

वैज्ञानिकों के नए अध्ययन के मुताबिक, आर्कटिक में सर्दियों की समुद्री बर्फ पुराने अनुमानों से दस लाख वर्ग किमी अधिक घट सकती है।
छह हजार साल पुराने समुद्री तलछट नमूनों में मिले शैवाल के जैविक संकेतों से वैज्ञानिकों ने प्राचीन बर्फ का विस्तार समझा।
कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी और मेक्सिको के शोधकर्ताओं ने 27 जलवायु मॉडलों की तुलना करके भविष्य में बर्फ घटने का नया अनुमान लगाया।
आर्कटिक की समुद्री बर्फ घटने से महासागर और वातावरण के बीच गर्मी तथा नमी का आदान-प्रदान प्रभावित हो सकता है।
अध्ययन में ग्रीनलैंड में बर्फबारी और भूमध्यसागरीय क्षेत्र में बारिश के पुराने अनुमानों से अधिक होने की संभावना के संकेत मिले।
दुनिया के सबसे ठंडे इलाकों में गिना जाने वाला आर्कटिक अब जलवायु परिवर्तन की एक बड़ी कहानी सुना रहा है। बर्फ से ढके इस इलाके में होने वाले बदलाव केवल ध्रुवीय भालुओं या समुद्र में तैरती बर्फ तक सीमित नहीं हैं। इनका असर यूरोप की सर्दियों, ब्रिटेन में होने वाली बर्फबारी और उत्तरी अमेरिका के मौसम पर भी पड़ सकता है। वैज्ञानिकों के एक नए अध्ययन ने चेतावनी दी है कि आने वाले समय में आर्कटिक की सर्दियों वाली समुद्री बर्फ पहले के अनुमानों से कहीं ज्यादा कम हो सकती है।
शोधकर्ताओं के मुताबिक, भविष्य में आर्कटिक की समुद्री बर्फ का क्षेत्रफल पुराने अनुमानों से करीब दस लाख वर्ग किलोमीटर कम हो सकता है। यह लगभग 3.86 लाख वर्ग मील के बराबर है। यानी बर्फ का एक ऐसा विशाल हिस्सा, जिसका आकार कई बड़े देशों के क्षेत्रफल से भी ज्यादा हो सकता है, आने वाले दशकों में गायब होने के खतरे में है।
छह हजार साल पुरानी बर्फ ने बताई भविष्य की कहानी
यह अध्ययन ब्रिटेन की कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी और मेक्सिको के सेंट्रो डी इन्वेस्टिगेशन एन मेटमैटिकस (सीआईएमएटी) के वैज्ञानिकों ने किया है। इसके नतीजे प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका ‘नेचर जियोसाइंस’ में प्रकाशित हुए हैं।
वैज्ञानिकों ने करीब छह हजार साल पुराने आर्कटिक का अध्ययन किया। उस समय पृथ्वी की कक्षा में धीरे-धीरे होने वाले बदलावों के कारण आर्कटिक का वातावरण आज की तुलना में गर्म था और समुद्री बर्फ का विस्तार कम था।
उस दौर की कहानी जानने के लिए शोधकर्ताओं ने समुद्र की तलहटी से निकाले गए मिट्टी और तलछट के नमूनों का सहारा लिया। इन नमूनों में एक खास जैविक पदार्थ मिला, जिसे आईपी 25 कहा जाता है। यह पदार्थ समुद्री बर्फ में रहने वाले कुछ शैवाल बनाते हैं। इसकी मौजूदगी से वैज्ञानिकों को पता लगाने में मदद मिलती है कि अतीत में समुद्र पर कितनी बर्फ मौजूद थी।
इसके साथ खुले पानी में रहने वाले जीवों के जैविक संकेतों का भी अध्ययन किया गया। इन दोनों तरह के संकेतों को मिलाकर वैज्ञानिकों ने हजारों साल पहले आर्कटिक में बर्फ की स्थिति का अनुमान लगाया।
कंप्यूटर मॉडल की भविष्यवाणी में मिली कमी
जलवायु वैज्ञानिक भविष्य का मौसम समझने के लिए कंप्यूटर मॉडल का इस्तेमाल करते हैं। ये मॉडल तापमान, समुद्री बर्फ, बारिश और बर्फबारी जैसे कई पहलुओं का अनुमान लगाते हैं। लेकिन आर्कटिक में सर्दियों के दौरान कितनी समुद्री बर्फ बची रहेगी, इसे लेकर अलग-अलग मॉडल अक्सर अलग नतीजे देते हैं।
शोधकर्ताओं ने 27 जलवायु मॉडलों के अनुमानों की तुलना छह हजार साल पुराने आर्कटिक के प्रमाणों से की। जिन मॉडलों के नतीजे पुराने वैज्ञानिक प्रमाणों से बेहतर मेल खाते थे, उन्हें ज्यादा महत्व दिया गया। इसके लिए ‘बेजियन वेटिंग’ नाम की सांख्यिकीय तकनीक अपनाई गई।
इस तरीके से वैज्ञानिकों को पता चला कि कई मॉडल सर्दियों में समुद्री बर्फ की मात्रा जरूरत से ज्यादा दिखा रहे थे। पुराने प्रमाणों की मदद से इस गलती को सुधारने के बाद भविष्य में बर्फ के नुकसान का अनुमान बढ़ गया। शोधकर्ताओं के अनुसार, अनुमानों में मौजूद अनिश्चितता भी कुछ मामलों में 85 प्रतिशत तक कम हुई।
आर्कटिक का असर दूर-दराज के मौसम पर
आर्कटिक की समुद्री बर्फ केवल सफेद चादर नहीं है। यह पृथ्वी की जलवायु व्यवस्था का एक अहम हिस्सा है। बर्फ सूर्य की रोशनी का बड़ा हिस्सा वापस अंतरिक्ष में परावर्तित करती है। जब बर्फ घटती है, तो गहरा समुद्री पानी ज्यादा गर्मी सोखने लगता है। इससे आसपास का वातावरण और गर्म हो सकता है, जो बर्फ के पिघलने की प्रक्रिया को और तेज कर सकता है।
समुद्री बर्फ में बदलाव समुद्र और वातावरण के बीच गर्मी तथा नमी के आदान-प्रदान को भी प्रभावित करते हैं। इसका असर दूर-दराज के मौसम पर पड़ सकता है। हालांकि आर्कटिक में कम बर्फ होने से ब्रिटेन या यूरोप में हर बार ज्यादा ठंड पड़ेगी, ऐसा निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता। मौसम पर कई अन्य कारण भी असर डालते हैं।
ग्रीनलैंड और यूरोप के लिए भी संकेत
अध्ययन में बारिश और बर्फबारी के अनुमानों में भी कुछ महत्वपूर्ण संकेत मिले। नए विश्लेषण से पता चला कि दक्षिण-पूर्वी ग्रीनलैंड में बर्फबारी और भूमध्यसागरीय क्षेत्र में बारिश का अनुमान कुछ मॉडलों में कम लगाया गया हो सकता है।
यदि भविष्य में इन क्षेत्रों में बर्फबारी या बारिश का स्वरूप बदलता है, तो ग्रीनलैंड की विशाल बर्फ की चादर की स्थिरता और दक्षिणी यूरोप में बाढ़ के खतरे पर भी असर पड़ सकता है। हालांकि इन संभावित प्रभावों को बेहतर ढंग से समझने के लिए आगे और अध्ययन की जरूरत है।
अतीत से सीखकर भविष्य की तैयारी
शोधकर्ताओं का कहना है कि छह हजार साल पुराने जलवायु संकेत आज के भविष्य के अनुमानों को अधिक भरोसेमंद बनाने में मदद कर सकते हैं। उस समय गर्मी का कारण प्राकृतिक बदलाव थे, जबकि आज का वैश्विक तापमान बढ़ना मुख्य रूप से मानवीय गतिविधियों से जुड़ा है। फिर भी, तापमान बढ़ने पर समुद्री बर्फ की प्रतिक्रिया को समझने के लिए पुराने अनुभव उपयोगी हैं।
आर्कटिक की बदलती बर्फ हमें याद दिलाती है कि जलवायु परिवर्तन किसी एक इलाके की समस्या नहीं है। ध्रुवों पर होने वाला बदलाव दुनिया के दूसरे हिस्सों तक पहुंच सकता है। सवाल सिर्फ इतना नहीं कि भविष्य में कितनी बर्फ बचेगी, बल्कि यह भी है कि इंसान बदलती जलवायु के लिए कितनी अच्छी तैयारी कर पाएगा।