ञानिकों का अनुमान है कि करीब 91.4 करोड़ लोगों को पेड़ों की वजह से कम से कम तापमान में 0.25 डिग्री सेल्सियस तक ठंडक मिल रही है। इनमें से करीब 20.3 करोड़ लोगों को इलाकों में पेड़ों की वजह से गर्मी में 0.5 डिग्री सेल्सियस या उससे ज्यादा राहत मिल रही है।

वैज्ञानिकों के मुताबिक, यह मामूली लगने वाला अंतर भी बेहद अहम है, क्योंकि इसका असर दुनिया के हजारों शहरों में करोड़ों लोगों पर और लगातार जानलेवा होती गर्मी पर पड़ता है।

जहां पेड़, वहां राहत

हालांकि यह तस्वीर हर जगह इतनी सुखद नहीं है। अध्ययन में यह भी सामने आया है कि पेड़ों से मिलने वाली यह राहत फिलहाल मुख्य रूप से उन इलाकों में केंद्रित है, जहां इसकी जरूरत अपेक्षाकृत कम है, जैसे अमीर देश, नम जलवायु वाले क्षेत्र और शहरों के समृद्ध उपनगरीय इलाके, जबकि सबसे ज्यादा गर्मी झेल रहे घनी आबादी वाले और आर्थिक रूप से कमजोर शहरी क्षेत्रों को इसका लाभ सीमित रूप से मिल रहा है।

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इन घनी आबादी वाले गरीब इलाकों में हरियाली कम होने के कारण लोग बढ़ती गर्मी का ज्यादा सामना कर रहे हैं। यानी जिन इलाकों में तापमान सबसे तेजी से बढ़ रहा है, वहां पेड़ों की छाया सबसे कम है।

अमीर देशों और इलाकों में बड़े घर, ज्यादा खुली जमीन और बेहतर शहरी योजना के कारण पेड़ों के लिए जगह बची रहती है। वहीं गरीब देशों के घनी आबादी वाले शहरों में हरियाली तेजी से गायब होती जा रही है। ऐसे में वैज्ञानिकों का कहना है कि यह केवल पर्यावरण का ही नहीं, बल्कि सामाजिक असमानता का भी मुद्दा है। शहरों में हरियाली का असमान बंटवारा स्वास्थ्य, जीवन गुणवत्ता और जलवायु जोखिम को सीधे प्रभावित कर रहा है।

अभी लगाए पेड़, तभी मिलेगी आने वाले दशकों में छाया

अध्ययन के मुताबिक, यह असमानता आगे और बढ़ सकती है, क्योंकि मौजूदा और भविष्य के अनुमानित पेड़ 2050 तक जलवायु परिवर्तन से बढ़ने वाले तापमान का महज 9 से 10 फीसदी असर ही कम कर पाएंगे।

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हालांकि वैज्ञानिकों ने यह भी अनुमान लगाया है कि अगर शहरों में बड़े पैमाने पर पेड़ लगाए जाएं, तो यह राहत बढ़कर करीब 20 फीसदी तक पहुंच सकती है। ऐसे में वैज्ञानिकों ने कहा है कि सरकारों को घनी आबादी और आर्थिक रूप से कमजोर शहरी इलाकों में जल्द से जल्द पेड़ लगाने पर जोर देना चाहिए, ताकि समय रहते उनकी पूरी छाया विकसित हो सके।

अध्ययन के प्रमुख शोधकर्ता रॉब मैकडोनाल्ड का कहना है कि पेड़ जरूरी हैं, लेकिन वे अकेले जलवायु संकट का समाधान नहीं कर सकते।

ऐसे में गर्म होती दुनिया के साथ तालमेल बैठाने के लिए इंसानों को कई उपाय अपनाने होंगे। साथ ही, ग्रीनहाउस गैसों के बढ़ते उत्सर्जन में तेजी से कटौती करना भी बेहद जरूरी है। वैज्ञानिकों ने चेताया है कि यदि जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम नहीं हुई और अक्षय ऊर्जा की ओर तेजी से बदलाव नहीं हुआ, तो आने वाले दशकों में शहरों में बढ़ती गर्मी और खतरनाक हो सकती है।

यूनिवर्सिटी ऑफ ईस्ट एंग्लिया से जुड़े वैज्ञानिकों के नेतृत्व में किए एक अन्य अध्ययन में सामने आया है कि भारत जैसे मानसूनी क्षेत्रों में ‘अर्बन हीट आइलैंड’ प्रभाव जलवायु परिवर्तन के साथ और तेज हो सकता है, जिससे शहरी आबादी पर गर्मी का खतरा कई गुना बढ़ जाएगा।

भारत के शहर बन सकते हैं नए हीट हॉटस्पॉट

वैज्ञानिकों ने आशंका जताई है कि कुछ शहरों में स्थिति और भी गंभीर हो सकती है। उदाहरण के लिए पंजाब के पटियाला शहर के तापमान में डेढ़ से दो डिग्री सेल्सियस तक अतिरिक्त वृद्धि हो सकती है। इसी तरह जलवायु परिवर्तन के चलते जालंधर और पटियाला जैसे भारतीय शहर 'हीट हॉटस्पॉट' बन सकते हैं।

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जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर काम कर रहे अंतराष्ट्रीय संगठन क्लाइमेट सेंट्रल और क्लाइमेट ट्रेंड्स ने अपने नए विश्लेषण में खुलासा किया है कि देश में गर्म होती रातों के पीछे जलवायु परिवर्तन का बड़ा हाथ है, जो भारत के साथ-साथ दुनिया भर में नींद की गुणवत्ता पर असर डाल रहा है। इतना ही नहीं इसकी वजह से लोगों के स्वास्थ्य पर भी असर पड़ने लगा है।

हालांकि देखा जाए तो पेड़ों का महत्व सिर्फ तापमान कम करने तक सीमित नहीं है। वे हवा को साफ करते हैं, कार्बन सोखते हैं, बाढ़ के खतरे को कम करते हैं। साथ ही यह शहरों में रहने वाले लोगों को मानसिक राहत भी देते हैं।

शोधकर्ताओं ने जोर दिया है कि अब शहरों में केवल 'हरियाली बढ़ाने' की नहीं, बल्कि 'समान रूप से हरियाली पहुंचाने' की जरूरत है। यदि आर्थिक रूप से कमजोर इलाकों, घनी बस्तियों और भीषण गर्मी की मार झेल रहे शहरों में बड़े पैमाने पर पेड़ लगाए जाएं, तो यह न केवल तापमान को कम करेगा बल्कि लोगों को लू, बीमारियों और बिजली के खर्च से भी राहत दे सकता है।

हमें समझना होगा कि तेजी से गर्म होती दुनिया में पेड़ महज सजावट नहीं, बल्कि शहरों के लिए जीवन बचाने वाला बुनियादी ढांचा बन चुके हैं।

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