

जलवायु परिवर्तन के कारण पौधे और जीव-जंतु ठंडे इलाकों की तलाश में पहाड़ों की ऊंचाई की ओर तेजी से बढ़ रहे हैं।
वैज्ञानिक अध्ययन में खुलासा हुआ कि 845 प्रजातियां तापमान बढ़ने के कारण अलग-अलग गति से अपने आवास बदल रही हैं।
उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों की प्रजातियां बढ़ती गर्मी से बचने के लिए ऊंचे स्थानों की ओर अधिक तेजी से स्थानांतरित हो रही हैं।
प्रजातियों का विकासवादी इतिहास तय करता है कि वे बदलती जलवायु परिस्थितियों में कितनी आसानी से अनुकूलन कर पाएंगी।
जलवायु परिवर्तन से जैव विविधता पर खतरा बढ़ा, संरक्षण के लिए प्रजातियों की विशेष जरूरतों को समझना जरूरी है।
जलवायु परिवर्तन का असर अब दुनिया भर के पेड़-पौधों और जीव-जंतुओं पर साफ दिखाई देने लगा है। बढ़ते तापमान के कारण कई प्रजातियां अपने पुराने इलाकों को छोड़कर पहाड़ों की ऊंची जगहों की ओर बढ़ रही हैं। वे ऐसे स्थानों की तलाश कर रही हैं जहां का तापमान उनके लिए पहले जैसे अनुकूल हो।
वैज्ञानिकों का कहना है कि सभी प्रजातियां एक ही गति से ऊंचाई की ओर नहीं बढ़ रही हैं। कुछ जीव और पौधे तेजी से ऊपर की ओर जा रहे हैं, जबकि कुछ बहुत धीमी गति से बदलाव कर रहे हैं। इसका कारण उनकी जलवायु पसंद और उनका लंबा विकास क्रम यानी करोड़ों वर्षों का प्राकृतिक इतिहास है।
845 प्रजातियों पर किया गया बड़ा अध्ययन
हाल ही में वैज्ञानिक पत्रिका नेचर कम्युनिकेशंस में प्रकाशित एक अध्ययन में दुनिया भर की 845 पौधों और जानवरों की प्रजातियों का अध्ययन किया गया। यह अध्ययन चीन की चाइनीज एकेडमी ऑफ साइंसेज और राइस यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने किया।
शोध में यह देखा गया कि जलवायु परिवर्तन के कारण प्रजातियों के रहने की जगह की निचली और ऊपरी सीमाओं में क्या बदलाव आया है। किसी प्रजाति की निचली सीमा वह क्षेत्र होता है जहां वह सबसे ज्यादा गर्मी सहन कर सकती है, जबकि ऊपरी सीमा वह क्षेत्र होता है जहां वह ठंडे और ऊंचे इलाकों में फैल सकती है।
अध्ययन में पाया गया कि इन दोनों सीमाओं में बदलाव एक जैसा नहीं होता। कुछ प्रजातियां गर्म इलाकों से बचने के लिए तेजी से ऊपर की ओर बढ़ती हैं, जबकि कुछ ठंडे क्षेत्रों में फैलने में अधिक सक्षम होती हैं।
उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों की प्रजातियां ज्यादा तेजी से बढ़ीं ऊपर
वैज्ञानिकों के अनुसार, गर्म यानी उष्णकटिबंधीय इलाकों में रहने वाली प्रजातियां अपनी निचली सीमा से ऊपर की ओर तेजी से बढ़ रही हैं। इसका कारण यह है कि ये प्रजातियां पहले से ही अपने लिए उपयुक्त तापमान की सीमा के करीब रहती हैं। तापमान में थोड़ी भी बढ़ोतरी इनके लिए मुश्किल पैदा कर सकती है।
इसके मुकाबले ठंडे और समशीतोष्ण क्षेत्रों की प्रजातियां तापमान में बदलाव को कुछ हद तक ज्यादा सहन कर सकती हैं। इसलिए इनके स्थान बदलने की गति अलग होती है।
शोध में यह भी पाया गया कि जो प्रजातियां गर्म और अधिक नमी वाले वातावरण को पसंद करती हैं, वे ऊंचाई वाले इलाकों में तेजी से फैल सकती हैं।
विकास का इतिहास तय करता है प्रजातियों की क्षमता
इस अध्ययन की सबसे अहम बात यह सामने आई कि किसी प्रजाति का विकासवादी इतिहास उसके भविष्य को प्रभावित करता है। एक ही समूह की प्रजातियों में जलवायु परिवर्तन के प्रति समान प्रतिक्रिया देखने को मिली।
वैज्ञानिकों ने इसे "फाइलोजेनेटिक कंजर्वेटिज्म" कहा है। इसका मतलब है कि लाखों वर्षों के विकास के दौरान बने कुछ गुण आज भी प्रजातियों के व्यवहार और अनुकूलन क्षमता को प्रभावित करते हैं। कुछ प्रजातियां नई परिस्थितियों में आसानी से ढल सकती हैं, जबकि कुछ के लिए बदलते मौसम के साथ तालमेल बैठाना कठिन होता है।
दुनिया भर में फैली प्रजातियों को मिल रहा है फायदा
शोध में यह भी पता चला कि जो प्रजातियां दुनिया के कई हिस्सों में पाई जाती हैं, वे जलवायु परिवर्तन के साथ बेहतर तरीके से तालमेल बैठा रही हैं। ऐसी प्रजातियां अलग-अलग मौसम और परिस्थितियों में रहने की क्षमता रखती हैं।
वे पहाड़ों पर ऊपर की ओर बढ़ सकती हैं और निचले इलाकों में भी लंबे समय तक बनी रह सकती हैं। दूसरी ओर, जो प्रजातियां केवल सीमित वातावरण में रह सकती हैं, उनके लिए बदलती जलवायु बड़ी चुनौती बन रही है।
संरक्षण के लिए जरूरी है नई सोच
वैज्ञानिकों का कहना है कि सभी प्रजातियों के लिए जलवायु परिवर्तन का असर एक जैसा नहीं होगा। इसलिए संरक्षण योजनाएं बनाते समय हर प्रजाति की अलग-अलग जरूरतों को समझना जरूरी है।
केवल यह मान लेना सही नहीं होगा कि सभी जीव ऊंचे पहाड़ों पर जाकर बच जाएंगे। कई प्रजातियों के लिए वहां सही तापमान होने के बावजूद भोजन, प्रजनन और रहने की अन्य जरूरी सुविधाएं उपलब्ध नहीं हो सकतीं।
यह अध्ययन बताता है कि जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए प्रजातियों के प्राकृतिक गुणों और उनके विकास के इतिहास को समझना जरूरी है।
बढ़ते तापमान के इस दौर में यह जानकारी जैव विविधता को बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। कुछ प्रजातियां बदलती दुनिया में खुद को ढाल लेंगी, लेकिन कई अन्य के अस्तित्व पर खतरा बना रहेगा।