

जुलाई 2026 ने भारतीय मानसून को लेकर बनी कई पुरानी धारणाओं को चुनौती दे दी है। मौसम विभाग ने जहां जुलाई में सामान्य से कम बारिश का अनुमान लगाया था, वहीं 1 से 26 जुलाई के बीच देश में 238.2 मिमी बारिश दर्ज की गई, जो सामान्य (233.9 मिमी) से अधिक रही।
इसका सबसे बड़ा असर यह हुआ कि जून के अंत तक 40 फीसदी तक पहुंचा देश का वर्षा घाटा घटकर 16 फीसदी रह गया।
हालांकि तस्वीर पूरे देश में एक जैसी नहीं है। देश के करीब 60% हिस्से में सामान्य या उससे अधिक बारिश हुई, जबकि पूर्वोत्तर और दक्षिण भारत अब भी बड़े वर्षा घाटे से जूझ रहे हैं। कई राज्यों में भारी बारिश ने बाढ़ और भूस्खलन जैसी आपदाएं भी पैदा कीं।
वैज्ञानिकों का कहना है कि यह बदलाव केवल अल नीनो की कहानी नहीं है। जलवायु परिवर्तन, गर्म होते महासागर, पश्चिमी प्रशांत का बढ़ता तापमान, सक्रिय मानसूनी प्रणालियां और बदलते पश्चिमी विक्षोभ मिलकर मानसून के नए स्वरूप को आकार दे रहे हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार अब सबसे बड़ी चुनौती केवल यह अनुमान लगाना नहीं है कि कितनी बारिश होगी, बल्कि यह समझना है कि बारिश कब, कहां और कितनी तीव्र होगी, क्योंकि यही भविष्य में कृषि, जल सुरक्षा और आपदा प्रबंधन की दिशा तय करेगा।
मौसम विभाग सहित वैज्ञानिकों ने जिस जुलाई के लिए सामान्य से कम बारिश का अनुमान लगाया था, उसी जुलाई ने मानसून के पूरे गणित को ही बदल दिया।
अल नीनो के मजबूत होते असर के बावजूद देश में लगातार सक्रिय रही मानसूनी प्रणालियों की वजह से देश के कई हिस्सों में जुलाई के दौरान झमाझम बारिश हुई। क्लाइमेट ट्रेंड ने भी इस बारे में जारी अपनी नई रिपोर्ट में खुलासा किया है कि जुलाई में सामान्य से अधिक बारिश ने जून के अंत तक मानसूनी बारिश में आए 40 फीसदी के घाटे को कम करके 16 फीसदी पर ला दिया है। मतलब की मानसून धीरे-धीरे सामान्य ढर्रे पर लौट रहा है।
यह अपने आप में बेहद चौंकाने वाला है, क्योंकि वैज्ञानिकों सहित भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) ने भी जुलाई महीने में दीर्घकालिक औसत (एलपीए) से 94 फीसदी कम बारिश का अनुमान जताया था।
रुझानों से पता चला है कि देश में 1 से 26 जुलाई 2026 के बीच करीब 238.2 मिलीमीटर बारिश दर्ज की गई, जोकि सामान्य (233.9 मिलीमीटर) से करीब दो फीसदी अधिक है। हालांकि देखने में यह अंतर छोटा लग सकता है, लेकिन जब अल नीनो के चलते जुलाई में बारिश में कमी की आशंका जताई जा रही हो तो ये वृद्धि भी हैरान कर देने वाली है। इसकी वजह से कई राज्यों में तो बाढ़ जैसे हालात बन गए हैं।
वैज्ञानिकों का भी कहना है कि यह केवल मानसून की वापसी नहीं, बल्कि इस बात का संकेत है कि जलवायु परिवर्तन अब भारतीय मानसून के स्वभाव को बदल रहा है। उनके मुताबिक जलवायु परिवर्तन और गर्म होते महासागर अब मानसून की दिशा और तीव्रता को तय करने में पहले से कहीं बड़ी भूमिका निभा रहे हैं।
हालांकि बारिश का यह गणित इतना सरल भी नहीं है। क्लाइमेट ट्रेंड के मुताबिक जुलाई में जहां देश के 60 हिस्से में सामान्य या उससे अधिक बारिश दर्ज की गई, वहीं दूसरी तरफ पूर्वोत्तर और दक्षिणी राज्य अब भी सूखे जैसे हालात झेल रहे हैं
रुझान दर्शाते हैं कि जुलाई के दौरान महाराष्ट्र, गुजरात, असम, ओडिशा, जम्मू-कश्मीर और हिमाचल प्रदेश में कई दौर की भारी से अत्यधिक भारी बारिश दर्ज की गई। इसके परिणामस्वरूप 29 जुलाई तक 15 राज्यों में सामान्य और चार राज्यों में सामान्य से अधिक या भारी वर्षा रिकॉर्ड की गई, जो देश के करीब 60 फीसदी हिस्से को कवर करते हैं। हालांकि तस्वीर पूरे देश में एक जैसी नहीं है। 17 राज्यों में अब भी बारिश सामान्य से कम है, जो देश के 36 फीसदी हिस्से का प्रतिनिधित्व करते हैं।
आईएमडी के अनुसार उत्तर-पश्चिम भारत में सामान्य से करीब 10 फीसदी कम बारिश हुई है। वहीं मध्य भारत में यह आंकड़ा एक फीसदी दर्ज किया गया, जो करीब-करीब सामान्य के आसपास ही है। इसके विपरीत, पूर्व और पूर्वोत्तर भारत में बारिश का यह घाटा 30 फीसदी जबकि दक्षिण प्रायद्वीपीय भारत में 26 फीसदी दर्ज किया गया है।
यानी देश के एक हिस्से में जहां बाढ़ जैसे हालात हैं तो दूसरे हिस्से में अब भी बारिश का इंतजार जारी है। यह महज बारिश के आंकड़े नहीं हैं, यह इस बात का सबूत है कि कैसे जलवायु परिवर्तन के कारण अब बारिश किसी एक जगह पर विनाशकारी रूप से बरसती है और दूसरी जगह सूखी रह जाती है।
क्यों अबूझ होता जा रहा है मानसून?
इन सबके बीच सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर क्यों मानसून को समझना इतना जटिल होता जा रहा है।
वैज्ञानिकों का भी कहना है कि इस साल केवल अल नीनो के आधार पर मानसून को समझना संभव नहीं रहा। आईएमडी के पूर्व महानिदेशक डॉक्टर के जे रमेश ने रिपोर्ट में जानकारी दी है कि पश्चिमी प्रशांत महासागर (फिलीपींस के पश्चिम हिस्से में) का असामान्य रूप से गर्म होना इस साल भारत में मानसून के लिए बड़ा सहारा बना।
म्यांमार के रास्ते आए दो डिप्रेशन और एक निम्न दबाव क्षेत्र उत्तर बंगाल की खाड़ी में फिर मजबूत हो गए और पूरे भारतीय प्रायद्वीप में भारी बारिश का कारण बने।
उन्होंने बताया कि मानसून के दौरान सक्रिय रहे पश्चिमी विक्षोभ (वेस्टर्न डिस्टर्बेंस) अरब सागर से अतिरिक्त नमी लेकर आए, जिससे महाराष्ट्र और गुजरात में भारी बारिश हुई। यही सिस्टम आगे हिमालय तक पहुंचे और पूर्वोत्तर भारत में बाढ़ जैसी स्थिति बनती देखी गई। उनका कहना है कि मौजूदा जलवायु मॉडल इन बदलते कारकों को पूरी तरह समझ नहीं पा रहे हैं।
हालात यह रहे कि पूर्वोत्तर भारत में अब भी बारिश सामान्य से कम है, लेकिन कम समय में हुई तेज मूसलाधार बारिश ने हिमालयी राज्यों और तराई क्षेत्रों में बाढ़ और भूस्खलन जैसी कई चरम मौसम की घटनाओं को जन्म दिया। मीडिया में छपी खबरों के मुताबिक, असम पिछले कई वर्षों की सबसे भीषण बाढ़ से जूझ रहा है, जिसमें अब तक करीब 75 लोगों की मौत हो चुकी है और तीन लाख से अधिक लोग प्रभावित हुए हैं।
जलवायु परिवर्तन बना चरम बारिश का 'एम्प्लीफायर'
यूनिवर्सिटी ऑफ रीडिंग के वैज्ञानिक डॉक्टर अक्षय देवरस देओरस का कहना है, "अल नीनो वाले वर्ष में मानसून का इतना सक्रिय रहना हैरान करने वाला है। उनके अनुसार, भारतीय महासागर द्विध्रुव (आईओडी) और मैडन-जूलियन ऑसिलेशन (एमजेओ) फिलहाल बहुत मजबूत स्थिति में नहीं हैं, फिर भी मानसून लगातार सक्रिय बना हुआ है। इससे संकेत मिलता है कि जलवायु परिवर्तन की भूमिका को अब नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।"
बता दें कि मैडन-जूलियन ऑसिलेशन, उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में बादलों, बारिश, हवाओं और वायुमंडलीय दबाव का एक पूर्व की ओर बढ़ने वाला चक्र है।
विशेषज्ञों के मुताबिक अल नीनो वर्ष में मानसून का ऐसा प्रदर्शन हैरान करने वाला है। अभी दो सप्ताह पहले महाराष्ट्र में मूसलाधार बारिश हुई थी। इसके बाद थोड़े समय के लिए बारिश थमी, लेकिन मानसून ने तेजी से फिर रफ्तार पकड़ ली और अब वह पूरी तरह सक्रिय, बल्कि बेहद मजबूत स्थिति में है।
पिछले सप्ताह गुजरात के वलसाड जिले के उमरगाम में 24 घंटे में 1,064 मिमी बारिश दर्ज की गई, जो 1901 के बाद भारत में 24 घंटे में हुई तीसरी सबसे अधिक बारिश है।
आईएमडी के वैज्ञानिक डॉक्टर अखिल श्रीवास्तव के मुताबिक भूमि और समुद्र के बढ़ते तापमान के कारण वातावरण में नमी की मात्रा बढ़ रही है। ऐसे में जब भी कई मानसूनी प्रणालियां एक साथ सक्रिय होती हैं तो वे पहले की तुलना में कहीं अधिक नमी जुटा लेती हैं, जिससे भारी बारिश की घटनाएं बढ़ जाती हैं। उनके अनुसार, जलवायु परिवर्तन अब चरम मौसमी घटनाओं को और तीव्र बना रहा है।
भारतीय महासागर द्विध्रुव को लेकर बनी हुई है अनिश्चितता
इस वर्ष हिन्द महासागर द्विध्रुव (आईओडी) को लेकर वैज्ञानिकों की राय एक जैसी नहीं है। कुछ मॉडल इसके सकारात्मक चरण में जाने का संकेत दे रहे हैं, जबकि कुछ इसे तटस्थ स्थिति में मान रहे हैं। डॉक्टर रमेश का मानना है कि समुद्र की सतह के तापमान को देखें तो परिस्थितियां पहले से ही सकारात्मक आईओडी जैसी दिखाई दे रही हैं, जिसने जुलाई में मानसून को मजबूती देने में मदद की है।
वैज्ञानिकों का कहना है कि भविष्य में जलवायु परिवर्तन के कारण बेहद शक्तिशाली आईओडी घटनाओं की आवृत्ति 66 फीसदी तक बढ़ सकती है, जबकि सामान्य आईओडी घटनाएं कम हो सकती हैं।
पश्चिमी विक्षोभ भी बदल रहे अपना व्यवहार
विशेषज्ञों के अनुसार, जलवायु परिवर्तन केवल मानसून को ही नहीं, बल्कि पश्चिमी विक्षोभों के स्वभाव को भी बदल रहा है।
भारतीय भूचुंबकत्व संस्थान के निदेशक प्रोफेसर ए पी डिमरी के मुताबिक, उपोष्णकटिबंधीय पश्चिमी जेट का विस्तार बढ़ने से पश्चिमी विक्षोभ अब मानसून के साथ पहले से ज्यादा गहराई से जुड़ रहे हैं।
इसके कारण हिमालयी क्षेत्रों और पूर्वोत्तर भारत में बाढ़, भूस्खलन और भारी वर्षा की घटनाएं बढ़ रही हैं। गौरतलब है कि उपोष्णकटिबंधीय पश्चिमी जेट, ऊपरी क्षोभमंडल में करीब 25 से 35 डिग्री उत्तर अक्षांशों के बीच 12 से 14 किमी की ऊंचाई पर पश्चिम से पूर्व की ओर बहने वाली तीव्र वायु धाराएं हैं।
अब बदलनी होगी मानसून को लेकर पुरानी सोच
जुलाई 2026 की यह बारिश केवल एक सुखद संयोग नहीं, बल्कि बदलते जलवायु दौर की स्पष्ट चेतावनी है। मानसून 2026 ने दिखा दिया है कि भारतीय मानसून के पुराने नियम अब तेजी से बदल रहे हैं। अब मानसून की कहानी केवल अल नीनो नहीं लिखता, बल्कि जलवायु परिवर्तन, गर्म होते महासागर और बदलते वायुमंडलीय पैटर्न मिलकर उसका नया स्वरूप तय कर रहे हैं।
ऐसे में सबसे बड़ी चुनौती केवल यह अनुमान लगाना नहीं रह गई है कि कितनी बारिश होगी, बल्कि यह समझना है कि बारिश कब, कहां और कितनी तीव्र या विनाशकारी होगी। यही समझ आने वाले समय में कृषि, जल सुरक्षा, शहरों की तैयारी और आपदा प्रबंधन की सबसे बड़ी कसौटी बनेगी।