जलवायु संकट: 2085 तक पृथ्वी के 36 प्रतिशत जंगल और जानवरों के घरों का हो सकता है सफाया

जलवायु परिवर्तन का बढ़ता असर: वैज्ञानिकों ने बताया, भविष्य में वन्य जीवों के बड़े हिस्से को एक साथ कई आपदाएं झेलनी होंगी
2050 तक 74% भूमि क्षेत्र में हीटवेव और 16% में जंगल की आग का गंभीर खतरा बढ़ने की आशंका
2050 तक 74% भूमि क्षेत्र में हीटवेव और 16% में जंगल की आग का गंभीर खतरा बढ़ने की आशंकाफोटो साभार: आईस्टॉक
Published on
सारांश
  • 2085 तक 36% वन्य आवास जलवायु आपदाओं से प्रभावित होंगे, हीटवेव, बाढ़ और आग का संयुक्त खतरा बढ़ेगा

  • 2050 तक 74% भूमि क्षेत्र में हीटवेव और 16% में जंगल की आग का गंभीर खतरे बढ़ने की आशंका

  • वैज्ञानिकों ने चेताया, जलवायु परिवर्तन से चरम घटनाएं बढ़ेंगी, वन्य जीवन और पारिस्थितिकी तंत्र पर भारी असर पड़ेगा

  • 2019-20 ऑस्ट्रेलियाई जंगल आग के बाद सूखे क्षेत्रों में प्रजातियों की गिरावट 40 प्रतिशत तक अधिक दर्ज हुई

  • उत्सर्जन घटाने पर खतरा कम करना संभव, 36% से घटकर केवल 9% वन्य आवासों पर संयुक्त आपदाओं का असर रहेगा

हाल ही में प्रकाशित एक नई वैज्ञानिक शोध में चेतावनी दी गई है कि आने वाले दशकों में पृथ्वी के वन्य जीवों के आवास बड़े खतरे में पड़ सकते हैं। यह अध्ययन प्रतिष्ठित जर्नल नेचर इकोलॉजी एंड एवोलुशन में प्रकाशित किया गया है। शोध के अनुसार, यदि वैश्विक तापमान में वृद्धि की मौजूदा गति जारी रहती है, तो साल 2085 तक पृथ्वी के लगभग 36 प्रतिशत स्थलीय (जमीन पर मौजूद) पशु आवास एक साथ कई तरह की जलवायु आपदाओं का सामना कर सकते हैं।

इन आपदाओं में मुख्य रूप से हीटवेव यानी भीषण लू, जंगल की आग और बाढ़ शामिल हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि ये घटनाएं अलग-अलग नहीं होंगी, बल्कि एक के बाद एक या एक साथ भी हो सकती हैं, जिससे प्राकृतिक जीवन पर बहुत बड़ा दबाव पड़ेगा।

यह भी पढ़ें
जलवायु परिवर्तन से बढ़ा मानव-वन्यजीव संघर्ष: सूखे के कारण संघर्ष में 57% वृद्धि की आशंका
2050 तक 74% भूमि क्षेत्र में हीटवेव और 16% में जंगल की आग का गंभीर खतरा बढ़ने की आशंका

एक साथ कई आपदाओं का बढ़ता खतरा

इस शोध को जर्मनी स्थित पॉट्सडैम इंस्टीट्यट फॉर क्लाइमेट इम्पैक्ट रिसर्च और 18 अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिकों की टीम ने मिलकर किया है। शोधकर्ताओं का कहना है कि अब तक जलवायु परिवर्तन को अक्सर धीरे-धीरे बढ़ते तापमान के रूप में देखा जाता था, लेकिन असली खतरा अचानक आने वाली चरम मौसम की घटनाओं से है।

अध्ययन में बताया गया है कि यदि हम भविष्य की ओर देखें तो साल 2050 तक ही लगभग 74 प्रतिशत जमीनी इलाकों में भीषण लू देखने को मिल सकती हैं। वहीं लगभग 16 प्रतिशत क्षेत्रों में जंगल की आग का खतरा भी बढ़ जाएगा। यह स्थिति वन्य जीवों के लिए बेहद खतरनाक हो सकती है, क्योंकि उनके पास इतनी तेजी से बदलते मौसम के अनुसार खुद को ढालने का समय नहीं मिलेगा।

यह भी पढ़ें
जलवायु परिवर्तन के कारण 30,000 औषधीय पौधों पर बढ़ रहा है संकट व संरक्षण की चुनौती
2050 तक 74% भूमि क्षेत्र में हीटवेव और 16% में जंगल की आग का गंभीर खतरा बढ़ने की आशंका

क्यों खतरनाक है “कंपाउंड इवेंट”

वैज्ञानिकों ने इस अध्ययन में एक महत्वपूर्ण बात पर जोर दिया है जिसे “कंपाउंड इवेंट” यानी एक के बाद एक आने वाली आपदाएं कहा गया है। इसका मतलब है कि जब एक ही क्षेत्र में कई प्रकार की जलवायु आपदाएं लगातार या एक साथ होती हैं, तो उसका असर बहुत अधिक विनाशकारी हो जाता है।

उदाहरण के तौर पर, यदि किसी क्षेत्र में पहले सूखा पड़े और उसके बाद वहां आग लग जाए, तो उस आग का असर और अधिक गंभीर हो जाता है। सूखे से कमजोर हुए पेड़-पौधे और मिट्टी तेजी से नष्ट हो जाते हैं, जिससे वहां रहने वाले जीवों का जीवन खतरे में पड़ जाता है।

यह भी पढ़ें
गर्म होते समुद्र ने घटाई शार्क की शिकार क्षमता: असंतुलन की कगार पर समुद्री पारिस्थितिकी
2050 तक 74% भूमि क्षेत्र में हीटवेव और 16% में जंगल की आग का गंभीर खतरा बढ़ने की आशंका

इस बात को समझाने के लिए वैज्ञानिकों ने ऑस्ट्रेलिया के 2019-2020 के जंगल की भीषण आग का उदाहरण दिया है। उस समय सूखे से पहले से प्रभावित क्षेत्रों में जीवों की संख्या में सामान्य आग की तुलना में 27 से 40 प्रतिशत अधिक गिरावट दर्ज की गई थी।

जलवायु नीति में बदलाव की जरूरत

शोधकर्ताओं का कहना है कि मौजूदा संरक्षण नीतियां इस तरह के जटिल खतरों को ध्यान में नहीं रखतीं। आमतौर पर योजनाएं केवल तापमान वृद्धि या औसत जलवायु परिवर्तन को देखकर बनाई जाती हैं, जबकि असली खतरा अचानक आने वाली चरम घटनाएं हैं।

यह भी पढ़ें
जलवायु परिवर्तन के कारण जंगलों में लंबे समय तक लग रही है आग, खतरे में 84 फीसदी प्रजातियां
2050 तक 74% भूमि क्षेत्र में हीटवेव और 16% में जंगल की आग का गंभीर खतरा बढ़ने की आशंका

शोध पत्र शोधकर्ता के हवाले से कहा गया है कि जलवायु परिवर्तन को अक्सर धीरे-धीरे होने वाली प्रक्रिया माना जाता है, लेकिन वास्तव में इसका प्रभाव अचानक और बहुत तेज हो सकता है। उन्होंने कहा कि अगर अभी से गंभीर कदम उठाए जाएं, तो भविष्य के नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

समाधान अभी भी संभव है

अच्छी बात यह है कि यह स्थिति पूरी तरह अपरिवर्तनीय नहीं है। शोध में यह भी बताया गया है कि अगर दुनिया तेजी से कार्बन उत्सर्जन कम करे और “नेट-जीरो” लक्ष्य की ओर बढ़े, तो स्थिति काफी बेहतर हो सकती है।

यह भी पढ़ें
जलवायु संकट: जैसे-जैसे धरती गर्म हो रही है, प्रकृति का 'इंजन' धीमा हो रहा है
2050 तक 74% भूमि क्षेत्र में हीटवेव और 16% में जंगल की आग का गंभीर खतरा बढ़ने की आशंका

ऐसा करने पर उन क्षेत्रों का प्रतिशत, जहां कई तरह की जलवायु आपदाएं एक साथ पड़ती हैं, 36 प्रतिशत से घटकर लगभग नौ प्रतिशत तक रह सकता है। इसका मतलब है कि सही नीतियों और तेजी से कार्रवाई से बड़ी संख्या में जीवों के आवास बचाए जा सकते हैं।

भविष्य के लिए चेतावनी

यह अध्ययन दुनिया को एक स्पष्ट संदेश देता है कि जलवायु परिवर्तन केवल एक पर्यावरणीय समस्या नहीं है, बल्कि यह पूरे पारिस्थितिकी तंत्र के लिए खतरा बनता जा रहा है। यदि समय रहते कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में वन्य जीवों की कई प्रजातियां गंभीर संकट में पड़ सकती हैं।

वैज्ञानिकों का मानना है कि अब समय केवल चेतावनी का नहीं, बल्कि तुरंत कार्रवाई का है, ताकि पृथ्वी की जैव विविधता को बचाया जा सके और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक सुरक्षित पर्यावरण सुनिश्चित किया जा सके।

Down to Earth- Hindi
hindi.downtoearth.org.in