

बढ़ता तापमान भारत के कई जिलों में सतही पानी और वनस्पति की सेहत को तेजी से प्रभावित कर रहा है।
सामान्य से अधिक बारिश पानी और हरियाली बढ़ाती है, लेकिन अत्यधिक बारिश जलभराव और मिट्टी कटाव जैसी समस्याएं पैदा करती है।
ठंडे और तापमान स्थिर रहने वाले जिले अचानक बढ़ती गर्मी के प्रति ज्यादा संवेदनशील पाए गए हैं।
सूखे और अर्ध-शुष्क इलाकों में अतिरिक्त बारिश से वनस्पति को अपेक्षाकृत अधिक फायदा मिलता है और पानी की कमी घटती है।
अध्ययन के अनुसार जलवायु बदलाव से निपटने के लिए जिलों की स्थानीय परिस्थितियों के आधार पर योजनाएं बनाना जरूरी है।
भारत में बदलता मौसम अब सिर्फ तापमान और बारिश का मामला नहीं रह गया है। इसका सीधा असर पानी और हरियाली पर भी दिखाई दे रहा है। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) खड़गपुर के शोधकर्ताओं के एक नए अध्ययन ने देश के अलग-अलग जिलों में जलवायु बदलाव के असर को विस्तार से समझने की कोशिश की है। अध्ययन में 2014 से 2022 के बीच 471 जिलों के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। यह अध्ययन एनवायर्नमेंटल मॉनिटरिंग एंड असेसमेंट नामक पत्रिका में प्रकाशित किया गया है।
गर्मी बढ़ी तो घटा पानी और वनस्पति
अध्ययन में पाया गया कि सामान्य से अधिक तापमान का पानी और वनस्पति, दोनों पर बुरा असर पड़ता है। तापमान में मामूली बढ़ोतरी के साथ सतही जल सूचकांक में करीब 0.9 प्रतिशत की कमी देखी गई। वहीं, वनस्पति स्वास्थ्य को दर्शाने वाले सूचकांक में चार प्रतिशत से अधिक की गिरावट दर्ज की गई।
शोधकर्ताओं के अनुसार, अधिक गर्मी से जमीन और पौधों से पानी तेजी से वाष्पित होता है। इससे मिट्टी में नमी कम होती है और छोटे तालाबों तथा अन्य उथले जल स्रोतों के सूखने की रफ्तार बढ़ जाती है। इसका असर सीधे पेड़-पौधों और फसलों की सेहत पर पड़ता है।
बारिश भी हमेशा फायदेमंद नहीं
अध्ययन में बारिश और सतही पानी के बीच एक दिलचस्प संबंध सामने आया है। सामान्य से थोड़ी अधिक बारिश होने पर जल स्रोतों में पानी बढ़ता है और पौधों को भी फायदा मिलता है। लेकिन बहुत ज्यादा बारिश होने पर स्थिति बदल सकती है।
अत्यधिक बारिश से पानी तेजी से बह जाता है। इससे मिट्टी का कटाव, जलभराव और मिट्टी में जरूरत से ज्यादा पानी भरने जैसी समस्याएं पैदा हो सकती हैं। ऐसे हालात में पौधों की वृद्धि प्रभावित होती है और सतही जल में भी अपेक्षित बढ़ोतरी नहीं दिखाई देती।
इसका मतलब है कि केवल अधिक बारिश को पानी की उपलब्धता के लिए अच्छा नहीं माना जा सकता। बारिश कब, कितनी और किस क्षेत्र में हो रही है, इसका भी बड़ा महत्व है।
हर जिले पर एक जैसा असर नहीं
अध्ययन की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जलवायु बदलाव का असर पूरे भारत में एक जैसा नहीं है। जिन जिलों का मौसम ऐतिहासिक रूप से ठंडा या तापमान में स्थिर रहा है, वे तापमान में अचानक बढ़ोतरी के प्रति अधिक संवेदनशील दिखाई दिए।
वहीं, सूखे और अर्ध-शुष्क इलाकों में अतिरिक्त बारिश से वनस्पति को अपेक्षाकृत अधिक फायदा मिला। जिन क्षेत्रों में पहले से पर्याप्त सतही पानी मौजूद है, वहां अतिरिक्त बारिश का फायदा सीमित रहा। इसका एक कारण यह हो सकता है कि ऐसे इलाकों में पानी की एक सीमा के बाद अतिरिक्त बारिश पौधों के लिए उपयोगी होने के बजाय जलभराव जैसी समस्या पैदा कर सकती है।
उपग्रहों से जुटाए गए आंकड़े
शोधकर्ताओं ने इस अध्ययन के लिए उपग्रह से मिले आंकड़ों का इस्तेमाल किया। नासा के लैंडसैट-8 उपग्रह की तस्वीरों से सतही पानी की मौजूदगी का आकलन किया गया। वहीं, वनस्पति की स्थिति जानने के लिए नॉर्मलाइज्ड डिफरेंस वेजिटेशन इंडेक्स यानी एनडीवीआई का इस्तेमाल किया गया।
इन आंकड़ों को तापमान और बारिश में होने वाले बदलावों के साथ जोड़ा गया। इस तरह करीब 50 हजार जिला-समय समीक्षा का एक बड़ा डेटासेट तैयार किया गया। शोधकर्ताओं ने ऐसे सांख्यिकीय मॉडल इस्तेमाल किए, जिनसे अलग-अलग जिलों की पुरानी जलवायु और अन्य परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए जलवायु बदलाव के प्रभाव को समझने में मदद मिली।
स्थानीय स्तर पर बने रणनीति
अध्ययन से यह संकेत मिलता है कि भारत में पानी और खेती से जुड़ी नीतियां सभी क्षेत्रों के लिए एक जैसी नहीं होनी चाहिए। जिस जिले में गर्मी बढ़ने से पानी तेजी से घटता है, वहां पानी बचाने और मिट्टी में नमी बनाए रखने पर ज्यादा ध्यान देना जरूरी हो सकता है। वहीं, कम बारिश वाले क्षेत्रों में बारिश के पानी को रोकने और बेहतर तरीके से इस्तेमाल करने की जरूरत अधिक हो सकती है।
शोधकर्ताओं का कहना है कि आगे के अध्ययनों में भूजल को भी शामिल किया जाना चाहिए। लंबे समय के उपग्रह आंकड़े और बाढ़, सूखा तथा अत्यधिक गर्मी जैसी घटनाओं की अलग से जानकारी भी तस्वीर को और स्पष्ट कर सकती है।
बदलते मौसम के दौर में भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती यही है कि हर क्षेत्र की जरूरत को समझते हुए स्थानीय समाधान तैयार किए जाएं। जिले स्तर पर उपलब्ध ऐसे आंकड़े पानी की बेहतर योजना बनाने, खेती को सुरक्षित रखने और आने वाले वर्षों में पर्यावरणीय जोखिमों से निपटने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।