

सुपर अल नीनो के कारण अगले एक वर्ष में भारत में 17.7 टेरावाट-घंटे तक बिजली उत्पादन की कमी आने की आशंका जताई गई।
बढ़ती गर्मी से एयर कंडीशनर और कूलिंग की मांग बढ़ेगी, जिससे बिजली की खपत में लगभग 10 टेरावाट-घंटे अतिरिक्त वृद्धि हो सकती है।
कम बारिश और कमजोर हवाओं के कारण जलविद्युत और पवन ऊर्जा उत्पादन घटने से कोयले पर निर्भरता फिर बढ़ सकती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि बैटरी भंडारण, मजबूत ग्रिड और सौर ऊर्जा का बेहतर उपयोग बिजली संकट से निपटने में अहम होगा।
रिपोर्ट के अनुसार, स्वच्छ ऊर्जा के साथ भंडारण और ग्रिड सुधार नहीं बढ़े तो गर्मी और मौसमीय बदलावों में कोयले का उपयोग बढ़ सकता है।
एक नए विश्लेषण के अनुसार, अगर इस साल सुपर अअल नीनो की स्थिति बनती है तो भारत के बिजली क्षेत्र पर बड़ा दबाव पड़ सकता है। सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर (सीआरईए) की रिपोर्ट में कहा गया है कि अगले एक साल में देश में लगभग 17.7 टेरावाट-घंटे बिजली उत्पादन की कमी हो सकती है। इस कमी को पूरा करने के लिए भारत को फिर से कोयले से बनने वाली बिजली पर अधिक निर्भर होना पड़ सकता है। इससे कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन भी बढ़ेगा और स्वच्छ ऊर्जा की दिशा में हो रही प्रगति को झटका लग सकता है।
क्या है अल नीनो?
अल नीनो एक प्राकृतिक मौसमीय घटना है। इसमें प्रशांत महासागर के कुछ हिस्सों का समुद्री तापमान सामान्य से अधिक हो जाता है। इसका असर दुनिया के कई देशों के मौसम पर पड़ता है। भारत में एल नीनो के दौरान अक्सर मानसून कमजोर पड़ सकता है, बारिश कम हो सकती है और कई इलाकों में गर्मी बढ़ जाती है। जब एल नीनो बहुत अधिक ताकतवर होता है तो उसे सुपर अल नीनो कहा जाता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि इस बार ऐसा ही मजबूत अल नीनो देखने को मिल सकता है।
बिजली की मांग बढ़ने का अनुमान
रिपोर्ट के अनुसार, बढ़ती गर्मी के कारण लोगों को अधिक समय तक एयर कंडीशनर, कूलर और पंखे चलाने पड़ेंगे। इससे बिजली की मांग तेजी से बढ़ सकती है। केवल ठंडक के लिए बिजली की अतिरिक्त जरूरत लगभग 10 टेरावाट-घंटे तक पहुंच सकती है। दूसरी ओर, कम बारिश और कमजोर हवाओं के कारण जलविद्युत और पवन ऊर्जा का उत्पादन भी घट सकता है। ऐसे में बिजली की मांग और उत्पादन के बीच बड़ा अंतर पैदा होने की आशंका है।
कोयले पर फिर बढ़ सकती है निर्भरता
यदि नवीकरणीय स्रोतों से पर्याप्त बिजली नहीं मिलती है तो इस कमी को पूरा करने के लिए कोयला आधारित बिजली संयंत्रों का उपयोग बढ़ाना पड़ सकता है। रिपोर्ट का अनुमान है कि इससे लगभग 1.7 करोड़ टन अतिरिक्त कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन हो सकता है। यदि स्थिति और गंभीर हुई तो कोयले से बनने वाली अतिरिक्त बिजली 24 टेरावाट-घंटे तक पहुंच सकती है। इससे प्रदूषण बढ़ने के साथ-साथ जलवायु परिवर्तन की चुनौती भी और गंभीर हो सकती है।
भारत के बिजली तंत्र के लिए चुनौती
भारत में पिछले कुछ वर्षों से बिजली की मांग लगातार बढ़ रही है। इसकी वजह तेज आर्थिक विकास, शहरों का विस्तार, उद्योगों की बढ़ती जरूरत और घरों में एयर कंडीशनर का बढ़ता उपयोग है। हाल के वर्षों में भीषण गर्मी के कारण बिजली की अधिकतम मांग नए रिकॉर्ड बना चुकी है। इस साल भी देश में बिजली की मांग 270 गीगावाट तक पहुंच गई थी। विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले वर्षों में गर्मी और बढ़ने पर बिजली की मांग में और तेजी आ सकती है।
सौर ऊर्जा बनी उम्मीद
रिपोर्ट में कहा गया है कि सौर ऊर्जा पर एल नीनो का असर जलविद्युत और पवन ऊर्जा की तुलना में काफी कम पड़ता है। भारत में अब दिन के समय बिजली की लगभग 24 प्रतिशत जरूरत सौर ऊर्जा से पूरी हो रही है। पिछले साल देश ने 44.6 गीगावाट नई सौर क्षमता जोड़ी, जो पिछले वर्ष की तुलना में लगभग दोगुनी थी। इसका असर यह हुआ कि नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन में तेज वृद्धि हुई, जबकि कोयले से बनने वाली बिजली में कमी दर्ज की गई।
बैटरी और मजबूत ग्रिड की जरूरत
विशेषज्ञों का कहना है कि केवल सौर और पवन ऊर्जा संयंत्र लगाना ही पर्याप्त नहीं है। सबसे बड़ी जरूरत ऐसी बैटरियों और मजबूत बिजली ग्रिड की है, जो दिन में बनने वाली अतिरिक्त सौर ऊर्जा को संग्रहित कर शाम के समय उपयोग में ला सकें। रिपोर्ट के अनुसार, पिछले साल कुछ स्थानों पर सौर और पवन ऊर्जा उपलब्ध होने के बावजूद उसका पूरा उपयोग नहीं हो सका। यदि पर्याप्त बैटरी भंडारण और बेहतर ग्रिड व्यवस्था होती तो इस ऊर्जा का बेहतर इस्तेमाल किया जा सकता था और कोयले की जरूरत कम पड़ती।
कोयले के नए संयंत्रों पर सवाल
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि भारत में अभी भी लगभग 130 गीगावाट नई कोयला आधारित बिजली क्षमता की योजना बनाई जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे संयंत्र बनने में कई वर्ष लगते हैं और भविष्य में स्वच्छ ऊर्जा के बढ़ते उपयोग के कारण उनकी उपयोगिता कम हो सकती है। इसके अलावा कोयला आधारित बिजली संयंत्र तेजी से बदलती बिजली मांग के अनुसार उतनी आसानी से काम नहीं कर पाते, जबकि बैटरियां और आधुनिक ग्रिड अधिक लचीले साबित हो सकते हैं।
स्वास्थ्य पर भी पड़ सकता है असर
रिपोर्ट में यह भी चेतावनी दी गई है कि सुपर एल नीनो के कारण बढ़ने वाली गर्मी का असर लोगों के स्वास्थ्य पर भी पड़ सकता है। अनुमान है कि वर्ष 2026-27 के दौरान भारत में गर्मी से जुड़ी लगभग 2,700 अतिरिक्त मौतें हो सकती हैं। हालांकि यह केवल एक अनुमान है और वास्तविक स्थिति मौसम की तीव्रता तथा लोगों की तैयारी पर निर्भर करेगी।
आगे की राह
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को अपनी स्वच्छ ऊर्जा यात्रा जारी रखते हुए बिजली भंडारण, ट्रांसमिशन नेटवर्क और ग्रिड को मजबूत बनाने पर तेजी से काम करना होगा। इससे बढ़ती बिजली मांग को पूरा करने में मदद मिलेगी और कोयले पर निर्भरता कम होगी। सुपर एल नीनो का संभावित खतरा भारत के लिए केवल मौसम की चुनौती नहीं है, बल्कि यह देश की ऊर्जा व्यवस्था की मजबूती की भी परीक्षा है। यदि समय रहते सही कदम उठाए जाते हैं तो भारत स्वच्छ, सस्ती और भरोसेमंद बिजली व्यवस्था की दिशा में आगे बढ़ सकता है।