

जलवायु परिवर्तन के कारण दुनिया भर में कई पौधों और जानवरों की स्थानीय विलुप्तियां बढ़ रही हैं, नया अध्ययन बताता है।
अध्ययन में पाया गया कि समशीतोष्ण क्षेत्रों की 49 प्रतिशत प्रजातियों ने स्थानीय विलुप्ति का सामना किया, जो चिंताजनक है।
वैज्ञानिकों के अनुसार समशीतोष्ण क्षेत्रों में तापमान उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों की तुलना में तेजी से बढ़ रहा है, जिससे जोखिम बढ़ा।
शोध में सामने आया कि 70 प्रतिशत से अधिक प्रजातियां बढ़ती गर्मी के बावजूद ठंडे क्षेत्रों में नहीं पहुंचीं।
विशेषज्ञों का कहना है कि जैव विविधता में बदलाव भविष्य नहीं, बल्कि वर्तमान में दिखाई देने वाला गंभीर वैश्विक संकट है।
वैज्ञानिकों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण कई प्रजातियां अपने पुराने आवासों से गायब हो रही हैं। इसे स्थानीय विलुप्ति कहा जाता है। हाल ही में नेचर क्लाइमेट चेंज में प्रकाशित एक नए अध्ययन में बताया गया है कि जलवायु परिवर्तन का असर दुनिया भर की हजारों प्रजातियों पर पड़ रहा है और कई स्थानों पर उनकी संख्या तेजी से घट रही है।
5,100 से अधिक प्रजातियों का अध्ययन
अमेरिका के यूनिवर्सिटी ऑफ एरिजोना के शोधकर्ताओं ने दुनिया भर की 5,100 से अधिक पौधों और जानवरों की प्रजातियों का अध्ययन किया। इनमें कीट, मछलियां, पक्षी, स्तनधारी, मेंढक, छिपकलियां और लगभग 3,000 पौधों की प्रजातियां शामिल थीं।
शोधकर्ताओं ने लगभग 40,000 स्थानों से एकत्र किए गए पुराने और नए जैव विविधता सर्वेक्षणों की तुलना की। इससे उन्हें यह समझने में मदद मिली कि समय के साथ किन क्षेत्रों में कौन-सी प्रजातियां गायब हो गई। यह अब तक का जलवायु परिवर्तन से जुड़ी स्थानीय विलुप्तियों का सबसे बड़ा अध्ययन माना जा रहा है।
समशीतोष्ण इलाकों में अधिक संकट
अध्ययन के सबसे चौंकाने वाले निष्कर्षों में से एक यह था कि समशीतोष्ण क्षेत्रों की प्रजातियां अपेक्षा से अधिक प्रभावित हो रही हैं। शोध के अनुसार, समशीतोष्ण क्षेत्रों की 49 प्रतिशत प्रजातियों में उनके सबसे गर्म आवासों पर स्थानीय विलुप्ति देखी गई। वहीं उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में यह आंकड़ा 33 प्रतिशत रहा।
पहले वैज्ञानिकों का मानना था कि उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों की प्रजातियां तापमान में छोटे बदलावों के प्रति अधिक संवेदनशील होती हैं और इसलिए वे जलवायु परिवर्तन से ज्यादा प्रभावित होंगी। लेकिन इस अध्ययन ने अलग तस्वीर पेश की है।
तेजी से बढ़ रहा है तापमान
शोधकर्ताओं ने इस अंतर के पीछे के कारणों को समझने के लिए तापमान वृद्धि, वर्षा में बदलाव, सूखे और हीटवेव जैसे कई कारणों का अध्ययन किया। उन्हें पता चला कि समशीतोष्ण क्षेत्रों में तापमान उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों की तुलना में अधिक तेजी से बढ़ रहा है।
अध्ययन के अनुसार, 25 वर्षों के दौरान उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में अधिकतम तापमान वृद्धि लगभग 3.3 डिग्री फारेनहाइट रही। इसके विपरीत समशीतोष्ण क्षेत्रों में तापमान लगभग 6 डिग्री फारेनहाइट तक बढ़ा, जो लगभग दोगुना है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यही तेज गर्मी वहां की प्रजातियों के लिए बड़ा खतरा बन रही है।
क्या प्रजातियां नए स्थानों पर जा रही हैं?
अक्सर यह माना जाता है कि जब किसी क्षेत्र का तापमान बढ़ता है तो जीव-जंतु और पौधे ठंडे क्षेत्रों की ओर चले जाते हैं। लेकिन अध्ययन में यह धारणा पूरी तरह सही नहीं पाई गई।
शोधकर्ताओं ने पाया कि 70 प्रतिशत से अधिक प्रजातियां ठंडे क्षेत्रों की ओर सफलतापूर्वक नहीं जा रही थीं। कई जानवरों के रास्ते में शहर, सड़कें और अन्य मानव निर्मित बाधाएं हैं। वहीं मछलियां और जलीय जीव नदियों और झीलों तक सीमित रहते हैं, इसलिए उनके लिए स्थान बदलना आसान नहीं होता।
पहाड़ी क्षेत्रों में रहने वाली प्रजातियां कुछ समय तक ऊंचाई की ओर जा सकती हैं, लेकिन अंततः उनके पास आगे बढ़ने के लिए कोई जगह नहीं बचती।
पूरे क्षेत्र में बढ़ रहा है खतरा
अध्ययन में एक और अहम बात सामने आई। उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में स्थानीय विलुप्तियां मुख्य रूप से सबसे गर्म स्थानों पर देखी गईं। लेकिन समशीतोष्ण क्षेत्रों में कई प्रजातियां अपने पूरे क्षेत्र में अलग-अलग जगहों से गायब हो रही हैं।
इसका मतलब है कि केवल सबसे गर्म इलाकों पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं है। अब कई प्रजातियों के लिए उनके पूरे आवास क्षेत्र में खतरा बढ़ रहा है। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह स्थिति संरक्षण योजनाओं के लिए नई चुनौती पैदा करती है।
भविष्य नहीं, वर्तमान की समस्या
शोधकर्ताओं ने स्पष्ट किया कि यह अध्ययन भविष्य की संभावनाओं पर आधारित नहीं है। इसमें उन बदलावों को दर्ज किया गया है जो पहले ही हो चुके हैं।
यह निष्कर्ष बताता है कि जलवायु परिवर्तन का असर आने वाले वर्षों की समस्या नहीं रह गया है। दुनिया भर में पौधों और जानवरों की आबादी पहले से ही बदल रही है और कई प्रजातियां अपने पुराने आवासों से गायब हो चुकी हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि तापमान वृद्धि को नियंत्रित नहीं किया गया, तो स्थानीय विलुप्तियां बढ़ सकती हैं और कई प्रजातियां पूरी तरह समाप्त होने के खतरे में पड़ सकती हैं। यह केवल वन्यजीवों का संकट नहीं है, बल्कि पृथ्वी के पूरे पारिस्थितिकी तंत्र और मानव जीवन के लिए भी एक गंभीर चेतावनी है।