एंडीज, हिमालय व अन्य ग्लेशियरों के पिघलने से लोगों की आस्था व जीवन में आ रहा है बदलाव

शोध बताता है कि जलवायु नीति में केवल वैज्ञानिक नहीं बल्कि सांस्कृतिक और आध्यात्मिक नुकसान को भी शामिल करना चाहिए
एंडीज और हिमालयी इलाकों में ग्लेशियरों के पिघलने से आदिवासी समुदायों की आस्था, परंपराएं, तीर्थयात्राएं और जीवनशैली गहराई से प्रभावित होकर निरंतर बदल हो रही हैं
एंडीज और हिमालयी इलाकों में ग्लेशियरों के पिघलने से आदिवासी समुदायों की आस्था, परंपराएं, तीर्थयात्राएं और जीवनशैली गहराई से प्रभावित होकर निरंतर बदल हो रही हैंफोटो साभार: आईस्टॉक
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सारांश
  • एंडीज और हिमालय में ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं, स्थानीय समुदायों की आस्था और संस्कृति प्रभावित हो रही है

  • बोलीविया का चाकाल्ताया ग्लेशियर 2009 में गायब हुआ, जिससे जल संकट और स्थानीय आयमारा समुदाय की आध्यात्मिक आस्था प्रभावित हुई

  • पेरू में तीर्थयात्रा परंपराएं बदल रही हैं क्योंकि ग्लेशियर पिघलने से लोग बर्फ के बजाय पिघला पानी ले जाते हैं

  • नेपाल के गोक्यो क्षेत्र में पर्यटन बढ़ने से झील को पवित्र मानने आस्था पर्यावरणीय संतुलन पर असर पड़ रहा है

  • शोध बताता है कि जलवायु नीति में केवल वैज्ञानिक नहीं बल्कि सांस्कृतिक और आध्यात्मिक नुकसान को भी शामिल करना चाहिए

हाल ही में नेचर क्लाइमेट चेंज में प्रकाशित एक अध्ययन में बताया गया है कि एंडीज, हिमालय और अन्य ऊंचे पर्वतीय क्षेत्रों में तेजी से पिघलते ग्लेशियर केवल पर्यावरणीय समस्या नहीं हैं, बल्कि यह वहां रहने वाले लोगों की आस्था, संस्कृति और जीवनशैली को भी गहराई से बदल रहे हैं। दक्षिण अमेरिका, एशिया और अफ्रीका के शोधकर्ताओं ने इस अध्ययन में बताया कि इन क्षेत्रों के लोग ग्लेशियरों को सिर्फ बर्फ का हिस्सा नहीं मानते, बल्कि उन्हें अपने पूर्वजों, देवताओं और रक्षकों के रूप में देखते हैं।

ग्लेशियर और आस्था का गहरा संबंध

इन पहाड़ी समुदायों में, खासकर आदिवासी समाजों में, यह विश्वास है कि जब ग्लेशियर पिघलते हैं तो यह केवल प्रकृति का बदलाव नहीं होता, बल्कि यह किसी नैतिक असंतुलन या आध्यात्मिक कारण का संकेत होता है। कई लोग इसे अपने गलत कार्यों का परिणाम मानते हैं। कुछ समुदायों का मानना है कि उनके देवता या पूर्वज उनसे नाराज हो गए हैं और इसलिए बर्फ तेजी से खत्म हो रही है।

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इस तरह की सोच से यह भी होता है कि जलवायु परिवर्तन का दोष लोग बाहरी औद्योगिक दुनिया पर डालने के बजाय अपने ही व्यवहार पर लेने लगते हैं, जैसे प्रकृति की देखभाल न करना या परंपराओं का पालन न करना।

बोलीविया में चाकाल्ताया ग्लेशियर का गायब होना

बोलीविया में चाकाल्ताया ग्लेशियर 2009 में पूरी तरह समाप्त हो गया। यह वैज्ञानिकों के अनुमान से भी जल्दी हुआ। इस ग्लेशियर के खत्म होने से केवल पानी की समस्या नहीं हुई, बल्कि लोगों की आस्था भी प्रभावित हुई। स्थानीय आयमारा समुदाय के लोग मानते हैं कि ग्लेशियर उनके पूर्वजों की तरह हैं, जो उनकी रक्षा करते हैं।

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जब ग्लेशियर पिघल गए, तो लोगों को लगा कि उनके रक्षक कमजोर हो गए हैं या उनसे दूर हो रहे हैं। कुछ लोगों ने इसे अपने समुदाय में बढ़ती लापरवाही और पर्यावरण के प्रति असंवेदनशीलता का परिणाम भी माना।

पेरू में तीर्थयात्रा और बदलती परंपराएं

पेरू के पहाड़ी इलाकों में सदियों से ग्लेशियरों तक तीर्थयात्रा की परंपरा रही है। लोग वहां जाकर बर्फ घर लाते थे, जिसे वे अपने पूर्वजों से जुड़ाव का प्रतीक मानते थे और उसका उपयोग औषधीय रूप में भी करते थे।

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लेकिन अब जब ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं, तो यह परंपरा बदल गई है। अब लोग बड़े-बड़े बर्फ के टुकड़े लाने के बजाय पिघले हुए पानी को ही लेकर जाते हैं। कुछ धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अब लोग मानते हैं कि पहाड़ों की आत्माएं उनसे छिप रही हैं क्योंकि लोग उनकी पर्याप्त पूजा नहीं कर रहे।

इस तरह जलवायु परिवर्तन ने धार्मिक यात्राओं और रीति-रिवाजों के तरीके तक को बदल दिया है।

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नेपाल में पर्यटन और आस्था का टकराव

नेपाल के गोक्यो घाटी क्षेत्र में ग्लेशियर से बने झीलों के आसपास पर्यटन तेजी से बढ़ रहा है। यहां की एक झील को स्थानीय लोग एक देवता का घर मानते हैं। हालांकि ग्लेशियर स्वयं उतना धार्मिक महत्व नहीं रखता, लेकिन झील को पवित्र माना जाता है।

पर्यटन बढ़ने से कई बार परंपराओं और आस्था से जुड़े नियमों का उल्लंघन होता है, जैसे झील में तैरना या अनुचित व्यवहार करना। स्थानीय लोग इसे देवता का अपमान मानते हैं। इसलिए यहां पर्यटकों के व्यवहार को भी धार्मिक नजरिए से देखा जाता है

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सांस्कृतिक नुकसान और जलवायु नीति की चुनौती

शोधकर्ताओं का कहना है कि जलवायु परिवर्तन को केवल कार्बन उत्सर्जन या पर्यावरणीय नुकसान के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। इसके साथ-साथ यह सांस्कृतिक और आध्यात्मिक नुकसान भी है, जिसे सामान्य आंकड़ों में मापा नहीं जा सकता।

इन समुदायों के लिए भूमि, पहाड़ और ग्लेशियर केवल प्राकृतिक संसाधन नहीं हैं, बल्कि जीवन, पहचान और आस्था के केंद्र हैं। जब ये बदलते हैं, तो लोगों की पूरी जीवन व्यवस्था प्रभावित होती है।

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ग्लेशियरों का पिघलना केवल पर्यावरणीय संकट नहीं है, बल्कि यह मानव संस्कृति, आस्था और परंपराओं में गहरा बदलाव ला रहा है। एंडीज से लेकर हिमालय तक, लोग इस परिवर्तन को अलग-अलग रूपों में समझने और अपनाने की कोशिश कर रहे हैं।

शोध का संदेश यह है कि जलवायु नीतियों में केवल वैज्ञानिक और आर्थिक पहलुओं के साथ-साथ सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पहलुओं को भी शामिल करना जरूरी है, ताकि इन समुदायों की असली क्षति को समझा जा सके।

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