भारत ने बढ़ाया वैश्विक तापमान; आईआईटी खड़गपुर के अध्ययन ने ऊर्जा के साथ खेती को भी बताया जिम्मेवार

अध्ययन के अनुसार, भारत से बढ़ती गर्मी में ऊर्जा के साथ खेती की भी बड़ी भूमिका, 1990 के बाद तेजी से बढ़ा जलवायु पर देश का असर
भारत के उत्सर्जन से 1750 से 2024 तक वैश्विक तापमान में करीब 0.05 डिग्री सेल्सियस बढ़ोतरी का अनुमान है।
भारत के उत्सर्जन से 1750 से 2024 तक वैश्विक तापमान में करीब 0.05 डिग्री सेल्सियस बढ़ोतरी का अनुमान है।फोटो साभार: आईस्टॉक
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सारांश
  • भारत के उत्सर्जन से 1750 से 2024 तक वैश्विक तापमान में करीब 0.05 डिग्री सेल्सियस बढ़ोतरी का अनुमान है।

  • भारत दुनिया में ऐतिहासिक रूप से वैश्विक तापमान बढ़ाने वाला पांचवां सबसे बड़ा देश बना है, अध्ययन में सामने आया है।

  • भारत के जलवायु प्रभाव में ऊर्जा क्षेत्र की हिस्सेदारी 61 प्रतिशत है, जिसमें कोयला और तेल मुख्य कारण हैं।

  • कृषि क्षेत्र भारत के कुल तापमान प्रभाव में करीब 28 प्रतिशत योगदान देता है, खासकर मीथेन और नाइट्रस ऑक्साइड से।

  • भारत के 2070 तक नेट-जीरो लक्ष्य के लिए स्वच्छ ऊर्जा के साथ कृषि उत्सर्जन घटाना भी बेहद जरूरी होगा।

भारत का औद्योगिक विकास और बढ़ती आबादी जहां देश की अर्थव्यवस्था को आगे ले जा रही है, वहीं इसका असर जलवायु पर भी पड़ रहा है। एनवायर्नमेंटल रिसर्च कम्युनिकेशन्स में प्रकाशित एक नए अध्ययन के अनुसार, 1750 से 2024 तक भारत के उत्सर्जन से दुनिया के औसत तापमान में करीब 0.05 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी हुई है। अध्ययन में भारत को ऐतिहासिक रूप से दुनिया का पांचवां सबसे बड़ा गर्मी बढ़ाने वाला देश बताया गया है।

इस सूची में भारत से आगे अमेरिका, चीन, रूस और यूरोपीय संघ हैं। हालांकि भारत का कुल योगदान अमेरिका के मुकाबले काफी कम है। अमेरिका के कारण वैश्विक तापमान में करीब 0.27 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी का अनुमान है। लेकिन भारत के मामले में एक खास बात सामने आई है। देश के कुल तापमान प्रभाव का आधे से ज्यादा हिस्सा वर्ष 1990 के बाद सामने आया है।

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1990 के बाद तेजी से बढ़ा असर

भारत में बड़े पैमाने पर औद्योगीकरण, शहरीकरण और ऊर्जा की मांग पिछले कुछ दशकों में तेजी से बढ़ी है। बिजली उत्पादन, परिवहन और उद्योगों में कोयले और तेल जैसे जीवाश्म ईंधनों का इस्तेमाल बढ़ने से कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन भी बढ़ा।

अध्ययन के अनुसार, भारत के तापमान प्रभाव में ऊर्जा क्षेत्र की हिस्सेदारी करीब 61 प्रतिशत है। इसका मुख्य कारण बिजली और परिवहन के लिए जीवाश्म ईंधनों का इस्तेमाल है। आर्थिक विकास के साथ देश में बिजली की मांग लगातार बढ़ी है और इसका बड़ा हिस्सा अब भी कोयले से पूरा होता है।

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खेती भी जलवायु परिवर्तन की बड़ी वजह

भारत के जलवायु प्रभाव की एक खास बात यह है कि इसमें खेती से निकलने वाली गैसों की भूमिका काफी बड़ी है। अध्ययन के अनुसार, भारत के कुल तापमान प्रभाव में कृषि क्षेत्र की हिस्सेदारी करीब 28 प्रतिशत है।

धान की खेती और पशुपालन से बड़ी मात्रा में मीथेन निकलती है। वहीं कृषि गतिविधियों से नाइट्रस ऑक्साइड का उत्सर्जन भी होता है। ये दोनों गैसें वातावरण को गर्म करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

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मीथेन कार्बन डाइऑक्साइड की तुलना में कम समय तक वातावरण में रहती है, लेकिन उस दौरान यह गर्मी को रोकने में काफी ज्यादा प्रभावी होती है। इसलिए भारत के लिए जलवायु नीति बनाते समय केवल कार्बन डाइऑक्साइड पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं होगा।

केवल कार्बन डाइऑक्साइड से तस्वीर अधूरी

यह अध्ययन क्रैनफील्ड यूनिवर्सिटी, ब्रिटेन और आईआईटी खड़गपुर के शोधकर्ताओं ने किया है। वैज्ञानिकों ने फेयर मॉडल की मदद से 1750 से 2024 तक अलग-अलग ग्रीनहाउस गैसों के प्रभाव का अध्ययन किया। इसमें कार्बन डाइऑक्साइड के साथ मीथेन और नाइट्रस ऑक्साइड को भी शामिल किया गया। इससे भारत के जलवायु प्रभाव की अधिक व्यापक तस्वीर सामने आई।

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शोधकर्ताओं ने अलग-अलग समय को आधार बनाकर भी भारत की जिम्मेदारी का आकलन किया। इनमें 1750, 1947 और 1990 जैसे वर्ष शामिल थे। इससे यह समझने में मदद मिली कि ऐतिहासिक जिम्मेदारी का आकलन इस बात पर भी निर्भर करता है कि उत्सर्जन की गणना किस वर्ष से शुरू की जाती है।

अध्ययन में कुछ सीमाएं भी

शोध में भारत की सीमा के भीतर होने वाले उत्सर्जन को मुख्य आधार बनाया गया है। इसमें जंगलों, जमीन के इस्तेमाल में बदलाव और वनों द्वारा कार्बन सोखने जैसे पहलुओं को शामिल नहीं किया गया है।

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इसके अलावा 18वीं और 19वीं सदी के उत्सर्जन से जुड़े आंकड़े सीमित हैं। इसलिए पुराने आंकड़ों में कुछ अनिश्चितता भी है। इसे ध्यान में रखते हुए शोधकर्ताओं ने एक हजार से अधिक अलग-अलग सिमुलेशन किए और उनके आधार पर औसत अनुमान तैयार किया।

भारत के लिए आगे की चुनौती

भारत ने वर्ष 2070 तक नेट-जीरो उत्सर्जन का लक्ष्य रखा है। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए ऊर्जा और कृषि दोनों क्षेत्रों में बदलाव जरूरी होंगे।

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कोयले पर निर्भरता कम करना और सौर तथा अन्य स्वच्छ ऊर्जा स्रोतों को बढ़ाना एक बड़ी प्राथमिकता होगी। साथ ही, पशुपालन और धान की खेती से मीथेन उत्सर्जन कम करने के तरीके अपनाने होंगे। पशुओं के चारे में सुधार और धान के खेतों में पानी के इस्तेमाल के तरीके बदलना इसमें मददगार हो सकता है।

अध्ययन का संदेश साफ है कि जलवायु परिवर्तन की जिम्मेदारी केवल पुराने औद्योगिक देशों तक सीमित नहीं है। भारत जैसे तेजी से विकसित होते देशों की भूमिका भी अब महत्वपूर्ण हो गई है। इसलिए आर्थिक विकास के साथ पर्यावरण की सुरक्षा को संतुलित करना आने वाले वर्षों की सबसे बड़ी चुनौती होगी।

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