

180 से अधिक वैज्ञानिकों ने शक्तिशाली अल नीनो की आशंका के चलते भारत में तत्काल पर्यावरण निगरानी बढ़ाने की मांग की है।
वैज्ञानिकों के अनुसार तेज गर्मी और कम बारिश से जंगल, वन्यजीव, खेती और पानी के संसाधनों पर गंभीर दबाव पड़ सकता है।
समुद्री गर्मी बढ़ने से प्रवाल भित्तियों में ब्लीचिंग और मछलियों के आवास बदलने से तटीय समुदाय प्रभावित हो सकते हैं।
वैज्ञानिकों ने स्थानीय मौसम केंद्र स्थापित करने और पुराने उपग्रह आंकड़ों का इस्तेमाल करके पर्यावरणीय बदलावों की निगरानी बढ़ाने को कहा है।
शोधकर्ताओं ने सरकार और फंडिंग एजेंसियों से शोध अनुमति तथा आर्थिक सहायता की प्रक्रिया तेजी से पूरी करने की अपील की है।
भारत के 180 से अधिक पर्यावरण और पारिस्थितिकी वैज्ञानिकों ने आने वाले बेहद शक्तिशाली अल नीनो को लेकर चिंता जताई है। वैज्ञानिकों ने सरकार, शोध संस्थानों और फंड देने वाली एजेंसियों से तुरंत तैयारी शुरू करने की अपील की है। उनका कहना है कि 2026-27 का अल नीनो भारत के जंगलों, नदियों, समुद्रों, पहाड़ों और वन्यजीवों पर गंभीर असर डाल सकता है। ‘सुपर’ अल नीनो की दस्तक: 2026/27 में पारिस्थितिकीविदों के लिए चेतावनी और चुनौती नामक शोध जेनोडो पर 16 सितंबर 2026 को प्रकाशित किया गया है।
वैज्ञानिकों का मानना है कि इस बार मौसम की स्थिति सामान्य अल नीनो वर्षों की तुलना में काफी अलग हो सकती है। इसलिए इसके असर को समझने और दर्ज करने के लिए अभी से बड़े स्तर पर निगरानी जरूरी है।
क्या है अल नीनो?
अल नीनो प्रशांत महासागर से जुड़ी एक प्राकृतिक जलवायु घटना है। इसमें समुद्र की सतह का पानी सामान्य से अधिक गर्म हो जाता है। इसका असर दुनिया के कई हिस्सों के मौसम पर पड़ता है।
भारत में अल नीनो का संबंध अक्सर कमजोर या देर से आने वाले मानसून और अधिक गर्मी से देखा गया है। हालांकि हर अल नीनो का असर एक जैसा नहीं होता। वैज्ञानिकों के अनुसार इस बार प्रशांत महासागर में समुद्र का तापमान बहुत अधिक बढ़ रहा है, इसलिए आने वाले महीनों पर विशेष नजर रखने की जरूरत है।
भारत में बढ़ सकती है गर्मी और सूखा
वैज्ञानिकों को आशंका है कि नवंबर 2026 से अगले साल तक भारत के कई हिस्सों में सामान्य से अधिक गर्म और शुष्क मौसम देखने को मिल सकता है। बारिश कम होने पर पानी की कमी बढ़ सकती है। इसका असर खेती, जंगलों और पशुपालन पर भी पड़ सकता है।
गर्मी और सूखे का सबसे ज्यादा असर उन इलाकों पर हो सकता है जहां पहले से ही पानी की कमी रहती है। रेगिस्तान और ऊंचे पहाड़ी क्षेत्रों में रहने वाले पौधों और जानवरों के लिए ऐसी स्थिति और कठिन हो सकती है।
जंगलों और वन्यजीवों पर असर
लगातार गर्मी और पानी की कमी से जंगलों में आग लगने का खतरा बढ़ सकता है। सूखे जंगल जल्दी आग पकड़ सकते हैं और आग लंबे समय तक फैल सकती है। इससे पेड़-पौधों के साथ-साथ पक्षियों और दूसरे वन्यजीवों को भी नुकसान हो सकता है।
मौसम में अचानक बदलाव से जानवरों के भोजन, प्रजनन और रहने के स्थान पर भी असर पड़ सकता है। इससे जंगलों में अलग-अलग प्रजातियों के बीच संतुलन बदलने की आशंका है। इसका असर भोजन की पूरी श्रृंखला पर पड़ सकता है।
समुद्र में भी बढ़ेगी परेशानी
अल नीनो का असर केवल जमीन तक सीमित नहीं रहेगा। भारत के आसपास के समुद्री क्षेत्रों में समुद्र का तापमान बढ़ने से समुद्री लू यानी मरीन हीटवेव आ सकती हैं।
समुद्र का पानी बहुत गर्म होने पर प्रवाल भित्तियों यानी कोरल रीफ में बड़े पैमाने पर ब्लीचिंग हो सकती है। इससे कोरल कमजोर होकर मर सकते हैं। समुद्री तापमान में बदलाव से मछलियों के रहने और भोजन खोजने के स्थान भी बदल सकते हैं। इसका सीधा असर मछुआरों की आजीविका पर पड़ सकता है।
इंसानों पर भी पड़ेगा असर
प्राकृतिक बदलावों का असर आखिरकार लोगों तक पहुंचता है। किसान, मछुआरे और पशुपालक मौसम पर काफी निर्भर रहते हैं। कम बारिश और अधिक गर्मी से खेती प्रभावित हो सकती है। पहाड़ी इलाकों में घास कम होने से पशुपालकों के सामने चारे की समस्या आ सकती है।
शहरों में भी गर्मी का असर बढ़ सकता है। कंक्रीट और सड़कों के कारण शहर पहले ही आसपास के ग्रामीण इलाकों की तुलना में अधिक गर्म होते हैं। ऐसे में लंबे समय तक चलने वाली तेज गर्मी लोगों के स्वास्थ्य और शहरों में पेड़-पौधों के लिए चुनौती बन सकती है।
वैज्ञानिक चाहते हैं तुरंत निगरानी
वैज्ञानिकों ने कहा है कि इस बार नुकसान होने के बाद अध्ययन करने के बजाय पहले से तैयारी करनी चाहिए। इसके लिए पुराने शोध और लंबे समय से चल रहे पर्यावरणीय अध्ययनों को जारी रखना जरूरी है।
स्थानीय स्तर पर छोटे मौसम केंद्र बनाए जाने, तापमान और नमी का रिकॉर्ड रखने तथा अलग-अलग राज्यों और क्षेत्रों के वैज्ञानिकों के बीच सहयोग बढ़ाने की भी मांग की गई है। पुराने उपग्रह आंकड़ों का इस्तेमाल करके यह समझने की कोशिश की जा सकती है कि सामान्य परिस्थितियों में अलग-अलग पारिस्थितिकी तंत्र कैसे काम करते हैं।
अनुमति और धन की प्रक्रिया तेज करने की मांग
वैज्ञानिकों ने राज्य वन विभागों और शोध के लिए धन देने वाली संस्थाओं से अनुमति और फंड जारी करने की प्रक्रिया तेज करने की अपील की है। उनका कहना है कि यदि समय पर शोध दल मैदान में नहीं पहुंच पाए, तो इस असाधारण मौसम के दौरान होने वाले कई महत्वपूर्ण बदलाव हमेशा के लिए दर्ज होने से रह सकते हैं।
अल नीनो को रोका नहीं जा सकता, लेकिन उसके असर को समझने और उससे मिलने वाली वैज्ञानिक जानकारी को बचाने की तैयारी अभी की जा सकती है। आने वाले महीने भारत के पर्यावरण और जलवायु अनुसंधान के लिए बेहद महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं।