क्या भारत में हुई थी औषधीय फल के वृक्ष 'जामुन' की उत्पत्ति, क्या कहता है शोध?

जामुन (सिजीगियम) की उत्पत्ति पर नई खोज: भारत में करोड़ों साल पुराना इतिहास और पौधे के विकास में अहम भूमिका का खुलासा करता शोध
शोध से पता चला कि भारत जामुन के शुरुआती विकास और विविधीकरण का प्रमुख केंद्र था, न कि केवल दक्षिण-पूर्व एशिया।
शोध से पता चला कि भारत जामुन के शुरुआती विकास और विविधीकरण का प्रमुख केंद्र था, न कि केवल दक्षिण-पूर्व एशिया।फोटो साभार: आईस्टॉक
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सारांश
  • भारत में मिले जीवाश्म बताते हैं कि जामुन (सिजीगियम) लाखों साल पहले से यहां मौजूद था और इसका लंबा विकास इतिहास रहा है।

  • हिमाचल प्रदेश के कसाैली फॉर्मेशन से मिले दो करोड़ साल पुराने जामुन के पत्तों के जीवाश्म वैज्ञानिकों ने विस्तार से अध्ययन किए।

  • शोध से पता चला कि भारत जामुन के शुरुआती विकास और विविधीकरण का प्रमुख केंद्र था, न कि केवल दक्षिण-पूर्व एशिया।

  • जामुन का प्रसार भारत से होकर दक्षिण-पूर्व एशिया और ऑस्ट्रेलिया तक हुआ, जिससे एशियाई वनस्पति इतिहास नया रूप लेता है।

जामुन एक बहुत ही सामान्य और लोकप्रिय फल है, जिसे भारत में बड़े चाव से खाया जाता है। इसका वैज्ञानिक नाम सिजीगियम है। हाल ही में एक नए वैज्ञानिक अध्ययन में यह पाया गया है कि जामुन की उत्पत्ति के बारे में पहले जो माना जाता था, वह पूरी तरह सही नहीं था। इस शोध के अनुसार, जामुन का इतिहास बहुत अधिक पुराना है और इसमें भारत की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण रही है। यह अध्ययन जर्नल ऑफ पैलियोजियोग्राफी में प्रकाशित किया गया है।

पहले क्या माना जाता था

पहले वैज्ञानिक यह मानते थे कि जामुन का उद्गम लगभग 5.1 करोड़ साल पहले हुआ था। यह भी माना जाता था कि इसकी शुरुआत मुख्य रूप से ऑस्ट्रेलिया या दक्षिण-पूर्व एशिया में हुई होगी। उस समय भारत को इसके विकास में एक मुख्य केंद्र नहीं माना जाता था। लेकिन यह धारणा अब बदल रही है।

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शोध से पता चला कि भारत जामुन के शुरुआती विकास और विविधीकरण का प्रमुख केंद्र था, न कि केवल दक्षिण-पूर्व एशिया।

क्या कहती है नई खोज?

नए अध्ययन के अनुसार, जामुन की उत्पत्ति लगभग आठ करोड़ साल पहले पूर्व गोंडवाना में हुई हो सकती है। इस शोध में बताया गया है कि भारत उस समय जामुन के शुरुआती विकास का एक बहुत महत्वपूर्ण केंद्र था। इसका मतलब है कि जामुन की कहानी भारत से बहुत गहराई से जुड़ी हुई है।

भारत में मिले जीवाश्म

इस अध्ययन में भारत के हिमाचल प्रदेश में कसाैली फॉर्मेशन नाम की जगह से लगभग दो करोड़ साल पुराने जीवाश्म पाए गए। ये जीवाश्म जामुन के पत्तों के थे। वैज्ञानिकों ने कुल 11 अच्छे संरक्षित पत्तों की पहचान की, जिन्हें सिजीगियम पैलियोसैलिसीफोलियम नाम दिया गया।

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इन जीवाश्मों का अध्ययन माइक्रोस्कोप और आधुनिक तकनीकों की मदद से किया गया। इसके अलावा, वैज्ञानिकों ने पुराने पौधों के रिकॉर्ड और दुनिया भर के आंकड़ों से भी तुलना की। इससे यह साबित करने में मदद मिली कि जामुन भारत में बहुत पहले से मौजूद था।

पुरानी जानकारी की फिर से जांच

वैज्ञानिकों ने पहले मिले कुछ पुराने जीवाश्मों की भी दोबारा जांच की। ये जीवाश्म लगभग 5.5 करोड़ साल पुराने माने जाते हैं। इस जांच से पता चला कि जामुन का वंश भारत में बहुत पहले, यानी शुरुआती इओसीन काल से मौजूद हो सकता है। इसका मतलब है कि जामुन का भारत में इतिहास लगातार बहुत लंबे समय से चला आ रहा है।

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जामुन का फैलाव

शोध के अनुसार, जामुन पहले भारत में विकसित हुआ और फिर धीरे-धीरे यह पौधा दक्षिण-पूर्व एशिया और ऑस्ट्रेलिया की ओर फैला। इस तरह भारत इस पौधे के फैलाव का शुरुआती केंद्र बन गया।

इस खोज का महत्व

यह खोज केवल जामुन के बारे में नहीं है, बल्कि यह भी दिखाती है कि भारत का प्राचीन समय में पौधों के विकास में बड़ा योगदान रहा है। इससे यह समझने में मदद मिलती है कि एशिया की वनस्पति कैसे विकसित हुई।

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इसके अलावा यह अध्ययन जलवायु परिवर्तन और पुराने पर्यावरण को समझने में भी मदद करता है। जब हम जानते हैं कि लाखों साल पहले पौधे कैसे थे, तो हम भविष्य में पर्यावरण में होने वाले बदलावों को बेहतर तरीके से समझ सकते हैं।

नई वैज्ञानिक खोज ने जामुन के इतिहास को पूरी तरह से नया रूप दिया है। अब यह स्पष्ट हो रहा है कि भारत केवल इस पौधे का उपभोक्ता क्षेत्र नहीं था, बल्कि इसका एक बहुत महत्वपूर्ण विकास केंद्र भी था। जामुन की यह कहानी हमें यह भी सिखाती है कि प्रकृति और इतिहास कितने गहराई से जुड़े हुए हैं और समय के साथ हमारी समझ कैसे बदल सकती है।

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