दिल्ली में गहराता कचरा संकट: हर दिन सीधे डंपसाइटों में जा रहा है 4,200 टन से अधिक कचरा

डीपीसीसी की रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली में हर दिन 11,852 टन कचरा पैदा हो रहा है, लेकिन निपटान की क्षमता महज 8,173 टन प्रतिदिन है। ऐसे में करीब 36 फीसदी कचरा सीधे डंपसाइटों में जा रहा है
प्रतीकात्मक तस्वीर: आईस्टॉक
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सारांश
  • दिल्ली में कचरा संकट गहराता जा रहा है, जहां हर दिन 4,241 टन कचरा सीधे डंपसाइटों पर फेंका जा रहा है।

  • दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति की रिपोर्ट के अनुसार, राजधानी में हर दिन 11,852 टन कचरा पैदा हो रहा है, लेकिन इसके निपटान की क्षमता इससे कहीं कम है।

  • दिल्ली में कचरे के प्रसंस्करण की कुल क्षमता 8,173 टन प्रतिदिन है, जबकि वास्तव में केवल 7,611 टन यानी करीब 64.2 फीसदी कचरा ही प्रोसेस हो पा रहा है।

  • सीपीसीबी ने माना है कि पैदा हो रहे कचरे और उसके वैज्ञानिक निपटान के बीच बड़ा अंतर बना हुआ है। इस खाई को पाटने के लिए दिल्ली में 2025 से 2028 के बीच 7,750 टन प्रतिदिन अतिरिक्त कचरा प्रसंस्करण क्षमता विकसित करने की योजना बनाई गई है।

दिल्ली में ठोस कचरा प्रबंधन की हकीकत एक बार फिर चिंता बढ़ाने वाली है। दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति (डीपीसीसी) की सालाना रिपोर्ट (2024-25) के मुताबिक, राजधानी में हर दिन 11,852 टन कचरा पैदा हो रहा है, लेकिन इसके निपटान की क्षमता इससे कहीं कम है।

ठोस कचरा प्रबंधन नियम, 2016 के तहत प्रस्तुत इस रिपोर्ट में सामने आया है कि दिल्ली में कचरे के प्रसंस्करण की कुल क्षमता 8,173 टन प्रतिदिन है, जबकि वास्तव में केवल 7,611 टन यानी करीब 64.2 फीसदी कचरा ही प्रोसेस हो पा रहा है।

नतीजा यह है कि हर दिन 4,241 टन यानी करीब 36 फीसदी कचरा सीधे भलस्वा और गाजीपुर की डंपसाइटों पर फेंका जा रहा है। यह जानकारी केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) ने 23 दिसंबर 2025 को नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) में दाखिल अपने जवाब में दी है।

कचरे और क्षमता के बीच बड़ा अंतर

सीपीसीबी ने माना है कि पैदा हो रहे कचरे और उसके वैज्ञानिक निपटान के बीच बड़ा अंतर बना हुआ है। इस खाई को पाटने के लिए दिल्ली में 2025 से 2028 के बीच 7,750 टन प्रतिदिन अतिरिक्त कचरा प्रसंस्करण क्षमता विकसित करने की योजना बनाई गई है।

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केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने रिपोर्ट में यह भी कहा है कि इस मामले में दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति (डीपीसीसी) की भूमिका बेहद अहम है, क्योंकि ठोस कचरा प्रबंधन नियम, 2016 के तहत कचरे के संग्रह, भंडारण, छंटाई, परिवहन, प्रसंस्करण और निपटान से जुड़ा ढांचा विकसित करना उनकी साझा कानूनी जिम्मेदारी है। इन नियमों का प्रभावी क्रियान्वयन जरूरी है।

दक्षिण-पूर्वी दिल्ली में हालात बदतर

गौरतलब है कि यह मामला खास तौर पर दक्षिण-पूर्वी दिल्ली के शाहीन बाग और सरिता विहार जैसे इलाकों से जुड़ा है, जहां शिकायत की गई है कि कई-कई दिनों तक कचरा नहीं उठाया जाता, जिससे दुर्गंध फैलती है और लोगों का जीना मुश्किल हो जाता है।

सीपीसीबी ने याद दिलाया है कि जल और वायु अधिनियम के तहत गठित राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और प्रदूषण नियंत्रण समितियां अपने-अपने क्षेत्रों में इन कानूनों को लागू कराने और उनका पालन सुनिश्चित कराने के लिए सशक्त हैं।

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किसकी क्या जिम्मेदारी?

देश में ठोस कचरे के सुरक्षित और वैज्ञानिक प्रबंधन के लिए पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने ठोस कचरा प्रबंधन नियम, 2016 लागू किए हैं। इसके नियम 11(1) के अनुसार, दिल्ली सरकार का शहरी विकास विभाग यह सुनिश्चित करेगा कि दिल्ली के संबंधित स्थानीय निकाय इन नियमों का पालन करें।

इसके साथ ही, स्थानीय निकाय के रूप में दिल्ली नगर निगम (एमसीडी) पर नगर निगम क्षेत्र में पैदा होने वाले कचरे के संग्रह, छंटाई, परिवहन, भंडारण और प्रसंस्करण की मुख्य जिम्मेदारी है। साथ ही, कचरा प्रसंस्करण संयंत्रों और डंपसाइटों के संचालन और रखरखाव की जिम्मेदारी भी एमसीडी की है।

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नियमों के अनुसार, अपने-अपने क्षेत्रों में इन नियमों को लागू कराने और उनका पालन सुनिश्चित कराने की जिम्मेदारी संबंधित राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड या प्रदूषण नियंत्रण समिति की होती है, जो दिल्ली के मामले में दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति (डीपीसीसी) की है।

यह मामला एनजीटी में अब भी विचाराधीन है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि जब नियम, जिम्मेदारियां और योजनाएं मौजूद हैं, तो दिल्ली का कचरा हर दिन पहाड़ क्यों बनता जा रहा है?

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