कम विकास वाले इलाकों में जलवायु आपदाओं का खतरा आठ गुणा ज्यादा: अध्ययन

अध्ययन का दावा: कम विकास वाले क्षेत्रों में बाढ़ और तूफान से मौत का खतरा कई गुना अधिक, बेहतर तैयारी और विकास से घट सकता है आपदाओं से होने वाला नुकसान
बाढ़ के दौरान कम विकास वाले इलाकों में रहने वाले लोगों के लिए मौत का जोखिम विकसित क्षेत्रों से तीन गुना अधिक पाया गया।
बाढ़ के दौरान कम विकास वाले इलाकों में रहने वाले लोगों के लिए मौत का जोखिम विकसित क्षेत्रों से तीन गुना अधिक पाया गया।फोटो साभार: आईस्टॉक
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सारांश
  • नए अध्ययन में पाया गया कि कम मानव विकास वाले क्षेत्रों में जलवायु आपदाओं से जान-माल का नुकसान कई गुना अधिक होता है।

  • शोध के अनुसार, कम विकसित क्षेत्रों में तूफान से मौत का खतरा अत्यधिक विकसित क्षेत्रों की तुलना में आठ गुणा से ज्यादा है।

  • बाढ़ के दौरान कम विकास वाले इलाकों में रहने वाले लोगों के लिए मौत का जोखिम अत्यधिक विकसित क्षेत्रों से तीन गुना अधिक पाया गया।

  • अध्ययन बताता है कि आपदाओं का असर केवल उनकी तीव्रता नहीं, बल्कि गरीबी, बुनियादी सुविधाओं और सामाजिक परिस्थितियों पर भी निर्भर करता है।

  • शोधकर्ताओं ने कहा कि मानव विकास, मजबूत आधारभूत ढांचे और बेहतर तैयारी में निवेश से भविष्य की आपदाओं में बड़ी संख्या में जानें बचाई जा सकती हैं।

जलवायु परिवर्तन के कारण दुनिया के कई हिस्सों में बाढ़, तूफान और अन्य प्राकृतिक आपदाएं लगातार बढ़ रही हैं। लेकिन एक नए अध्ययन में यह सामने आया है कि किसी आपदा का असर केवल उसकी तीव्रता पर निर्भर नहीं करता। किसी क्षेत्र की सामाजिक और आर्थिक स्थिति भी यह तय करती है कि वहां लोगों को कितना नुकसान होगा।

शोधकर्ताओं ने पाया कि जिन क्षेत्रों में मानव विकास सूचकांक (एचडीआई) कम है, वहां रहने वाले लोगों को जलवायु संबंधी आपदाओं से कहीं अधिक नुकसान उठाना पड़ता है। कई बार सामान्य स्तर की आपदा भी इन इलाकों में बड़ी मानवीय त्रासदी बन जाती है।

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30 वर्षों के आंकड़ों का विश्लेषण

यह अध्ययन वर्ष 1990 से 2020 के बीच दुनिया भर में हुई 7,000 से अधिक जलवायु संबंधी आपदाओं के आधार पर किया गया। शोधकर्ताओं ने इन आपदाओं के आंकड़ों की तुलना अलग-अलग क्षेत्रों के मानव विकास सूचकांक से की। इसके लिए केवल देशों के स्तर पर नहीं बल्कि राज्यों और क्षेत्रों के स्तर पर भी आंकड़ों का अध्ययन किया गया।

इस विस्तृत विश्लेषण से पता चला कि किसी देश के भीतर भी अलग-अलग क्षेत्रों में विकास का स्तर अलग होता है। यही कारण है कि एक ही देश में किसी आपदा का असर अलग-अलग इलाकों में अलग हो सकता है।

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तूफान और बाढ़ में सबसे अधिक खतरा

नेचर कम्युनिकेशन्स में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार, कम विकास वाले क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के लिए तूफान सबसे अधिक घातक साबित होते हैं। इन इलाकों में तूफान से मौत का खतरा बहुत अधिक पाया गया।

शोध में बताया गया कि कम विकास वाले क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के लिए तूफान से मौत का जोखिम बहुत अधिक विकसित क्षेत्रों की तुलना में औसतन आठ गुणा से भी ज्यादा है। वहीं बाढ़ के मामलों में यह खतरा लगभग तीन गुणा अधिक पाया गया।

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इससे साफ है कि केवल मौसम की तीव्रता ही नहीं बल्कि लोगों की सामाजिक और आर्थिक स्थिति भी आपदा के परिणाम तय करती है।

सामाजिक स्थिति भी बनती है बड़ा कारण

शोधकर्ताओं का कहना है कि आपदा का असर इस बात पर भी निर्भर करता है कि लोग किन परिस्थितियों में रह रहे हैं। जिन क्षेत्रों में अच्छी सड़कें, मजबूत मकान, स्वास्थ्य सेवाएं, शिक्षा, संचार व्यवस्था और समय पर चेतावनी देने वाली प्रणाली मौजूद होती है, वहां लोगों को अपेक्षाकृत कम नुकसान होता है।

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इसके विपरीत जिन इलाकों में गरीबी अधिक है, बुनियादी सुविधाओं की कमी है और लोगों की तैयारी कमजोर है, वहां छोटी आपदा भी गंभीर रूप ले सकती है। ऐसे क्षेत्रों में लोगों के लिए सुरक्षित स्थानों तक पहुंचना और समय पर बचाव कार्य करना भी कठिन हो जाता है।

देशों के भीतर भी दिखी असमानता

अध्ययन की एक खास बात यह रही कि इसमें देशों के अंदर मौजूद क्षेत्रीय असमानताओं पर भी ध्यान दिया गया। शोधकर्ताओं ने पाया कि कई देशों में कुछ इलाके तेजी से विकसित हुए हैं, जबकि कई क्षेत्र अब भी विकास में पीछे हैं।

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ऐसी स्थिति में यदि किसी कम विकसित क्षेत्र में जलवायु संबंधी आपदा आती है तो वहां रहने वाले लोगों पर उसका असर अधिक पड़ता है। तेजी से विकास कर रहे देशों में भी यह अंतर साफ दिखाई देता है। इसलिए किसी देश का औसत विकास स्तर पूरी तस्वीर नहीं दिखाता।

विकास से कम हो सकता है जोखिम

शोधकर्ताओं का कहना है कि पिछले तीन दशकों में दुनिया के कई हिस्सों में विकास हुआ है, जिसके कारण कम विकास वाले क्षेत्रों की संख्या में कमी आई है। इसके बावजूद इन इलाकों में आपदाओं से होने वाली मानवीय क्षति अब भी बहुत अधिक है।

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इसका मतलब है कि केवल आर्थिक विकास पर्याप्त नहीं है। विकास के लाभ समाज के हर क्षेत्र तक पहुंचने चाहिए। खासकर उन इलाकों में निवेश बढ़ाने की जरूरत है जो अभी भी शिक्षा, स्वास्थ्य, आधारभूत ढांचे और अन्य सुविधाओं के मामले में पीछे हैं।

जलवायु अनुकूलन पर जोर

अध्ययन में कहा गया है कि जलवायु परिवर्तन के कारण भविष्य में कई क्षेत्रों में बाढ़, तूफान और अन्य प्राकृतिक आपदाओं का खतरा बढ़ सकता है। हालांकि इन आपदाओं से होने वाला नुकसान पहले से तय नहीं है।

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यदि सरकारें समय रहते बेहतर बुनियादी ढांचा तैयार करें, मजबूत आपदा प्रबंधन व्यवस्था विकसित करें, लोगों को समय पर चेतावनी देने वाली प्रणालियों का विस्तार करें और शिक्षा व स्वास्थ्य जैसी सुविधाओं में निवेश बढ़ाएं, तो बड़ी संख्या में लोगों की जान बचाई जा सकती है।

यह अध्ययन बताता है कि जलवायु आपदाओं का प्रभाव केवल प्रकृति की ताकत से तय नहीं होता। किसी क्षेत्र का विकास स्तर, लोगों की आर्थिक स्थिति और उपलब्ध सुविधाएं भी उतनी ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

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इसलिए जलवायु परिवर्तन से होने वाले नुकसान को कम करने के लिए केवल पर्यावरण संबंधी उपाय ही नहीं, बल्कि मानव विकास, सामाजिक समानता और मजबूत आधारभूत ढांचे पर भी समान रूप से ध्यान देना जरूरी है। तभी भविष्य में जलवायु आपदाओं से होने वाली मानवीय क्षति को प्रभावी ढंग से कम किया जा सकेगा।

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