

भोपाल में पेड़ों के संरक्षण को लेकर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने सख्त रुख अपनाते हुए स्पष्ट किया है कि न्यायालय के पर्यावरणीय आदेशों की अनदेखी किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं की जाएगी।
ट्रिब्यूनल ने शहरी विकास विभाग, एनएचएआई और पीडब्ल्यूडी से यह बताने को कहा है कि पेड़ों के चारों ओर से कंक्रीट हटाने, जड़ों तक हवा और पानी की प्राकृतिक पहुंच सुनिश्चित करने तथा पेड़ों पर लगे साइनबोर्ड, विज्ञापन और बिजली के तार हटाने के लिए अब तक क्या ठोस कदम उठाए गए हैं।
यह मामला उन शिकायतों के बाद सामने आया, जिनमें बताया गया कि भोपाल के कई पेड़ पूरी तरह कंक्रीट से घिरे होने के कारण “सांस नहीं ले पा रहे” हैं और उनकी जड़ें धीरे-धीरे दम तोड़ रही हैं।
एनजीटी ने पहले भी पेड़ों के चारों ओर कम से कम एक मीटर × एक मीटर खुला स्थान छोड़ने के निर्देश दिए थे, लेकिन उनके पालन पर सवाल उठे हैं।
यह आदेश केवल भोपाल तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए संदेश है कि शहरी विकास और बुनियादी ढांचे का विस्तार प्रकृति की कीमत पर नहीं हो सकता। अब संबंधित विभागों की जवाबदेही और वास्तविक कार्रवाई पर सबकी निगाहें टिकी हैं।
नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने भोपाल और उसके आसपास के इलाकों में पेड़ों के संरक्षण को लेकर कड़ा रुख अपनाया है। ट्रिब्यूनल ने संबंधित अधिकारियों को पेड़ों के आधार को कंक्रीट से मुक्त करने और उन पर लगे साइनबोर्ड व बिजली के तारों को हटाने के लिए उठाए गए कदमों पर विस्तृत रिपोर्ट पेश करने का निर्देश दिया है।
यह निर्देश मध्य प्रदेश के शहरी विकास विभाग के सचिव, भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) और भोपाल लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) को दिए गए हैं।
सांस नहीं ले पा रहे पेड़
यह मामला राज कृष्ण केवट की याचिका पर सुनवाई के दौरान सामने आया। याचिका में बताया गया कि अवधपुरी स्थित बाबूलाल गौर मार्ग पर करीब 25 पेड़ों को पूरी तरह से सीमेंट से घेर दिया गया है। इससे पेड़ों की जड़ों तक पानी और हवा नहीं पहुंच पा रही है, जिससे उनका अस्तित्व खतरे में है।
याचिकाकर्ता के वकील के अनुसार, पूर्व में दिए गए निर्देशों के बावजूद शहरी विकास विभाग, पीडब्ल्यूडी और भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण ने इस पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं की है।
एनजीटी ने पहले भी दिए थे कड़े निर्देश
ट्रिब्यूनल ने इससे पहले शहरी विकास विभाग को आदेश दिया था कि वह ऐसे दिशा-निर्देश जारी करे, जिनके तहत भोपाल और उसके आसपास सड़कों या फुटपाथों पर कहीं भी पेड़ों के चारों ओर पेविंग ब्लॉक या कंक्रीट बिछाते समय कम से कम एक मीटर × एक मीटर का खुला स्थान छोड़ा जाए। इससे पेड़ों की जड़ों तक हवा और पानी का प्राकृतिक प्रवाह बना रह सके।
एनजीटी ने एनएचएआई और पीडब्ल्यूडी को यह भी निर्देश दिया था कि पेड़ों पर लगे सभी प्रकार के साइनबोर्ड, नाम पट्टिकाएं, विज्ञापन, बिजली के तार और हाई-टेंशन केबल तत्काल हटाए जाएं। साथ ही भविष्य में किसी भी प्रकार से पेड़ों को नुकसान पहुंचाने या उन्हें विकृत करने से रोकने के लिए प्रभावी कदम उठाए जाएं।
हालांकि, आवेदक की ओर से ट्रिब्यूनल को बताया गया कि शहरी विकास विभाग, पीडब्ल्यूडी और एनएचएआई ने अब तक इन निर्देशों का पूरी तरह पालन नहीं किया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि पेड़ों के चारों ओर कंक्रीट की परत उनकी जड़ों तक हवा और पानी के प्राकृतिक प्रवाह को रोक देती है, जिससे उनका जीवन संकट में पड़ जाता है।
ऐसे में एनजीटी का यह आदेश केवल भोपाल ही नहीं, बल्कि देश के अन्य शहरों के लिए भी एक महत्वपूर्ण संदेश है कि शहरी विकास की कीमत पेड़ों के जीवन से नहीं चुकाई जा सकती। ऐसे में अब सभी की निगाहें संबंधित विभागों की अगली कार्रवाई पर टिकी हैं।