

दुनिया में तापमान बढ़ने के बावजूद स्थानीय पारिस्थितिक तंत्र में प्रजातियों का बदलना धीमा हो गया, टर्नओवर दर कम हुई।
यह धीमा बदलाव समुद्री, मीठे पानी और भूमि आधारित सभी पारिस्थितिक तंत्रों में देखा गया, विभिन्न वातावरणों में समान रूप से प्रभावी।
पारिस्थितिक तंत्र में आंतरिक प्रक्रियाएं, जैसे मल्टीपल अट्रैक्टर्स, प्रजाति प्रतिस्थापन को नियंत्रित करती हैं, बाहरी जलवायु परिवर्तन से अधिक।
मानवजनित गतिविधियां और निवास स्थान क्षति क्षेत्रीय प्रजातियों की संख्या घटा रही हैं, जिसके कारण पारिस्थितिक टर्नओवर धीमा हो गया।
स्थिर दिखने वाला पारिस्थितिक तंत्र हमेशा स्वस्थ नहीं होता, जैव विविधता का नुकसान इसे कमजोर और कम लचीला बना देता है।
हमारे ग्रह पर जलवायु तेजी से बदल रही है। तापमान बढ़ रहा है, मौसम के पैटर्न बदल रहे हैं और पर्यावरणीय परिस्थितियां लगातार अस्थिर हो रही हैं। पिछले कई सालों में वैज्ञानिकों का मानना था कि जैसे-जैसे धरती गर्म होगी, प्रकृति भी तेजी से बदलती जाएगी। जानवर और पौधे नए स्थानों पर जाएंगे, कुछ क्षेत्रों से गायब होंगे और पारिस्थितिक तंत्र में लगातार परिवर्तन होगा।
लेकिन हाल ही में क्वीन मैरी यूनिवर्सिटी ऑफ लंदन के शोध में पता चला है कि हकीकत इससे बिल्कुल अलग है। शोध के अनुसार, पारिस्थितिक तंत्र में प्रजातियों का बदलना, जिसे “टर्नओवर” कहते हैं, अब धीमा हो गया है।
प्रजातियों का बदलना (टर्नओवर) धीमा हुआ
नेचर कम्युनिकेशंस में प्रकाशित शोध में 20वीं सदी के अंतिम सौ सालों के दौरान समुद्री, मीठे पानी और जमीन पर रहने वाले जीवों के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। शोधकर्ताओं ने देखा कि 1970 के बाद, जब वैश्विक तापमान तेजी से बढ़ने लगा, प्रजातियों के बदलने की गति कम हो गई।
शोध पत्र में शोधकर्ता के हवाले से कहा गया है कि प्रकृति एक आत्म-मरम्मत इंजन की तरह काम करती है, जो पुराने हिस्सों को बदलकर नए हिस्सों से बदलती रहती है। लेकिन अब यह इंजन धीरे-धीरे रुक रहा है।
टर्नओवर की दर लगभग एक-तिहाई कम हो गई है। यह प्रभाव बहुत ही अलग-अलग पर्यावरणों में देखा गया, जैसे कि जमीन पर पक्षियों से लेकर महासागर की गहराई तक।
आंतरिक पारिस्थितिक तंत्र का महत्व
शोधकर्ताओं ने यह समझने की कोशिश की कि टर्नओवर धीमा क्यों हो रहा है। उन्होंने पाया कि पारिस्थितिक तंत्र केवल बाहरी पर्यावरणीय बदलावों का पालन नहीं करता। कई समुदाय “मल्टीपल अट्रैक्टर्स” अवस्था में काम करते हैं।
इस सिद्धांत के अनुसार, प्रजातियां आपस में प्रतिस्पर्धा के कारण लगातार बदलती रहती हैं। यह कुछ हद तक “रॉक, पेपर, सिजर्स” के खेल जैसा है, जहां कोई भी प्रजाति लंबे समय तक पूरी तरह से हावी नहीं होती। इस शोध ने यह साबित किया कि यह प्राकृतिक प्रक्रिया वास्तविक दुनिया में मौजूद है और पारिस्थितिक तंत्र को चलाती है।
पर्यावरणीय नुकसान और जैव विविधता में गिरावट
यदि आंतरिक प्रक्रियाएं सामान्यतः पारिस्थितिक तंत्र को गतिशील रखती हैं, तो टर्नओवर धीमा क्यों हो गया? शोध में कहा गया है कि मानवजनित गतिविधियों और प्रजातियों के क्षेत्रीय पूल में कमी इसका मुख्य कारण है।
एक स्वस्थ पारिस्थितिक तंत्र में बड़ी संख्या में प्रजातियां उपलब्ध होती हैं, जो नई जगहों पर जाकर समुदाय में शामिल हो सकती हैं। लेकिन जैसे-जैसे मानवजनित गतिविधियों से निवास स्थान क्षतिग्रस्त होता है और जैव विविधता घटती है, संभावित नई प्रजातियों की संख्या कम हो जाती है। परिणामस्वरूप, टर्नओवर धीमा हो जाता है।
शोध में कहा गया है कि शोध में साफ संकेत देखे जा सकते हैं कि मानवजनित प्रभाव टर्नओवर को धीमा कर रहे हैं। यह चिंताजनक है।
स्थिर दिखना स्वास्थ्य की गारंटी नहीं
शोध की यह भी चेतावनी है कि एक ऐसा पारिस्थितिक तंत्र जो स्थिर दिखता है, जरूरी नहीं कि स्वस्थ हो। जब स्थानीय प्रजातियां लंबे समय तक नहीं बदलतीं, तो इसका मतलब हो सकता है कि क्षेत्रीय स्तर पर जैव विविधता कम हो गई है। यह आंतरिक प्रक्रियाओं को कमजोर करता है, जो पारिस्थितिक तंत्र को गतिशील और लचीला बनाए रखती हैं।
इसका मतलब है कि स्थिरता का मतलब हमेशा सुरक्षा या स्वास्थ्य नहीं होता। हमें व्यापक स्तर पर जैव विविधता को संरक्षित करने पर ध्यान देना चाहिए।
वैश्विक तापमान बढ़ रहा है, लेकिन पारिस्थितिकी तंत्र की प्रजातियां अब तेजी से बदल नहीं रही हैं।
टर्नओवर धीमा होने का मुख्य कारण मानव द्वारा किए गए पर्यावरणीय नुकसान और क्षेत्रीय प्रजातियों की कमी है।
पारिस्थितिक तंत्र की आंतरिक प्रक्रियाएं, जैसे कि मल्टीपल अट्रैक्टर्स, अब कमजोर हो रही हैं।
स्थिरता दिखने वाला पारिस्थितिक तंत्र असल में कमजोर और कम लचीला हो सकता है।
जैव विविधता की रक्षा और स्थानीय तथा क्षेत्रीय स्तर पर प्रजातियों को बनाए रखना आवश्यक है।
प्रकृति का यह धीमा इंजन हमें चेतावनी दे रहा है कि अगर हम जल्द कार्रवाई नहीं करेंगे, तो पारिस्थितिक तंत्र अपनी क्षमता खो सकता है और हमारा पर्यावरण असंतुलित हो सकता है।