

केरल का गर्म और नम मौसम डेंगू फैलाने वाले मच्छरों के लिए अनुकूल परिस्थितियां बनाता है, जिससे बीमारी का खतरा बढ़ता है।
अल नीनो के दौरान मानसून से पहले गर्म और अपेक्षाकृत शुष्क मौसम डेंगू संक्रमण का जोखिम बढ़ा सकता है।
केरल में डेंगू के मामले मई से बढ़ते हैं और जून-जुलाई में सबसे अधिक मामले सामने आते हैं।
वैज्ञानिकों ने मशीन लर्निंग मॉडल विकसित किया है, जो जलवायु और स्वास्थ्य आंकड़ों से डेंगू मामलों में बदलाव का अनुमान लगाता है।
मौसम के संकेतों से डेंगू का खतरा कई महीने पहले पहचाना जा सकता है, जिससे स्वास्थ्य विभाग तैयारियां समय पर शुरू कर सकता है।
केरल में बदलता मौसम और बढ़ता तापमान आने वाले समय में डेंगू जैसी बीमारियों का खतरा बढ़ा सकता है। पुणे स्थित भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान (आईआईटीएम) के वैज्ञानिकों के एक नए अध्ययन में यह बात सामने आई है। अध्ययन के अनुसार, केरल का गर्म और नम मौसम पहले से ही डेंगू फैलाने वाले मच्छरों के लिए अनुकूल है। इसके साथ अगर अल नीनो जैसी जलवायु परिस्थितियां जुड़ जाएं, तो डेंगू के मामलों में और बढ़ोतरी हो सकती है।
यह अध्ययन ‘जियोहेल्थ’ पत्रिका में प्रकाशित किया गया है। शोधकर्ताओं ने केरल में डेंगू के मामलों और मौसम से जुड़े कई आंकड़ों का अध्ययन किया। इसमें तापमान, नमी, बारिश, मानसून की स्थिति और अल नीनो-दक्षिणी दोलन यानी ईएनएसओ जैसी स्थितियों को शामिल किया गया।
मई से बढ़ने लगते हैं डेंगू के मामले
केरल में डेंगू के मामले आमतौर पर मई से बढ़ने लगते हैं। जून और जुलाई में इनका स्तर सबसे अधिक देखा जाता है। शोध के अनुसार, राज्य में एक साल में दर्ज होने वाले डेंगू के करीब 60 प्रतिशत मामले दक्षिण-पश्चिम मानसून के दौरान यानी जून से सितंबर के बीच सामने आते हैं।
केरल में मार्च से मई तक का समय प्री-मानसून यानी मानसून से पहले का मौसम होता है। इस दौरान तापमान और नमी दोनों अधिक रहती हैं। कई जगहों पर गरज के साथ बारिश भी होती है। ऐसे मौसम में डेंगू फैलाने वाले मच्छरों के लिए अनुकूल परिस्थितियां बन सकती हैं।
अल नीनो से बढ़ सकती है परेशानी
अल नीनो प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से अधिक होने की स्थिति है। इसका असर दुनिया के कई हिस्सों के मौसम पर पड़ सकता है। शोधकर्ताओं के अनुसार, अल नीनो जैसी परिस्थितियां केरल में मानसून से पहले गर्म और अपेक्षाकृत शुष्क मौसम को बढ़ावा दे सकती हैं। इससे मानसून के दौरान डेंगू का खतरा बढ़ सकता है।
वैज्ञानिकों का कहना है कि केवल तापमान ही डेंगू के मामलों को तय नहीं करता। तापमान, हवा में नमी, बारिश और मानसून की अलग-अलग स्थितियां मिलकर बीमारी के फैलने पर असर डालती हैं। राज्य के अलग-अलग हिस्सों में इन परिस्थितियों का प्रभाव भी अलग हो सकता है।
मौसम और स्वास्थ्य आंकड़ों को जोड़ेगा मॉडल
शोधकर्ताओं ने डेंगू के मामलों का अनुमान लगाने के लिए मशीन लर्निंग आधारित मॉडल तैयार किया है। इसमें मौसम के पूर्वानुमान और स्वास्थ्य विभाग से मिलने वाले डेंगू के आंकड़ों को एक साथ इस्तेमाल किया जाता है। वैज्ञानिकों के अनुसार, यह मॉडल डेंगू के मामलों में होने वाले बदलाव का 72 प्रतिशत तक अनुमान लगाने में सक्षम है।
इस तरह की तकनीक स्वास्थ्य विभाग को पहले से तैयारी करने में मदद कर सकती है। अगर मौसम के आंकड़ों से डेंगू का खतरा बढ़ने के संकेत मिलते हैं, तो मच्छरों पर नियंत्रण, सफाई अभियान और लोगों को जागरूक करने जैसे कदम पहले शुरू किए जा सकते हैं।
पांच महीने पहले मिल सकता है खतरे का संकेत
शोधकर्ताओं के अनुसार, मौसम से जुड़े अलग-अलग संकेत अलग-अलग समय पर दिखाई देते हैं। इन्हें स्वास्थ्य आंकड़ों के साथ जोड़कर डेंगू के खतरे का अनुमान कई महीने पहले लगाया जा सकता है। इससे अस्पतालों और स्वास्थ्य विभागों को संभावित मरीजों की संख्या बढ़ने से पहले तैयारी करने का समय मिल सकता है।
शोधकर्ताओं ने इससे पहले महाराष्ट्र के पुणे शहर में भी डेंगू और जलवायु के बीच संबंध का अध्ययन किया था। अब टीम चेन्नई और भोपाल में भी मच्छरों से फैलने वाली बीमारियों और मौसम में होने वाले बदलाव के संबंध का अध्ययन करने की योजना बना रही है।
जलवायु बदलाव से बढ़ रही चुनौती
वैज्ञानिकों के अनुसार, जलवायु में बदलाव के कारण तापमान, बारिश और नमी के पैटर्न में बदलाव हो रहा है। ऐसे में डेंगू जैसी मौसमी बीमारियों की निगरानी पहले से अधिक जरूरी हो गई है। हालांकि, डेंगू का प्रसार केवल मौसम पर निर्भर नहीं करता। मच्छरों की संख्या, पानी जमा होने की स्थिति, साफ-सफाई और लोगों की आदतें भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
केरल में मौसम और स्वास्थ्य संबंधी आंकड़ों को साथ मिलाकर देखने से डेंगू के खतरे को समय रहते समझने में मदद मिल सकती है। वैज्ञानिकों का मानना है कि बेहतर पूर्वानुमान और समय पर बचाव के उपाय बीमारी के बढ़ते मामलों को नियंत्रित करने में उपयोगी हो सकते हैं।