

सनलाइट पीक के पास स्थित प्राचीन ग्लेशियर लगभग 20,000 वर्षों से मौजूद था, लेकिन अब तेजी से पिघल रहा है।
वैज्ञानिकों के अनुसार ग्लेशियर हर साल लगभग 50 सेंटीमीटर तक पिघल रहा है और कई जगह केवल थोड़ी बर्फ बची है।
पतली बर्फ वाले हिस्से अगले दस वर्षों में पूरी तरह खत्म हो सकते हैं, जबकि मोटे हिस्सों में कुछ समय तक बर्फ रह सकती है।
वैज्ञानिकों ने ड्रोन, सैटेलाइट और रडार तकनीक का उपयोग करके सौ वर्षों से अधिक के डेटा का अध्ययन किया।
ग्लेशियर के पिघलने से नदियों के जल स्रोत, पर्यावरण संतुलन और पहाड़ी क्षेत्रों की सुरक्षा पर भविष्य में असर पड़ सकता है।
अमेरिका के सनलाइट पीक के पास एक पुराना ग्लेशियर है जिसे सनलाइट ग्लेशियर कहा जाता है। यह ग्लेशियर लगभग 20,000 साल से मौजूद है। लेकिन अब वैज्ञानिकों के अनुसार यह ग्लेशियर तेजी से पिघल रहा है। इस पर शोध सेंट लुइस में वाशिंगटन विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने किया है। उनका कहना है कि आने वाले वर्षों में इस ग्लेशियर का बड़ा हिस्सा खत्म हो सकता है। यह खबर जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभावों को दिखाती है।
ग्लेशियर क्या होता है?
ग्लेशियर बहुत बड़ी बर्फ की चादर होती है जो पहाड़ों या ठंडे इलाकों में बनती है। यह बर्फ हजारों सालों में जमा होती है। ग्लेशियर धीरे-धीरे नीचे की ओर खिसकते रहते हैं और कई नदियों को पानी देते हैं। दुनिया के कई हिस्सों में ग्लेशियर पानी का महत्वपूर्ण स्रोत हैं। अगर ग्लेशियर पिघलते हैं तो नदियों और पर्यावरण पर बड़ा असर पड़ सकता है।
सनलाइट ग्लेशियर की स्थिति
वैज्ञानिकों के अनुसार सनलाइट ग्लेशियर हर साल लगभग 50 सेंटीमीटर तक पिघल रहा है। अभी इस ग्लेशियर में अलग-अलग जगहों पर केवल पांच से 20 मीटर तक बर्फ बची है। जिन जगहों पर बर्फ पतली है, वहां आने वाले 10 साल में पूरी बर्फ खत्म हो सकती है। हालांकि कुछ मोटे हिस्सों में बर्फ इस सदी के अंत तक रह सकती है।
यह ग्लेशियर अबसरोका पर्वत क्षेत्र में स्थित है। यहां का मौसम पहले बहुत ठंडा रहता था, इसलिए बर्फ लंबे समय तक टिक पाती थी। लेकिन अब तापमान बढ़ने के कारण बर्फ तेजी से पिघल रही है।
क्या कहता है शोध?
वैज्ञानिकों ने ग्लेशियर की स्थिति जानने के लिए कई आधुनिक तकनीकों का उपयोग किया। उन्होंने ड्रोन से तस्वीरें लीं, सैटेलाइट से आंकड़े इकट्ठा किए और रडार तकनीक का इस्तेमाल किया। इन तरीकों से उन्हें पिछले 100 सालों से भी अधिक समय की जानकारी मिली। इससे उन्हें समझ आया कि ग्लेशियर कितनी तेजी से पिघल रहा है। यह अध्ययन एनल्स ऑफ ग्लेशियोलॉजी में प्रकाशित हुआ है।
इस अध्ययन में पुराने फोटो भी बहुत मददगार साबित हुए। 1960 के दशक में भूवैज्ञानिकों ने इस ग्लेशियर की तस्वीरें ली थीं। इन तस्वीरों की तुलना आज की तस्वीरों से करने पर साफ दिखाई देता है कि बर्फ का आकार पहले से काफी कम हो गया है। इससे वैज्ञानिकों को ग्लेशियर के बदलते रूप को समझने में मदद मिली।
पर्यावरण पर प्रभाव
ग्लेशियर का पिघलना केवल बर्फ का खत्म होना नहीं है। इसका असर पूरे पर्यावरण पर पड़ता है। ग्लेशियर कई नदियों को पानी देते हैं, जिनमें मिसौरी नदी जैसी बड़ी नदी भी शामिल है। अगर ग्लेशियर तेजी से पिघलते हैं तो भविष्य में पानी की कमी हो सकती है।
इसके अलावा पहाड़ों की जमीन भी कमजोर हो सकती है। जब बर्फ पिघलती है तो ढलान अस्थिर हो जाती है और भूस्खलन का खतरा बढ़ जाता है। इसलिए वैज्ञानिक इन क्षेत्रों की लगातार निगरानी कर रहे हैं।
स्थानीय लोगों पर असर
इस क्षेत्र में रहने वाले लोग पहले से ही बदलाव देख रहे हैं। वे देखते हैं कि हर साल बर्फ कम होती जा रही है। पहाड़ों पर बर्फ की परत पतली हो रही है और कुछ जगहों पर पूरी तरह गायब हो चुकी है। पिछले कुछ वर्षों से इस क्षेत्र में “स्नो ड्रॉट” यानी कम बर्फबारी की समस्या भी देखी जा रही है।
यह बदलाव पर्यटन और स्थानीय जीवन पर भी असर डाल सकता है। कई जगहों पर लोग बर्फ और पहाड़ों को देखने के लिए आते हैं। अगर बर्फ कम हो जाएगी तो पर्यटन उद्योग भी प्रभावित हो सकता है।
सनलाइट ग्लेशियर का तेजी से पिघलना जलवायु परिवर्तन का एक स्पष्ट संकेत है। वैज्ञानिकों का मानना है कि अगर तापमान इसी तरह बढ़ता रहा तो दुनिया के कई अन्य ग्लेशियर भी इसी तरह खत्म हो सकते हैं।
इसलिए पर्यावरण की रक्षा और जलवायु परिवर्तन को कम करने के लिए वैश्विक प्रयास बहुत जरूरी हैं। अगर हम अभी कदम उठाते हैं, तो शायद आने वाली पीढ़ियों के लिए इन प्राकृतिक धरोहरों को बचाया जा सकेगा।