प्रकृति पर संकट: 75% जमीन प्रभावित, 10 लाख जीव-जंतु खतरे में, 66% समुद्री क्षेत्र पर भी असर

अंतरराष्ट्रीय जैव विविधता दिवस: आधुनिक दवाओं का लगभग 50 प्रतिशत हिस्सा प्राकृतिक स्रोतों से हासिल होता है, जो जैव विविधता के महत्व को दर्शाता है।
भारत में केवल 2.4 प्रतिशत भूमि होने के बावजूद विश्व की लगभग 7 से 8 प्रतिशत प्रजातियां पाई जाती हैं।
भारत में केवल 2.4 प्रतिशत भूमि होने के बावजूद विश्व की लगभग 7 से 8 प्रतिशत प्रजातियां पाई जाती हैं।फोटो साभार: आईस्टॉक
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सारांश
  • दुनिया में लगभग दस लाख प्रजातियां विलुप्ति के खतरे में हैं, जिससे पारिस्थितिक संतुलन और मानव जीवन प्रभावित हो रहा है।

  • पृथ्वी के लगभग 75 प्रतिशत भूमि क्षेत्र और 66 प्रतिशत समुद्री क्षेत्र मानवजनित गतिविधियों से गंभीर रूप से बदल चुके हैं।

  • भारत में केवल 2.4 प्रतिशत भूमि होने के बावजूद विश्व की लगभग 7 से 8 प्रतिशत प्रजातियां पाई जाती हैं।

  • आधुनिक दवाओं का लगभग 50 प्रतिशत हिस्सा प्राकृतिक स्रोतों से हासिल होता है, जो जैव विविधता के महत्व को दर्शाता है।

  • वैश्विक खाद्य फसलों का 75 प्रतिशत परागण जीवों पर निर्भर है, जिससे कृषि और खाद्य सुरक्षा सीधे जुड़ी हुई है।

हर साल 22 मई को अंतरराष्ट्रीय जैव विविधता दिवस मनाया जाता है। इसका उद्देश्य लोगों को प्रकृति और जीव-जंतुओं के महत्व के बारे में जागरूक करना है। इस साल की थीम “स्थानीय स्तर पर कार्य, वैश्विक प्रभाव के लिए” है। इसका अर्थ है कि छोटे स्तर पर किए गए प्रयास पूरी दुनिया में बड़ा बदलाव ला सकते हैं। आज पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण और जैव विविधता के नुकसान जैसी समस्याओं का सामना कर रही है। ऐसे समय में प्रकृति की रक्षा करना बहुत जरूरी हो गया है।

जैव विविधता क्या है?

जैव विविधता का मतलब पृथ्वी पर मौजूद सभी प्रकार के जीवों और पारिस्थितिक तंत्रों से है। इसमें पेड़-पौधे, पशु-पक्षी, सूक्ष्म जीव और जंगल, नदी, समुद्र, रेगिस्तान जैसे प्राकृतिक क्षेत्र शामिल हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार पृथ्वी पर जीवन का संतुलन बनाए रखने में जैव विविधता की बड़ी भूमिका है। इंसान का भोजन, पानी, दवाइयां और स्वच्छ हवा सीधे तौर पर प्रकृति पर निर्भर करते हैं।

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भारत में केवल 2.4 प्रतिशत भूमि होने के बावजूद विश्व की लगभग 7 से 8 प्रतिशत प्रजातियां पाई जाती हैं।

संयुक्त राष्ट्र के अनुसार दुनिया की 80 प्रतिशत से अधिक खाद्य जरूरतें पौधों से पूरी होती हैं। लगभग तीन अरब लोगों को मछली से पशु प्रोटीन मिलता है। इसके अलावा आधुनिक दवाओं का 50 प्रतिशत से अधिक हिस्सा प्राकृतिक स्रोतों से तैयार होता है। इसलिए जैव विविधता केवल पर्यावरण का विषय नहीं बल्कि मानव जीवन का आधार है।

बढ़ता संकट और चिंताजनक आंकड़े

पिछले कुछ दशकों में मानवजनित गतिविधियों के कारण जैव विविधता को भारी नुकसान हुआ है। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार, पृथ्वी के लगभग 75 प्रतिशत भू-भाग और 66 प्रतिशत समुद्री क्षेत्रों में मानव हस्तक्षेप बढ़ चुका है। बदलती जलवायु, जंगलों के काटे जाने, प्रदूषण, अत्यधिक खनन और शहरीकरण इसके मुख्य कारण हैं।

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रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि लगभग 10 लाख पशु और पौधों की प्रजातियां विलुप्त होने के खतरे में हैं। आर्द्रभूमियों यानी वेटलैंड्स का 35 प्रतिशत हिस्सा वर्ष 1970 के बाद समाप्त हो चुका है। वैज्ञानिकों का मानना है कि अगर यही स्थिति जारी रही तो आने वाले सालों में खाद्य संकट और जल संकट गहरा सकता है।

आक्रामक विदेशी प्रजातियां भी जैव विविधता के लिए खतरा बन रही हैं। इनके कारण 60 प्रतिशत प्रजातियों के विलुप्त होने का खतरा बढ़ा है। इससे वैश्विक अर्थव्यवस्था को हर साल लगभग 423 अरब डॉलर का नुकसान होता है।

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प्रकृति और मानव स्वास्थ्य का संबंध

जैव विविधता का सीधा संबंध मानव स्वास्थ्य से भी है। जब जंगल और प्राकृतिक क्षेत्र नष्ट होते हैं तो जानवरों और इंसानों के बीच संपर्क बढ़ता है। इससे जानवरों से फैलने वाली बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। कोरोना महामारी के बाद इस विषय पर दुनिया का ध्यान अधिक गया है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार, दुनिया की 75 प्रतिशत खाद्य फसलें परागण करने वाले जीवों जैसे मधुमक्खियों पर निर्भर करती हैं। यदि इन जीवों की संख्या कम होती है तो कृषि उत्पादन पर गंभीर असर पड़ सकता है। स्वस्थ जंगल और नदियां जलवायु परिवर्तन को नियंत्रित करने में भी मदद करते हैं। जंगल हर साल लगभग 2.6 अरब टन कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करते हैं।

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भारत की समृद्ध जैव विविधता

भारत दुनिया के 17 मेगाडायवर्स देशों में शामिल है। देश के पास विश्व की केवल 2.4 प्रतिशत भूमि है, लेकिन यहां दुनिया की सात से आठ प्रतिशत प्रजातियां पाई जाती हैं। भारत में 45 हजार से अधिक पौधों और 91 हजार से अधिक पशु प्रजातियों का रिकॉर्ड मौजूद है।

भारत के हिमालय, पश्चिमी घाट, उत्तर-पूर्व क्षेत्र और निकोबार द्वीप समूह दुनिया के प्रमुख जैव विविधता हॉटस्पॉट माने जाते हैं। देश के जंगल, घास के मैदान, समुद्री क्षेत्र और आर्द्रभूमियां लाखों लोगों की आजीविका का आधार हैं। आदिवासी समुदाय भी प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

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स्थानीय प्रयासों से होगा बड़ा बदलाव

वर्ष 2022 में दुनिया के देशों ने कुनमिंग-मॉन्ट्रियल ग्लोबल बायोडायवर्सिटी फ्रेमवर्क को अपनाया। इसके तहत वर्ष 2030 तक 30 प्रतिशत भूमि और समुद्री क्षेत्रों को संरक्षित करने तथा 30 प्रतिशत खराब हो चुके पारिस्थितिक तंत्रों को पुनर्जीवित करने का लक्ष्य रखा गया है।

विशेषज्ञों का कहना है कि केवल सरकारी योजनाओं से यह लक्ष्य पूरा नहीं होगा। आम लोगों की भागीदारी भी जरूरी है। पेड़ लगाना, पानी बचाना, प्लास्टिक का कम उपयोग करना और स्थानीय जैव विविधता की रक्षा करना छोटे लेकिन प्रभावी कदम हो सकते हैं।

अंतरराष्ट्रीय जैव विविधता दिवस हमें यह संदेश देता है कि प्रकृति की रक्षा केवल पर्यावरण का मुद्दा नहीं बल्कि मानव अस्तित्व का प्रश्न है। यदि हम आज प्रकृति को बचाने के लिए कदम उठाएंगे, तभी आने वाली पीढ़ियों को सुरक्षित और स्वस्थ भविष्य मिल सकेगा।

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