

नए शोध के मुताबिक, हिंद महासागर के तापमान में बदलाव यूरोप के दिसंबर के मौसम को प्रभावित कर सकता है।
सकारात्मक इंडियन ओशन डाइपोल के दौरान उत्तरी अटलांटिक के कुछ हिस्सों में अधिक, जबकि भूमध्यसागर में कम बारिश का संबंध मिला।
शोधकर्ताओं ने सकारात्मक आईओडी के दौरान पूर्वी अटलांटिक और पश्चिमी भूमध्यसागर में चक्रवातों की गतिविधियां घटने का संबंध पाया।
1979 से 2024 तक के आंकड़ों के विश्लेषण में हिंद महासागर और यूरोपीय मौसम का संबंध दिसंबर में सबसे मजबूत दिखा।
यह शोध मौसम के दूरस्थ संबंध समझने में मददगार है, लेकिन पूर्वानुमान की सटीकता बढ़ाने के लिए आगे परीक्षण जरूरी हैं।
यूरोप में सर्दी का मौसम आते ही आमतौर पर अटलांटिक महासागर से उठने वाले तूफानों, उत्तर से आने वाली ठंडी हवाओं और भूमध्य सागर के आसपास होने वाली बारिश की चर्चा होती है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि भारत के दक्षिण में फैले हिंद महासागर में होने वाली हलचल का असर यूरोप के मौसम पर भी पड़ सकता है? सुनने में यह बात थोड़ी अजीब लग सकती है, लेकिन वैज्ञानिकों के एक नए अध्ययन ने इसी दिलचस्प संबंध पर रोशनी डाली है।
जियोफिजिकल रिसर्च लेटर्स में प्रकाशित इस शोध में वैज्ञानिकों ने पाया कि हिंद महासागर में समुद्र के तापमान का एक खास पैटर्न यूरोप में दिसंबर की बारिश और तूफानों की गतिविधियों से जुड़ा हो सकता है। यानी यूरोप के सर्द मौसम की कहानी सिर्फ उसके आसपास के समुद्रों और हवाओं तक सीमित नहीं है। इसके कुछ सुराग हजारों किलोमीटर दूर उष्णकटिबंधीय हिंद महासागर में भी छिपे हो सकते हैं।
हिंद महासागर की कौन-सी हलचल है खास?
इस कहानी के केंद्र में है ‘इंडियन ओशन डाइपोल’ (आईओडी)। आसान भाषा में समझें तो यह हिंद महासागर के पश्चिमी और पूर्वी हिस्सों के समुद्री तापमान के बीच का अंतर है।
जब पश्चिमी हिंद महासागर का पानी पूर्वी हिस्से के मुकाबले ज्यादा गर्म होता है, तो इसे आईओडी की सकारात्मक अवस्था कहा जाता है। इसके उलट स्थिति नकारात्मक अवस्था कहलाती है। इस बदलाव का असर आमतौर पर उत्तरी गोलार्ध की शरद ऋतु यानी सितंबर से नवंबर के आसपास सबसे अधिक दिखाई देता है।
समुद्र का तापमान बदलने से हवा के उठने, बादल बनने और बारिश होने के तरीके भी बदल सकते हैं। उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में बारिश के दौरान निकलने वाली गर्मी वायुमंडल में हलचल पैदा करती है। यही हलचल हवा के बड़े प्रवाह को प्रभावित कर सकती है और उसका असर दूर-दराज के इलाकों तक पहुंच सकता है।
वैज्ञानिक इस तरह के दूरस्थ संबंध को ‘टेली-कनेक्शन’ कहते हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि हिंद महासागर का पानी सीधे यूरोप पहुंचकर वहां बारिश बन जाता है। असल कहानी हवाओं और वायुमंडलीय परिसंचरण में होने वाले बदलावों की है।
दिसंबर में दिखा सबसे दिलचस्प संकेत
शोधकर्ताओं ने 1979 से 2024 तक के आंकड़ों का अध्ययन किया। इसमें वायुमंडलीय दबाव, बारिश की मात्रा, बारिश वाले दिनों की संख्या, लगातार गीले दिनों की अवधि और उत्तरी अटलांटिक से लेकर यूरोप तथा भूमध्य सागर तक चक्रवातों की गतिविधियों को देखा गया।
अध्ययन में सबसे स्पष्ट संबंध दिसंबर के महीने में दिखाई दिया। सकारात्मक आईओडी की स्थिति के दौरान उत्तरी अटलांटिक के कुछ हिस्सों में अपेक्षाकृत ज्यादा बारिश, जबकि पश्चिमी-मध्य भूमध्यसागरीय क्षेत्र में कम बारिश होने का संबंध सामने आया।
यह बदलाव सिर्फ कुल बारिश तक सीमित नहीं था। बारिश कितने दिनों तक हुई, कितने दिन मौसम गीला रहा और लगातार बारिश का दौर कितनी लंबी अवधि तक चला, इन पहलुओं में भी अंतर दिखाई दिया।
शोधकर्ताओं ने पूर्वी अटलांटिक और पश्चिमी भूमध्य सागर के ऊपर चक्रवातों की गतिविधियों में कमी का संबंध भी पाया। हालांकि, सर्दी आगे बढ़ने के साथ यह संकेत कमजोर पड़ गया।
तूफानों के पीछे हवाओं का खेल
बारिश और तूफानों को समझने के लिए सिर्फ बादलों या मौसम के नक्शे को देखना काफी नहीं होता। वैज्ञानिकों ने उन परिस्थितियों का भी अध्ययन किया जिनमें तूफान पैदा होते हैं और ताकत पकड़ते हैं।
गर्म और ठंडी हवा के बीच तापमान का अंतर तथा ऊंचाई के साथ हवा की गति और दिशा में बदलाव तूफानों के विकास में अहम भूमिका निभाते हैं। इन परिस्थितियों में बदलाव होने पर चक्रवातों की गतिविधियां भी बदल सकती हैं। यही कारण है कि हिंद महासागर में होने वाला बदलाव यूरोप के मौसम को समझने के लिए एक अतिरिक्त सुराग दे सकता है।
क्या इससे मौसम का सटीक पूर्वानुमान लगेगा?
यहां सावधानी जरूरी है। शोध में सामने आए संबंध का मतलब यह नहीं है कि हिंद महासागर में सकारात्मक आईओडी होते ही यूरोप में दिसंबर का मौसम तय हो जाएगा। अल नीनो जैसे दूसरे जलवायु कारक और मौसम की स्वाभाविक अनिश्चितता भी अपना असर डालते हैं। वैज्ञानिकों ने यह भी साबित नहीं किया है कि इस जानकारी को जोड़ने से मौसम का पूर्वानुमान अधिक सटीक हो जाता है।
फिर भी यह अध्ययन एक महत्वपूर्ण रास्ता दिखाता है। भविष्य में वैज्ञानिक यह जांच सकते हैं कि हिंद महासागर की स्थिति को ध्यान में रखकर यूरोप के किन क्षेत्रों में बारिश और तूफानों का बेहतर अनुमान लगाया जा सकता है। कुल मिलाकर, यूरोप की सर्दी को समझने के लिए अब नजर सिर्फ अटलांटिक पर टिकाए रखना काफी नहीं हो सकता। कभी-कभी दिसंबर के मौसम के कुछ संकेत हजारों किलोमीटर दूर हिंद महासागर में, शरद ऋतु के दौरान ही बनने लगते हैं।