गर्म होते समुद्र ने बदला मानसून का मिजाज, भारत में बारिश का बदल रहा है रास्ता

बंगाल की खाड़ी में मानसूनी डिप्रेशन की संख्या में करीब 62 फीसदी की गिरावट, ओडिशा, मध्य भारत और गंगा के मैदानी इलाकों में बारिश घटी; दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों में बढ़ी वर्षा
बंगाल की खाड़ी में मानसूनी डिप्रेशन की संख्या 1980 के दशक के 26 से घटकर 2010-20 के दौरान सिर्फ 10 रह गई।
बंगाल की खाड़ी में मानसूनी डिप्रेशन की संख्या 1980 के दशक के 26 से घटकर 2010-20 के दौरान सिर्फ 10 रह गई।फोटो साभार: आईस्टॉक
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सारांश
  • बंगाल की खाड़ी में मानसूनी डिप्रेशन की संख्या 1980 के दशक के 26 से घटकर 2010-20 के दौरान सिर्फ 10 रह गई।

  • हिंद-प्रशांत महासागर में असमान तापमान वृद्धि से वॉकर और हैडली वायुमंडलीय परिसंचरण कमजोर पड़ रहे हैं।

  • कमजोर हवाओं और कम नमी के ऊपर उठने से बंगाल की खाड़ी में मानसूनी डिप्रेशन बनने की संभावना घटी है।

  • ओडिशा, मध्य भारत और गंगा के मैदानी इलाकों में बारिश घटी, जबकि प्रायद्वीपीय भारत के कुछ हिस्सों में बढ़ी।

  • मानसूनी प्रणाली में बदलाव से खेती, भूजल पुनर्भरण, जलाशयों और देश की जल सुरक्षा पर असर पड़ने की आशंका है।

भारत के मानसून का मिजाज बदल रहा है। समुद्र का तापमान बढ़ रहा है, वातावरण में नमी भी पहले से ज्यादा है, लेकिन इसके बावजूद मानसून को ताकत देने वाले मौसमी प्रणाली कमजोर पड़ रहे हैं। नतीजा यह है कि देश के कई हिस्सों में बारिश का पुराना पैटर्न बदल रहा है। खासकर बंगाल की खाड़ी से उठकर देश के भीतर तक पहुंचने वाले मानसूनी डिप्रेशन अब पहले की तुलना में काफी कम बन रहे हैं।

एक नए अध्ययन में यह चौंकाने वाला बदलाव सामने आया है। शोधकर्ताओं के मुताबिक, 1980 के दशक में बंगाल की खाड़ी में 26 मानसूनी डिप्रेशन बने थे, जबकि 2010 से 2020 के बीच इनकी संख्या घटकर महज 10 रह गई। यानी करीब 62 फीसदी की गिरावट। सबसे ज्यादा कमी अगस्त में दर्ज की गई है। यह वही महीना है, जब आमतौर पर ऐसे सिस्टम सबसे अधिक सक्रिय रहते हैं।

यह अध्ययन जर्नल ऑफ अर्थ सिस्टम साइंस में प्रकाशित किया गया है। इसमें 1980 से 2020 तक के 40 वर्षों के मौसम संबंधी आंकड़ों का विश्लेषण किया गया है। शोधकर्ताओं ने यह समझने की कोशिश की कि समुद्र का तापमान बढ़ने के बावजूद मानसूनी डिप्रेशन कम क्यों हो रहे हैं।

आखिर क्या हैं मानसूनी डिप्रेशन?

मानसूनी डिप्रेशन बंगाल की खाड़ी के ऊपर बनने वाले कम दबाव के मजबूत मौसमी प्रणालियां होते हैं। ये समुद्र से नमी लेकर जमीन की ओर बढ़ते हैं और कई दिनों तक बड़े इलाके में बारिश कराते हैं। पूर्वी, मध्य और उत्तरी भारत में मानसूनी बारिश का बड़ा हिस्सा इन्हीं के कारण होता है।

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बंगाल की खाड़ी में मानसूनी डिप्रेशन की संख्या 1980 के दशक के 26 से घटकर 2010-20 के दौरान सिर्फ 10 रह गई।

इनका कमजोर होना केवल मौसम का बदलाव नहीं है, बल्कि खेती, जल स्रोतों और करोड़ों लोगों की पानी की जरूरतों से जुड़ा मामला है।

गर्म समुद्र, लेकिन कमजोर मानसून प्रणाली

आमतौर पर माना जाता है कि समुद्र का तापमान बढ़ने से वातावरण में नमी और ऊर्जा बढ़ती है। इससे बारिश की संभावना भी बढ़नी चाहिए। लेकिन इस अध्ययन ने एक अलग तस्वीर दिखाई है।

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शोधकर्ताओं के मुताबिक, पूरे हिंद-प्रशांत क्षेत्र में समुद्र का तापमान एक समान नहीं बढ़ा है। भूमध्यरेखीय हिंद महासागर और पश्चिमी प्रशांत महासागर बंगाल की खाड़ी के उत्तरी हिस्से की तुलना में ज्यादा गर्म हुए हैं।

यही असमान गर्मी वातावरण के बड़े मौसमी चक्रों को प्रभावित कर रही है। वॉकर और हैडली परिसंचरण कहलाने वाली ये वायुमंडलीय प्रणालियां पृथ्वी पर गर्मी और नमी के वितरण में अहम भूमिका निभाती हैं।

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इनके कमजोर पड़ने से बंगाल की खाड़ी के ऊपर हवाओं का आपसी मिलन यानी अभिसरण कम हो गया है। समुद्र की सतह से नम हवा का ऊपर उठना भी घटा है। नतीजतन, मानसूनी डिप्रेशन बनने के लिए जरूरी परिस्थितियां कमजोर पड़ रही हैं।

शोधकर्ताओं ने समुद्र की सतह के पास कमजोर होते चक्रवाती परिसंचरण को डिप्रेशन की संख्या में गिरावट की प्रमुख वजह बताया है।

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कहीं बारिश कम, कहीं ज्यादा

इस बदलाव का असर भारत में बारिश के वितरण पर भी दिखाई दे रहा है। अध्ययन के अनुसार, मानसूनी डिप्रेशन के सामान्य रास्तों पर पड़ने वाली बारिश में कमी आई है। ओडिशा, मध्य भारत और गंगा के मैदानी इलाकों में इसका असर खास तौर पर देखा गया है।

इसके उलट, प्रायद्वीपीय भारत के कुछ हिस्सों में बारिश बढ़ी है। यानी देश में बारिश हर जगह एक जैसी कम नहीं हो रही, बल्कि उसका भौगोलिक वितरण बदल रहा है।

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यह बदलाव इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत की खेती का बड़ा हिस्सा मानसून पर निर्भर है। जिन इलाकों में लगातार कई दिनों तक बारिश होती थी, वहां अब बारिश का समय, अवधि और मात्रा प्रभावित हो सकती है।

खेती और पानी पर पड़ सकता है असर

मानसूनी डिप्रेशन की कमी से खेती, भूजल रिचार्ज और जलाशयों में पानी की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है। खासकर वे इलाके ज्यादा प्रभावित हो सकते हैं, जहां सिंचाई के साधन सीमित हैं और किसान बारिश पर निर्भर रहते हैं।

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लगातार होने वाली बारिश की जगह अगर कम समय में तेज बारिश होती है, तो पानी जमीन में समाने के बजाय बह सकता है। इससे एक ओर बाढ़ का खतरा बढ़ सकता है, तो दूसरी ओर भूजल रिचार्ज और जल उपलब्धता की चुनौतियां भी पैदा हो सकती हैं।

यह अध्ययन भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान (आईआईटीएम), पुणे, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय और केंद्रीय हरियाणा विश्वविद्यालय से जुड़े शोधकर्ताओं ने किया है।

इस शोध का सबसे बड़ा संदेश साफ है: जलवायु परिवर्तन का असर केवल तापमान बढ़ने तक सीमित नहीं है। यह मानसून की पूरी व्यवस्था को प्रभावित कर रहा है। भारत के लिए अब चुनौती सिर्फ बारिश की मात्रा नहीं, बल्कि यह भी है कि बारिश कहां, कब और कितनी देर तक होती है।