

ईएनएसओ जलवायु पैटर्न, जिसमें अल नीनो और ला नीना शामिल हैं, दुनिया भर में सूखा और बाढ़ जैसी जल अत्यधिक स्थितियां प्रभावित करता है।
कुल जल भंडारण सभी पानी के प्रकारों को मापता है, जिसमें नदियां, झीलें, मिट्टी की नमी, बर्फ और भूजल शामिल हैं।
ग्रेस और ग्रेस-एफओ उपग्रह पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण में बदलाव मापकर जल की स्थिति ट्रैक करते हैं, सूखा और बाढ़ समझने में मदद करते हैं।
2011-2012 के आसपास दुनिया में बदलाव आया, पहले गीली परिस्थितियां अधिक थी, अब सूखे की घटनाएं अधिक होने लगीं।
जल संकट केवल पानी की कमी नहीं है, बल्कि अत्यधिक स्थितियों का प्रबंधन, फसल सुरक्षा और भविष्य की तैयारी करना महत्वपूर्ण है।
पानी जीवन के लिए बहुत जरूरी है। लेकिन जब पानी बहुत कम हो या बहुत अधिक हो जाए, तो इससे लोग, जानवर, फसलें और पूरी प्रकृति प्रभावित होती हैं। सूखा और बाढ़ जैसी जल की अत्यधिक स्थितियां आज दुनिया के कई हिस्सों में बड़ी समस्या बन चुकी हैं। ये न केवल लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित करती हैं, बल्कि अर्थव्यवस्था, खेती, भोजन की उपलब्धता और व्यापार पर भी बड़ा असर डालती हैं।
अल नीनो-सदर्न ऑसिलेशन (ईएनएसओ): जलवायु का प्रमुख पैटर्न
हाल ही में अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्सास, ऑस्टिन के शोधकर्ताओं ने जल की अत्यधिक स्थितियों और उनके कारणों पर एक महत्वपूर्ण अध्ययन किया। यह अध्ययन एजीयू एडवांसेज नाम की पत्रिका में प्रकाशित हुआ। शोधकर्ताओं ने दुनिया भर में पानी के असामान्य स्तरों को ट्रैक किया और यह पता लगाया कि इसके पीछे सबसे बड़ा कारण अल नीनो-सदर्न ऑसिलेशन (ईएनएसओ) है।
ईएनएसओ एक जलवायु पैटर्न है जो प्रशांत महासागर के भूमध्य रेखीय क्षेत्र में बनता है। इसमें दो मुख्य अवस्था होती हैं - अल नीनो और ला नीना। ये अवस्थाएं अलग-अलग तरीके से जलवायु को प्रभावित करती हैं और दुनिया के विभिन्न हिस्सों में सूखा या बाढ़ ला सकती हैं। शोध से पता चला कि ईएनएसओ का प्रभाव केवल एक क्षेत्र तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह अलग-अलग महाद्वीपों में एक साथ सूखा या बाढ़ पैदा कर सकता है। इसे वैज्ञानिक “सिंक्रोनाइजिंग प्रभाव” कहते हैं।
कुल जल भंडारण क्या है?
इस अध्ययन में वैज्ञानिकों ने कुल जल भंडारण को मापा। कुल जल भंडारण का मतलब है किसी क्षेत्र में मौजूद सभी प्रकार का पानी - जैसे नदियां, झीलें, बर्फ, मिट्टी में नमी और भूजल। यह माप इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह केवल बारिश या नदी के पानी तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे क्षेत्र में पानी की स्थिति को दर्शाता है।
ग्रेस उपग्रहों से जल की स्थिति
शोधकर्ताओं ने कुल जल भंडारण का आकलन नासा के ग्रेस और ग्रेस-एफओ उपग्रहों से किया। ये उपग्रह पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण में छोटे बदलावों को मापते हैं और बताते हैं कि किसी क्षेत्र में पानी बढ़ा या घटा है। इससे लगभग 300-400 किलोमीटर बड़े क्षेत्रों का अध्ययन किया गया।
सूखा और बाढ़ की परिभाषा
वैज्ञानिकों ने पानी की अत्यधिक स्थितियों को इस तरह परिभाषित किया: यदि किसी क्षेत्र में जल भंडारण 90 प्रतिशत से अधिक हो, तो इसे अत्यधिक गीला कहा गया। और यदि यह 10 प्रतिशत से कम हो, तो इसे अत्यधिक सूखा माना गया।
अध्ययन में पाया गया कि ईएनएसओ की अलग-अलग अवस्थाएं अलग-अलग क्षेत्रों को प्रभावित करती हैं। उदाहरण के लिए:
अल नीनो के समय दक्षिण अफ्रीका और अमेजन में सूखा पड़ा।
ला नीना के दौरान ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण-पूर्वी ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका में बाढ़ और अत्यधिक गीली स्थितियां हुई।
2011–2012 का बदलाव
शोध में एक और महत्वपूर्ण बात यह सामने आई कि 2011–2012 के आसपास दुनिया में जल की स्थितियों में बदलाव आया। 2011 से पहले अधिकतर समय गीली परिस्थितियां अधिक थीं। लेकिन 2012 के बाद सूखे की घटनाएं बढ़ गई। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह बदलाव प्रशांत महासागर में चल रहे लंबे समय के जलवायु चक्र के कारण हुआ, जो ईएनएसओ के प्रभाव को बदल देता है।
इस शोध का सबसे बड़ा संदेश यह है कि दुनिया भर की जल स्थितियां आपस में जुड़ी हुई हैं। प्रशांत महासागर में होने वाले बदलाव का असर सिर्फ वहीं नहीं रहता, बल्कि यह पूरी दुनिया के जलवायु पैटर्न को प्रभावित करता है। इसलिए सूखा और बाढ़ को केवल स्थानीय समस्या मानना सही नहीं है।
जल प्रबंधन का महत्व
अंततः शोधकर्ताओं का कहना है कि आज की चुनौती यह नहीं है कि दुनिया में पानी खत्म हो रहा है, बल्कि जल की अत्यधिक स्थितियों को समझकर उनका सही प्रबंधन करना जरूरी है। अगर हम ईएनएसओ और अन्य जलवायु पैटर्न को समझ लें, तो हम भविष्य में सूखा और बाढ़ के लिए बेहतर तैयारी कर सकते हैं, फसलें और पानी की आपूर्ति सुरक्षित रख सकते हैं और लोगों को होने वाले नुकसान को कम कर सकते हैं।
पानी की सुरक्षा और उसका सही उपयोग केवल स्थानीय नहीं बल्कि वैश्विक आवश्यकता है। जलवायु में बदलाव और ईएनएसओ जैसी बड़ी जलवायु घटनाओं को समझकर ही हम अपने जीवन और प्रकृति को बचा सकते हैं।