मध्य प्रदेश: कॉलोनी के लिए कटे सैकड़ों पेड़ों, पहाड़ों को भी हुआ नुकसान, अब एनजीटी ने बैठाई जांच

आरोप है कि मध्य प्रदेश में खंडवा के ओंकारेश्वर रोड-कोठी क्षेत्र में एक कॉलोनी के निर्माण के लिए सैकड़ों पेड़ काटे गए हैं।
प्रतीकात्मक तस्वीर: आईस्टॉक
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सारांश
  • मध्य प्रदेश में विकास के नाम पर प्रकृति पर बढ़ते दबाव ने अब नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) की चिंता बढ़ा दी है।

  • खंडवा के ओंकारेश्वर रोड-कोठी क्षेत्र में कॉलोनी निर्माण के लिए सैकड़ों पेड़ों की कथित कटाई और पहाड़ी की खुदाई के आरोपों की जांच के लिए एनजीटी ने तीन सदस्यीय संयुक्त समिति गठित की है।

  • समिति को मौके का निरीक्षण कर छह सप्ताह में रिपोर्ट देने को कहा गया है।

  • वहीं, भोपाल के वन विहार राष्ट्रीय उद्यान के 100 मीटर इको-सेंसिटिव जोन में कथित अवैध बहुमंजिला निर्माण पर भी ट्रिब्यूनल ने सख्ती दिखाई है और संबंधित अधिकारियों को जांच कर तीन महीने में कार्रवाई की रिपोर्ट देने का निर्देश दिया है।

  • दोनों मामले एक ही चिंता की ओर इशारा करते हैं—क्या शहरों और कॉलोनियों के विस्तार की कीमत पेड़ों, पहाड़ियों, वन्यजीवों और उनके प्राकृतिक आवास को नष्ट करके चुकाई जा रही है?

  • आने वाली जांच रिपोर्ट यह तय करने में अहम होगी कि पर्यावरणीय नियमों का उल्लंघन हुआ है या नहीं और जिम्मेदार लोगों पर क्या कार्रवाई की जाएगी।

मध्य प्रदेश के खंडवा में कॉलोनी निर्माण के लिए कथित तौर पर बड़े पैमाने पर पेड़ों को काटे जाने और पहाड़ी को नुकसान पहुंचाने के मामले में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने कड़ा रुख अपनाया है। एनजीटी की सेंट्रल बेंच ने 9 सितंबर 2026 को इस मामले की जांच के लिए तीन सदस्यीय संयुक्त समिति गठित करने का निर्देश दिया है।

समिति को मौके का निरीक्षण कर पूरे मामले की तथ्यात्मक जांच करने को कहा गया है। साथ ही इस बारे में क्या कार्रवाई की गई है उस पर छह सप्ताह के भीतर एनजीटी के समक्ष रिपोर्ट पेश करने का निर्देश दिया है।

ट्रिब्यूनल ने मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, खंडवा के डिविजनल फॉरेस्ट ऑफिसर और खंडवा नगर निगम समेत संबंधित विभागों को भी मामले पर अपनी रिपोर्ट और जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए हैं।

सैकड़ों पेड़ काटने के लगे आरोप

गौरतलब है कि एनजीटी ने यह मामला 29 अगस्त 2026 को दैनिक भास्कर में प्रकाशित एक खबर ‘हरियाली पर कुल्हाड़ी’ के आधार पर उठाया है। खबर में आरोप लगाया गया है कि खंडवा के ओंकारेश्वर रोड-कोठी क्षेत्र में एक कॉलोनी के निर्माण के लिए सैकड़ों पेड़ काट दिए गए हैं।

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रिपोर्ट के मुताबिक, इलाके में मशीनों से लगातार पहाड़ी की खुदाई की जा रही है। इससे न केवल तीर्थस्थल की प्राकृतिक सुंदरता प्रभावित हो रही है, बल्कि पहाड़ी और आसपास की प्राकृतिक पारिस्थितिकी को भी नुकसान पहुंच रहा है।

पर्यावरणीय मंजूरियों पर भी उठे सवाल

खबर में यह भी आरोप लगाया गया है कि निर्माण के दौरान पर्यावरण संबंधी नियमों का पालन नहीं किया गया। पेड़ों की कटाई के साथ पहाड़ी को नुकसान पहुंचाने और तीर्थ क्षेत्र की प्राकृतिक पारिस्थितिकी से छेड़छाड़ की बात सामने आई है।

रिपोर्ट के अनुसार, निर्माण के लिए रेरा (रियल एस्टेट रेगुलेटरी अथॉरिटी), पर्यावरणीय मंजूरी और नगर निकाय के सक्षम प्राधिकारी से आवश्यक अनुमति लिए जाने पर भी सवाल उठे हैं।

अब एनजीटी द्वारा गठित संयुक्त समिति मौके पर जाकर इन आरोपों की वास्तविकता की जांच करेगी। समिति रिपोर्ट से यह स्पष्ट होगा कि निर्माण के दौरान पर्यावरणीय नियमों का उल्लंघन हुआ है या नहीं और यदि हुआ है, तो इसके लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ क्या कार्रवाई की गई है।

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भोपाल की धड़कन 'वन विहार' पर संकट: क्या कंक्रीट के जंगल निगल जाएंगे बेजुबानों का आशियाना?

भोपाल के वन विहार राष्ट्रीय उद्यान और चिड़ियाघर की संवेदनशील पारिस्थितिकी पर बढ़ते निर्माण के खतरे को देखते हुए नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने सख्त रुख अपनाया है। एनजीटी की सेंट्रल जोन बेंच ने 9 सितंबर 2026 को वन विहार के निदेशक और मध्य प्रदेश के मुख्य वन्यप्राणी संरक्षक को वन विहार के इको-सेंसिटिव जोन (ईएसजेड) में कथित अवैध निर्माण की जांच के निर्देश दिए हैं।

ट्रिब्यूनल ने कहा है कि जांच के बाद की गई कार्रवाई की जानकारी तीन महीने के भीतर भोपाल स्थित सेंट्रल जोन बेंच के रजिस्ट्रार को दी जाए।

वन्यजीवों की सुरक्षा के लिए तय हुआ था 100 मीटर का दायरा

यह मामला एक पत्र याचिका के जरिए एनजीटी के सामने पहुंचा। याचिका में कहा गया है कि वन्यजीवों की सुरक्षा और मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने के उद्देश्य से मध्य प्रदेश सरकार ने वन विहार राष्ट्रीय उद्यान की सीमा से 100 मीटर के दायरे को इको-सेंसिटिव जोन (ईएसजेड) घोषित किया है।

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इसका मकसद केवल कागज पर एक सीमा खींचना नहीं, बल्कि संरक्षित क्षेत्र के आसपास ऐसी गतिविधियों पर नियंत्रण रखना है, जिनसे वन्यजीवों, उनके आवास और पूरे पारिस्थितिकी तंत्र पर दबाव बढ़ सकता है।

इको-सेंसिटिव जोन के दायरे में प्रेमपुरा गांव, फिर भी खड़ी हो रही बहुमंजिला इमारतें

जानकारी दी गई है कि वन विहार राष्ट्रीय उद्यान की सीमा तय करने के लिए राजस्व विभाग और वन विभाग की संयुक्त समिति ने सीमांकन किया था। इस प्रक्रिया में सामने आया कि प्रेमपुरा गांव का एक हिस्सा इको-सेंसिटिव जोन के भीतर आता है।

शिकायत में आरोप लगाया गया है कि इसके बावजूद इस प्रतिबंधित क्षेत्र में बड़ी संख्या में अवैध बहुमंजिला इमारतें बनाई जा चुकी हैं। इतना ही नहीं, नए निर्माण का सिलसिला भी लगातार जारी है।

यह स्थिति उस इलाके के लिए गंभीर चिंता पैदा करती है, जहां वन्यजीवों को सुरक्षित रखने और उनके प्राकृतिक आवास को इंसानी दबाव से बचाने के लिए विशेष सुरक्षा व्यवस्था तय की गई है।

सवाल सिर्फ इमारतों का नहीं, वन्यजीवों के सुरक्षित घर का है

शिकायतकर्ता का कहना है कि वन विहार प्रबंधन की ओर से इन निर्माण गतिविधियों को रोकने और यह सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त कार्रवाई नहीं की गई कि राष्ट्रीय उद्यान के पारिस्थितिकी तंत्र पर इनका प्रतिकूल असर न पड़े।

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देखा जाए तो वन विहार जैसे संरक्षित क्षेत्र के आसपास लगातार बढ़ता निर्माण सिर्फ जमीन के इस्तेमाल का मामला नहीं है। इसके पीछे उन वन्यजीवों के सुरक्षित आवास का सवाल भी जुड़ा है, जिनके लिए यह क्षेत्र बनाया गया है। सड़कों, इमारतों और मानवीय गतिविधियों का बढ़ता दबाव उनके प्राकृतिक व्यवहार और आवास को प्रभावित कर सकता है।

इसी चिंता को देखते हुए एनजीटी ने अब संबंधित अधिकारियों को मामले की जांच कर आवश्यक कार्रवाई करने और उसकी रिपोर्ट तय समयसीमा में प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है। आने वाले तीन महीने यह तय करने में अहम होंगे कि इको-सेंसिटिव जोन की सुरक्षा केवल सरकारी अधिसूचना तक सीमित रहती है या जमीन पर भी इसका असर दिखाई देता है।

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