

ओजोन परत तेजी से सुधर रही है, लेकिन नए शोध में औद्योगिक रसायनों से अनदेखा रिसाव चिंता बढ़ा रहा है।
मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल की सफलता के बावजूद फीडस्टॉक रसायनों का अधिक रिसाव ओजोन रिकवरी में कई साल की देरी कर सकता है।
वैज्ञानिकों ने पाया कि औद्योगिक उपयोग में प्रयुक्त रसायन अपेक्षा से अधिक वातावरण में पहुंचकर ओजोन परत को प्रभावित कर रहे हैं।
नए आंकड़ों के अनुसार फीडस्टॉक से निकलने वाले उत्सर्जन पहले अनुमान से कई गुना अधिक हैं, जिससे नीति पर सवाल उठे।
यदि रिसाव नियंत्रित नहीं हुआ तो ओजोन परत 1980 स्तर पर लौटने में वर्षों की अतिरिक्त देरी हो सकती है।
ओजोन परत पृथ्वी के वातावरण की एक महत्वपूर्ण परत है, जो हमें सूर्य की हानिकारक पराबैंगनी (यूवी) किरणों से बचाती है। 1980 के दशक में वैज्ञानिकों ने पाया कि यह परत तेजी से पतली हो रही है, खासकर अंटार्कटिका के ऊपर एक “ओजोन छेद” बन रहा था। इसका मुख्य कारण क्लोरोफ्लोरोकार्बन (सीएफसीएस) जैसे रसायन थे, जो फ्रिज, एयर कंडीशनर और स्प्रे उत्पादों में उपयोग किए जाते थे।
इस समस्या को रोकने के लिए 1987 में एक अंतरराष्ट्रीय समझौता किया गया, जिसे मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल कहा जाता है। इस समझौते के तहत 197 देशों ने मिलकर सीएफसी और अन्य हानिकारक रसायनों को धीरे-धीरे बंद करने का निर्णय लिया। इसे पर्यावरण संरक्षण की सबसे सफल वैश्विक कोशिशों में से एक माना जाता है।
ओजोन परत की धीरे-धीरे हो रही रिकवरी
वैज्ञानिकों के अनुसार, मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल के कारण ओजोन परत अब धीरे-धीरे ठीक हो रही है। अनुमान है कि यह 1980 के स्तर पर लगभग 2040 से 2060 के बीच वापस आ सकती है। इससे त्वचा कैंसर और अन्य स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा भी कम होगा।
एमआईटी और अन्य शोध संस्थानों के अध्ययन बताते हैं कि यदि सब कुछ ऐसे ही चलता रहा तो आने वाले दशकों में ओजोन परत पूरी तरह से सुरक्षित हो सकती है। लेकिन हाल ही में सामने आए नए शोध ने एक नई चिंता पैदा कर दी है।
नए अध्ययन में छिपे रिसाव का खुलासा
एक अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक टीम, जिसमें एमआईटी और अन्य संस्थानों के शोधकर्ता शामिल हैं, ने पाया है कि कुछ ऐसे रसायन जो अभी भी उद्योगों में उपयोग हो रहे हैं, वातावरण में पहले से अधिक मात्रा में रिसाव कर रहे हैं।
ये रसायन सीधे उपयोग के लिए नहीं छोड़े जाते, बल्कि “फीडस्टॉक” के रूप में इस्तेमाल होते हैं। यानी इनका उपयोग प्लास्टिक, नॉन-स्टिक कोटिंग्स और अन्य रसायनों को बनाने में होता है। पहले माना जाता था कि इनसे केवल 0.5 प्रतिशत तक ही गैसें वातावरण में निकलती हैं। यह अध्ययन नेचर कम्युनिकेशन्स में प्रकाशित किया गया है।
लेकिन नए माप और निगरानी से पता चला है कि असल में यह रिसाव लगभग तीन से चार प्रतिशत तक हो सकता है। यह पहले के अनुमान से कई गुना अधिक है।
रिसाव का ओजोन पर असर
वैज्ञानिकों का कहना है कि यह बढ़ा हुआ रिसाव ओजोन परत की रिकवरी को धीमा कर सकता है। यदि यही स्थिति बनी रही, तो ओजोन परत का 1980 जैसा स्तर पाने का समय लगभग सात साल और आगे बढ़ सकता है। यानी सुधार की प्रक्रिया 2070 के बाद तक खिंच सकती है।
यदि इस रिसाव को कम कर दिया जाए या पूरी तरह खत्म कर दिया जाए, तो ओजोन परत अपेक्षाकृत जल्दी ठीक हो सकती है।
विशेषज्ञों की राय और चेतावनी
इस शोध में शामिल वैज्ञानिकों का कहना है कि यह एक बड़ी चेतावनी है। उनका मानना है कि अब समय आ गया है कि इन औद्योगिक रसायनों के उपयोग और उनसे होने वाले रिसाव पर अधिक सख्ती की जाए।
उनके अनुसार, रासायनिक उद्योग के पास पहले से ही कई वैकल्पिक तकनीकें और रसायन मौजूद हैं, जिनसे पर्यावरण को कम नुकसान होता है। इसलिए पुराने और हानिकारक तरीकों पर निर्भर रहना जरूरी नहीं है।
भविष्य की दिशा
मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल के तहत हर साल देशों की बैठक होती है, जिसमें नए पर्यावरणीय मुद्दों पर चर्चा की जाती है। अब इस रिसाव की समस्या भी इन बैठकों का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकती है।
वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि सही कदम उठाए जाएं, तो ओजोन परत की रिकवरी को फिर से तेज किया जा सकता है। इससे आने वाली पीढ़ियों को सूर्य की हानिकारक किरणों से बेहतर सुरक्षा मिल सकेगी।
कुल मिलाकर, यह अध्ययन बताता है कि दुनिया ने ओजोन परत को बचाने में बड़ी सफलता हासिल की है, लेकिन अभी भी कुछ छिपी समस्याएं बाकी हैं। यदि इन पर समय रहते ध्यान नहीं दिया गया, तो पूरी रिकवरी में देरी हो सकती है। यह मामला हमें यह भी सिखाता है कि पर्यावरण संरक्षण में छोटे दिखने वाले रिसाव भी लंबे समय में बड़ा असर डाल सकते हैं।