

वैज्ञानिकों ने सैटेलाइट आंकड़ों से जंगलों की लचीलापन क्षमता मापने के लिए टीएसी के सही इस्तेमाल का नया तरीका खोजा है।
नए अध्ययन में टीएसी संकेतों को अमेजन के सैकड़ों पेड़ों की वास्तविक सेहत और सूखा सहने की क्षमता से जोड़ा गया है।
शोधकर्ताओं ने बताया कि टीएसी के लिए सही फ्रीक्वेंसी, समय अवधि और वनस्पति संकेतक चुनना बेहद जरूरी है।
अध्ययन से जंगलों में संभावित टिप्पिंग पॉइंट पहचानने और सूखा, आग जैसी परेशानियों से पहले चेतावनी पाने की उम्मीद बढ़ी है।
वैज्ञानिक अब इस पद्धति को दूसरे पारिस्थितिकी तंत्रों में आजमाकर जंगलों की वैश्विक निगरानी बेहतर बनाने की दिशा में काम करेंगे।
दुनिया के जंगल जलवायु परिवर्तन, सूखा, आग और इंसानी गतिविधियों जैसी कई चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। ऐसे में वैज्ञानिकों के लिए यह जानना जरूरी है कि जंगल इन परेशानियों से कितनी जल्दी उबर सकते हैं। इसी को समझने के लिए वैज्ञानिक लंबे समय से एक खास तरीका इस्तेमाल कर रहे हैं, जिसे टेम्पोरल ऑटोकॉरिलेशन (टीएसी) कहा जाता है।
अब अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ कनेक्टिकट की ग्लोबल एनवायरनमेंटल रिमोट सेंसिंग लेबोरेटरी के वैज्ञानिकों ने टीएसी को लेकर एक अहम अध्ययन किया है। यह अध्ययन नेचर इकोलॉजी एंड इवोल्यूशन नामक पत्रिका में प्रकाशित किया गया है।
क्या है जंगल की लचीलापन क्षमता?
जंगल में जब सूखा, आग या दूसरी परेशानी आती है, तो पेड़-पौधों की हालत खराब हो सकती है। लेकिन परेशानी खत्म होने के बाद कुछ जंगल जल्दी सामान्य हो जाते हैं, जबकि कुछ जंगल लंबे समय तक प्रभावित रहते हैं। जंगल की इसी क्षमता को उसकी लचीलापन क्षमता या रेसिलिएंस कहा जाता है।
वैज्ञानिक यह भी जानना चाहते हैं कि क्या कोई ऐसा समय आता है, जब जंगल किसी बड़े बदलाव के बहुत करीब पहुंच जाता है। ऐसी स्थिति को वैज्ञानिक टिपिंग प्वाइंट कहते हैं। इसके बाद छोटी-सी परेशानी भी जंगल को एक अलग स्थिति में पहुंचा सकती है।
शोध पत्र में शोधकर्ता के हवाले से कहा गया है कि जंगल की निगरानी इसलिए जरूरी है ताकि यह पता चल सके कि वह ऐसे किसी खतरनाक स्तर के कितने करीब पहुंच चुका है।
टीएसी कैसे करता है काम?
सैटेलाइट से जंगलों की तस्वीरें लगातार मिलती रहती हैं। इन तस्वीरों से यह पता लगाया जा सकता है कि मौसम के साथ जंगल कितना हरा या भूरा हो रहा है। यह बदलाव काफी हद तक सामान्य और अनुमानित होता है। लेकिन टीएसी इस सामान्य बदलाव को सीधे नहीं देखता। यह सामान्य बदलाव के आसपास मौजूद छोटे-छोटे अंतर को देखता है। इन अंतर में कभी-कभी जंगल पर पड़ने वाले छोटे तनाव की जानकारी छिपी होती है।
अगर इन बदलावों का असर लंबे समय तक बना रहता है, तो यह संकेत हो सकता है कि जंगल को सामान्य स्थिति में लौटने में ज्यादा समय लग रहा है। वैज्ञानिक इसे कम रेसिलिएंस का संकेत मान सकते हैं। हालांकि यहां एक बड़ी समस्या थी। इन छोटे संकेतों में असली जानकारी और सामान्य शोर, दोनों मौजूद हो सकते हैं। इसलिए गलत तरीके से टीएसी निकालने पर परिणाम भी गलत हो सकते हैं।
वैज्ञानिकों ने खोजा सही तरीका
नए अध्ययन शोधकर्ताओं ने यह पता लगाने की कोशिश की कि सैटेलाइट के शोर वाले आंकड़ों से जंगल की रेसिलिएंस का सही संकेत कैसे निकाला जाए। शोधकर्ताओं ने बताया कि टीएसी निकालने के लिए हर तरह के आंकड़ों को एक ही तरीके से इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। इसमें सही फ्रीक्वेंसी, समय अवधि और वनस्पति संकेतक का चुनाव करना जरूरी है।
इससे पहले अलग-अलग वैज्ञानिक अध्ययनों में टीएसी निकालने के तरीके अलग रहे हैं। इसके कारण अलग-अलग शोधों के परिणामों की तुलना करना मुश्किल था। नए अध्ययन से इस समस्या को दूर करने के लिए एक अधिक स्पष्ट तरीका सामने आया है।
अमेजन के पेड़ों से किया गया परीक्षण
इस अध्ययन की सबसे खास बात यह है कि वैज्ञानिकों ने केवल सैटेलाइट के आंकड़ों पर भरोसा नहीं किया। उन्होंने जमीन पर मौजूद पेड़ों की वास्तविक स्थिति से सैटेलाइट के आंकड़ों की तुलना की।
अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिकों की मदद से अमेजन के जंगल में सैकड़ों पेड़ों का अध्ययन किया गया। इन पेड़ों में 100 से ज्यादा प्रजातियां शामिल थीं और उन्हें नौ अलग-अलग प्लॉट में देखा गया वैज्ञानिकों ने इन स्थानों के 30 मीटर रिजॉल्यूशन वाले सैटेलाइट आंकड़ों को जमीन से मिले आंकड़ों से मिलाया।
पेड़ों की सूखे से लड़ने की क्षमता से संबंध
शोधकर्ताओं ने सैटेलाइट आंकड़ों की तुलना पेड़ों के हाइड्रोलिक सेफ्टी मार्जिन (एचएसएम) से की। एचएसएम यह बताता है कि कोई पेड़ सूखे जैसी स्थिति में कितनी मुश्किल झेल सकता है और उसके पानी पहुंचाने वाले तंत्र के खराब होने का खतरा कितना है।
इस तुलना से वैज्ञानिकों को यह जांचने का मौका मिला कि टीएसी से मिलने वाला संकेत वास्तव में पेड़ की शारीरिक स्थिति और सूखे को सहने की क्षमता से जुड़ा है या नहीं।
यह कदम महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे टीएसी को केवल एक सैद्धांतिक संकेतक मानने के बजाय वास्तविक जमीन पर देखी गई पेड़ों की स्थिति से जोड़ने का रास्ता मिला।
दुनिया के दूसरे जंगलों के लिए भी उम्मीद
शोधकर्ताओं का मानना है कि यह काम केवल अमेजन के जंगलों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। आगे यह जांचना जरूरी होगा कि यही तरीका दुनिया के दूसरे जंगलों और अलग-अलग पारिस्थितिकी तंत्र में भी काम करता है या नहीं।
साथ ही, वैज्ञानिक यह भी समझना चाहते हैं कि अलग-अलग तरह के तनाव, जैसे सूखा, जंगल की आग और मानव गतिविधियों का असर टीएसी में किस तरह दिखाई देता है।
इस अध्ययन का सबसे बड़ा संदेश यही है कि सैटेलाइट से मिलने वाले आंकड़ों को जमीन पर मौजूद पेड़ों की वास्तविक स्थिति से जोड़ना जरूरी है। इससे वैज्ञानिक जंगलों की सेहत और उनके भविष्य के बारे में ज्यादा भरोसेमंद जानकारी हासिल कर सकते हैं।
अगर यह तरीका अलग-अलग क्षेत्रों में सफल साबित होता है, तो भविष्य में यह वैज्ञानिकों को उन जंगलों की पहचान करने में मदद कर सकता है जो किसी बड़े बदलाव या टिप्पिंग पॉइंट के करीब पहुंच रहे हैं। इससे समय रहते जंगलों की सुरक्षा के लिए कदम उठाना आसान हो सकता है।