

दार्जिलिंग की बालासन नदी के किनारे हो रहे कथित अवैध रिसॉर्ट निर्माण और रामगंगा नदी में बढ़ते प्रदूषण से जुड़े दो अलग-अलग मामलों ने एक बार फिर देश में नदियों और पर्यावरणीय नियमों की अनदेखी की गंभीर तस्वीर सामने ला दी है।
रिसॉर्ट निर्माण मामले में आरोप है कि नदी के प्राकृतिक बहाव क्षेत्र और इको-सेंसिटिव जोन में निर्माण कर न सिर्फ पर्यावरण कानूनों का उल्लंघन किया गया, बल्कि इससे बाढ़ और आपदा का खतरा भी बढ़ सकता है, जैसा कि 2025 की बाढ़ में संकेत भी मिला।
वहीं दूसरे मामले में रामगंगा नदी में लगातार गिरते घरेलू सीवेज, औद्योगिक अपशिष्ट और ठोस कचरे ने नदी को प्रदूषण की ओर धकेल दिया है, जिसका सीधा असर गंगा नदी पर भी पड़ रहा है।
इन दोनों मामलों पर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल की सख्ती यह दिखाती है कि चाहे पहाड़ी इलाकों में अवैध निर्माण का मामला हो या मैदानी इलाकों में नदियों को प्रदूषित करने का, पर्यावरणीय लापरवाही अब कानूनी जांच के दायरे में है।
ये मामले विकास, प्रशासनिक जिम्मेदारी और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन पर बड़ा सवाल खड़ा करते हैं और चेतावनी देते हैं कि अगर समय रहते ठोस कार्रवाई नहीं हुई, तो इसका खामियाजा प्रकृति, नदियों और मानव जीवन—तीनों को भुगतना पड़ेगा।
दार्जिलिंग जिले के दुधिया गांव में बालासन नदी के किनारे बन रहे एक रिसॉर्ट को लेकर बड़ा पर्यावरणीय विवाद सामने आया है। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) में दायर याचिका का आरोप है कि नदी किनारे “बालासन ब्लूज रिसॉर्ट एंड कैंपिंग” का निर्माण पर्यावरणीय नियमों का खुला उल्लंघन है।
याचिका में कहा गया है कि यह रिसॉर्ट नदी के किनारे कथित रूप से नदी के बहाव क्षेत्र में बनाया जा रहा है, जो पर्यावरण के लिए अत्यंत संवेदनशील क्षेत्र माना जाता है। नियमों के अनुसार ऐसे क्षेत्रों में बिना अनुमति किसी भी प्रकार का निर्माण पूरी तरह प्रतिबंधित है।
क्या बदला नदी का प्राकृतिक बहाव?
याचिका में 6 अक्टूबर 2025 को दुधिया में आई प्राकृतिक आपदा का भी जिक्र किया गया है। भारी बारिश और बाढ़ के कारण दुधिया क्षेत्र को भारी नुकसान हुआ था, प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र प्रभावित हुआ और कई लोगों की जान गई थी। बताया गया कि बाढ़ का पानी बालासन ब्लूज रिसॉर्ट की दीवारों तक पहुंच गया।
आरोप है कि नदी तल पर किए गए अवैध निर्माण के कारण नदी का प्राकृतिक बहाव बदल गया है और नदी ने कई नई धाराएं बना ली हैं।
किन कानूनों के उल्लंघन का आरोप
याचिका में यह भी कहा गया है कि यह निर्माण पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986 का उल्लंघन है, क्योंकि पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र में बिना अनुमति निर्माण प्रतिबंधित है। इसके अलावा वन (संरक्षण) अधिनियम 1980 का भी उल्लंघन बताया गया है, क्योंकि वन भूमि पर बिना अनुमति गैर-वन गतिविधियां और भूमि उपयोग में बदलाव करना अवैध है।
यह भी आरोप है कि रिवर रेगुलेशन जोन (आरआरजेड) नियमों और कोस्टल रेगुलेशन जोन (सीआरजेड) नोटिफिकेशन 2011 का भी उल्लंघन हुआ है, क्योंकि नदी किनारे प्रतिबंधित क्षेत्र में निर्माण गैरकानूनी है। मामले की सुनवाई के दौरान एनजीटी की प्रधान पीठ ने इस मामले को ट्रिब्यूनल की पूर्वी क्षेत्रीय पीठ को स्थानांतरित करने का निर्देश दिया है। अब इस मामले में अगली सुनवाई 24 अप्रैल 2026 को होगी।
यह मामला एक बार फिर पहाड़ी और नदी किनारे के संवेदनशील क्षेत्रों में हो रहे निर्माण और पर्यावरणीय नियमों के पालन पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
रामगंगा प्रदूषण पर सख्त हुआ एनजीटी, केंद्र सहित दो राज्यों से मांगा जवाब
नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने 1 अप्रैल 2026 को रामगंगा नदी में बढ़ते प्रदूषण के मामले में सख्त रुख अपनाते हुए जल संसाधन, नदी विकास और गंगा कायाकल्प मंत्रालय को जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है।
इस मामले में उत्तर प्रदेश सरकार, उत्तराखंड सरकार, उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड तथा काशीपुर, मुरादाबाद, बरेली, बदायूं, शाहजहांपुर और हरदोई के जिला अधिकारियों को भी अपना जवाब दाखिल करने को कहा गया है। सभी पक्षों को मामले पर विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत करने के निर्देश दिए गए हैं। मामले की अगली सुनवाई 3 अगस्त 2026 को होगी।
आवेदक का आरोप है कि रामगंगा में बिना साफ किए घरेलू सीवेज, औद्योगिक अपशिष्ट, ठोस कचरा और अन्य प्रदूषक बड़े पैमाने पर लगातार डाले जा रहे हैं, जिससे नदी में प्रदूषण का स्तर लगातार बढ़ रहा है। नदी किनारे बसे नगर निगमों और औद्योगिक इकाइयों पर भी प्रदूषण फैलाने का आरोप है।
याचिका में खास तौर पर काशीपुर से लेकर मुरादाबाद, बरेली, बदायूं, शाहजहांपुर और हरदोई तक गंगा नदी में बढ़ते प्रदूषण के मुद्दे को प्रमुखता से उठाया गया है, क्योंकि रामगंगा गंगा की प्रमुख सहायक नदी है और इसका प्रदूषण सीधे गंगा नदी को प्रभावित कर रहा है।