सदियों पुरानी धरोहर की मरम्मत नहीं, वैज्ञानिक संरक्षण जरूरी: केरल हाईकोर्ट

अम्बलपुझा श्रीकृष्ण स्वामी मंदिर मामले में अदालत ने डीएसआर 2018 के आधार पर तैयार अनुमान पर सवाल उठाते हुए ऐतिहासिक संरचनाओं के लिए वैज्ञानिक संरक्षण पद्धति अपनाने का निर्देश दिया है।
अम्बलपुझा श्रीकृष्ण स्वामी मंदिर, केरल; फोटो: विकीमीडिया कॉमन्स
अम्बलपुझा श्रीकृष्ण स्वामी मंदिर, केरल; फोटो: विकीमीडिया कॉमन्स
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सारांश
  • केरल हाईकोर्ट और नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के हालिया आदेशों ने विरासत संरक्षण और कचरा प्रबंधन, दोनों मोर्चों पर सरकारी तंत्र की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए हैं।

  • अम्बलपुझा श्रीकृष्ण स्वामी मंदिर परिसर की सदियों पुरानी इमारतों को लेकर केरल हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐतिहासिक धरोहर की बहाली सामान्य निर्माण या मरम्मत का काम नहीं है।

  • अदालत ने डीएसआर 2018 के आधार पर तैयार अनुमान पर सवाल उठाते हुए वैज्ञानिक संरक्षण पद्धति, विशेषज्ञों की सलाह, पारंपरिक तकनीकों और मूल स्वरूप से मेल खाती सामग्री के इस्तेमाल पर जोर दिया।

  • वहीं, अन्य मामले में एनजीटी ने दिल्ली की सिंघोला डंप साइट पर जमा कचरे की वास्तविक मात्रा स्पष्ट न होने पर एमसीडी से विस्तृत हलफनामा मांगा है।

  • नरेला-बवाना साइट पर 34,313 मीट्रिक टन आरडीएफ में से 9,654.5 मीट्रिक टन के निपटान की जानकारी सामने आई, लेकिन सिंघोला में जमा कचरे और आरडीएफ की मात्रा रिपोर्ट में दर्ज नहीं थी।

  • दोनों आदेशों का साझा संदेश स्पष्ट है, विरासत हो या कचरा प्रबंधन, सिर्फ कागजी कार्रवाई नहीं, बल्कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण, पारदर्शिता और जवाबदेही जरूरी है।

केरल हाईकोर्ट ने अम्बलपुझा श्रीकृष्ण स्वामी मंदिर परिसर की ऐतिहासिक इमारतों के संरक्षण और बहाली में अधिकारियों के सुस्त रवैये पर सख्त नाराजगी जताई है। अदालत ने कहा कि सदियों पुरानी धरोहर को सामान्य सिविल वर्क की तरह नहीं, बल्कि वैज्ञानिक संरक्षण की विशेषज्ञ प्रक्रिया के तहत बहाल किया जाना चाहिए।

अदालत ने तस्वीरों का अवलोकन करने के बाद पाया कि मंदिर परिसर की मौजूदा इमारतें पारंपरिक टाइलों से बनी हैं, जोकि लकड़ी के शहतीरों पर टिकी हैं। तस्वीरों से साफ है कि इमारतें बेहद जर्जर हालत में हैं और इनके लिए सामान्य मरम्मत नहीं, बल्कि विशेष संरक्षण उपायों की जरूरत है।

अदालत को बताया गया कि इन संरचनाओं की बहाली का अनुमान डीएसआर 2018 के आधार पर तैयार किया गया है।

डीएसआर 2018 पर हाईकोर्ट ने उठाए सवाल

न्यायमूर्ति राजा विजयराघवन वी और न्यायमूर्ति के वी जयकुमार की पीठ ने इस पर गंभीर आपत्ति जताई। अदालत ने कहा कि डीएसआर 2018 (सामान्य सिविल कार्यों के लिए इस्तेमाल होने वाले दरों के पैमाने) मुख्य रूप से सामान्य निर्माण और मरम्मत कार्यों के लिए है। सदियों पुरानी ऐतिहासिक और वास्तुकला की दृष्टि से महत्वपूर्ण इमारत के संरक्षण के लिए इसे आधार बनाना उचित नहीं है।

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हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐसी ऐतिहासिक इमारत की बहाली किसी सामान्य निर्माण परियोजना की तरह नहीं की जा सकती। इसके लिए वैज्ञानिक संरक्षण पद्धति, विशेषज्ञों की सलाह, पारंपरिक निर्माण तकनीकों और मूल स्वरूप से मेल खाते पारंपरिक सामग्रियों का इस्तेमाल जरूरी है, ताकि इमारत की ऐतिहासिक प्रामाणिकता और संरचनात्मक मजबूती बनी रहे।

जर्जर विरासत को चाहिए विज्ञान और परंपरा का मेल

कार्यकारी अभियंता ने अदालत के सामने स्वीकार किया कि पश्चिमी मलिका, दक्षिणी मलिका और पैलेस की प्रस्तावित बहाली के लिए अनुमान तैयार करते समय न तो कोई वैज्ञानिक संरक्षण पद्धति तय की गई थी और न ही कोई समग्र संरक्षण ढांचा तैयार किया गया था।

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कार्यकारी अभियंता ने कहा कि अदालत की टिप्पणियों को ध्यान में रखते हुए आवश्यक दस्तावेज तैयार किए जाएंगे। इसके लिए कुशल संरक्षण वास्तुकारों और पुरातत्व विभाग से सलाह ली जाएगी तथा त्रावणकोर देवस्वम बोर्ड की सहमति के बाद विशेषज्ञों की सेवाएं ली जाएंगी।

हाईकोर्ट ने त्रावणकोर देवस्वम बोर्ड को भी निर्देश दिया कि वह अदालत की टिप्पणियों को गंभीरता से लेते हुए आवश्यक कदम उठाए।

अदालत ने कहा कि पश्चिमी मलिका, दक्षिणी मलिका और पैलेस विशाल ऐतिहासिक, वास्तुशिल्पीय और सांस्कृतिक विरासत को समेटे हुए हैं। इसलिए इनका वैज्ञानिक तरीके से संरक्षण और बहाली की जाए और जहां तक संभव हो, इन्हें उनके मूल गौरव के अनुरूप आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखा जाए।

सिंघोला में कितना कचरा? एनजीटी ने ‘डंप साइट’ में कचरे की ताजा स्थिति पर एमसीडी से मांगी जानकारी

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने दिल्ली नगर निगम (एमसीडी) को निर्देश दिया है कि वह सिंघोला डंप साइट पर जमा कचरे की कुल मात्रा का ब्यौरा हलफनामे के जरिए पेश करे। ट्रिब्यूनल ने यह निर्देश इसलिए दिया क्योंकि एमसीडी की रिपोर्ट में साइट पर जमा कचरे और आरडीएफ (रिफ्यूज डिराइव्ड फ्यूल) की स्थिति स्पष्ट नहीं की गई थी।

यह मामला नगर निगम की 20 अप्रैल 2026 की उस रिपोर्ट से जुड़ा है, जिसमें नरेला-बवाना और सिंघोला साइट पर की गई कार्रवाई की जानकारी दी गई थी।

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एमसीडी के जेई शैलेंद्र कुमार नायक ने अदालत को बताया कि नरेला-बवाना साइट पर अब बिना ट्रीट किया कोई भी कचरा नहीं पड़ा है। वहां केवल आरडीएफ जमा है। रिपोर्ट के अनुसार, कुल 34,313 मीट्रिक टन आरडीएफ में से मार्च 2026 तक 9,654.5 मीट्रिक टन का निपटान किया जा चुका है।

वहीं, सिंघोला साइट को लेकर एमसीडी ने अपनी रिपोर्ट में स्वीकार किया है कि मानसून से पहले नालों की गाद निकालने के तत्काल काम के कारण जुलाई 2025 से वहां फिर से गाद जमा करनी पड़ी। एमसीडी के अधिकारी ने ट्रिब्यूनल को बताया कि सिंघोला में वेस्ट प्रोसेसिंग प्लांट स्थापित करने का काम आवंटित किया जा चुका है और यह प्रक्रिया नवंबर 2026 से शुरू हो जाएगी।

हालांकि, एनजीटी ने पाया कि एमसीडी की रिपोर्ट में सिंघोला साइट पर जमा कचरे और आरडीएफ की वास्तविक मात्रा का कोई उल्लेख नहीं है। ट्रिब्यूनल ने इसी कमी को गंभीरता से लेते हुए एमसीडी से इस संबंध में विस्तृत हलफनामा दाखिल करने को कहा है।

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