

कॉपरनिकस क्लाइमेट चेंज सर्विस (सी3एस) की ताजा रिपोर्ट बताती है कि फरवरी 2026 इतिहास की पांचवीं सबसे गर्म फरवरी रही, जब वैश्विक तापमान औद्योगिक काल से पहले की तुलना में 1.49 डिग्री सेल्सियस अधिक दर्ज किया गया।
देखा जाए तो बढ़ती गर्मी अब महज आंकड़ों तक सीमित नहीं रही, बल्कि दुनिया के कई हिस्सों में भारी बारिश, बाढ़ और शक्तिशाली तूफानों के रूप में लोगों की जिंदगी को प्रभावित कर रही है।
फरवरी में यूरोप और उत्तरी अफ्रीका के कई देशों में लगातार बारिश से शहर और गांव डूब गए, जबकि ऑस्ट्रेलिया और अफ्रीका के कुछ हिस्सों में भी बाढ़ ने हजारों लोगों को बेघर कर दिया।
वैज्ञानिकों का कहना है कि बढ़ते तापमान के साथ समुद्र भी गर्म हो रहे हैं और ध्रुवों की बर्फ घट रही है, जिससे मौसम और अधिक चरम होता जा रहा है।
ऐसे में फरवरी 2026 की यह स्थिति दुनिया के लिए एक स्पष्ट चेतावनी है कि अगर समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो जलवायु संकट का असर सीधे लोगों की सुरक्षा, आजीविका और भविष्य पर पड़ सकता है।
फरवरी 2026 ने एक बार फिर यह याद दिला दिया कि धरती का तापमान लगातार बढ़ रहा है और इसका असर अब लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी पर साफ दिखने लगे हैं।
यूरोप की कॉपरनिकस क्लाइमेट चेंज सर्विस (सी3एस) ने भी अपने ताजा रिपोर्ट में जानकारी दी है कि फरवरी 2026, जलवायु रिकॉर्ड का अब तक का पांचवां सबसे गर्म फरवरी रहा। इस महीने वैश्विक औसत तापमान औद्योगिक काल से पहले की तुलना में 1.49 डिग्री सेल्सियस अधिक रिकॉर्ड किया गया। मतलब कि बढ़ता तापमान एक बार फिर डेढ़ डिग्री सेल्सियस की लक्ष्मण रेखा के करीब पहुंच गया।
इस महीने पृथ्वी की सतह के पास हवा का औसत तापमान 13.26 डिग्री सेल्सियस रहा, जो 1991 से 2020 के औसत की तुलना में 0.53 डिग्री सेल्सियस अधिक है। बता दें कि अब तक का सबसे गर्म फरवरी 2024 में दर्ज किया गया था।
देखा जाए तो बढ़ती गर्मी अब केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं, बल्कि दुनिया के कई हिस्सों में भीषण बारिश, बाढ़ और तूफानों के रूप में लोगों की जिंदगी पर भारी पड़ रही है। बता दें कि 2026 की शुरुआत ही पांचवें सबसे गर्म जनवरी के साथ हुई थी, जब बढ़ता तापमान सामान्य से 1.47 डिग्री सेल्सियस अधिक रिकॉर्ड किया गया था।
यूरोप में बारिश ने मचाई तबाही
रिपोर्ट से पता चला है कि इस साल फरवरी के दौरान पश्चिमी यूरोप और उत्तरी अफ्रीका में मौसम बेहद असामान्य रहा।
फ्रांस, स्पेन, पुर्तगाल और मोरक्को में लगातार तेज बारिश हुई। बारिशों की इन घटनाओं ने कई शहरों और गांवों को डुबो दिया। सड़कों पर नदियां बहने लगीं, घरों में पानी भर गया और हजारों लोगों की जिंदगी, रोजगार और सपने एक झटके में बह गए।
फरवरी में केवल यूरोप ही नहीं, बल्कि दुनिया के अन्य हिस्सों में भी बाढ़ का कहर देखा गया।ऑस्ट्रेलिया, मोजाम्बिक और बोत्सवाना में भी कई इलाकों में भीषण बाढ़ ने लोगों को बेघर कर दिया।
रिपोर्ट से पता चला है कि फरवरी में यूरोप के बाहर भी कई क्षेत्रों में तापमान सामान्य से अधिक रहा। अमेरिका, उत्तर-पूर्वी कनाडा, मध्य पूर्व, मध्य एशिया और पूर्वी अंटार्कटिका में फरवरी के दौरान तापमान औसत से अधिक दर्ज किया गया। वहीं दूसरी ओर अलास्का, उत्तरी कनाडा, ग्रीनलैंड और उत्तरी रूस में मौसम ठंडा रहा और यहां तापमान सामान्य से नीचे दर्ज किया गया।
आसमान से आई नदियां
वैज्ञानिकों के अनुसार इन आपदाओं के पीछे एक बड़ी वजह 'एटमॉस्फेरिक रिवर' हैं। 'एटमॉस्फेरिक रिवर', आसमान में बनने वाली नमी से भरी ये लंबी और संकरी हवाओं की धाराएं होती हैं, जो जब जमीन पर पहुंचती हैं तो रिकॉर्ड बारिश होती है।
कॉपरनिकस से जुड़ी वैज्ञानिक सामंथा बर्गेस का इस बारे में कहना है बढ़ते तापमान के कारण मौसम में चरम उतार-चढ़ाव बढ़ रहे हैं, कहीं रिकॉर्ड बारिश हो रही है तो कहीं सूखा पड़ रहा है। ऐसे में इनसे निपटने के लिए दुनिया को तुरंत कदम उठाने की जरूरत है।
यूरोप में फरवरी के दौरान मौसम में बड़ा अंतर देखने को मिला। महाद्वीप के पश्चिमी और दक्षिणी हिस्सों में सामान्य से कहीं ज्यादा बारिश हुई, जबकि बाकी कई इलाकों में हालात अपेक्षाकृत सूखे रहे।
यूरोप के बाहर भी मौसम असामान्य रहा। ऑस्ट्रेलिया के अधिकांश हिस्सों, दक्षिण-पूर्वी ब्राजील, उत्तरी अमेरिका के उत्तरी हिस्सों और मध्य एशिया के कुछ भागों में सामान्य से ज्यादा बारिश दर्ज की गई। वहीं दूसरी ओर दक्षिणी अमेरिका, उत्तरी मैक्सिको, पूर्वी चीन, दक्षिण अमेरिका के कुछ हिस्सों और दक्षिण-पूर्वी अफ्रीका में बारिश औसत से कम रही।
समुद्र भी हो रहा है गर्म
रिपोर्ट बताती है कि फरवरी 2026 में समुद्र की सतह का औसत तापमान 20.88 डिग्री सेल्सियस रहा, जो इस महीने के लिए रिकॉर्ड में संयुक्त रूप से दूसरा सबसे अधिक है। इस दौरान तापमान फरवरी 2025 के करीब-करीब बराबर रहा। वहीं जनवरी 2024 के रिकॉर्ड से यह करीब 0.18 डिग्री सेल्सियस कम है।
वैज्ञानिकों के अनुसार उत्तरी अटलांटिक के मध्य और पश्चिमी हिस्सों में अपेक्षाकृत ठंडा समुद्री तापमान और उपोष्णकटिबंधीय उत्तरी अटलांटिक में ज्यादा गर्म पानी के बीच बड़ा अंतर देखने को मिला। माना जा रहा है कि इसी तापमान अंतर ने उन तूफानों के बनने की स्थिति को मजबूत किया, जो बाद में यूरोप तक पहुंचे।
गर्म समुद्र अक्सर ज्यादा शक्तिशाली तूफानों को जन्म देते हैं। यही वजह है कि इस बार यूरोप की ओर बढ़ने वाले कई तूफान बेहद ताकतवर साबित हुए।
आर्कटिक में भी घट रही बर्फ
धरती के सबसे ठंडे इलाके भी इस बदलाव से अछूते नहीं हैं। आर्कटिक क्षेत्र में फरवरी के दौरान समुद्री बर्फ का विस्तार सामान्य से करीब पांच फीसदी कम रहा और यह इस महीने के लिए तीसरा सबसे कम स्तर है। यह बताता है कि दुनिया का सबसे ठंडा इलाका भी बढ़ते तापमान के सामने बेबस है। कम होती बर्फ इस बात का भी संकेत है कि धरती के ध्रुव तेजी से बदल रहे हैं, जिसका असर पूरे वैश्विक मौसम तंत्र पर पड़ सकता है।
दूसरी तरफ दक्षिणी ध्रुव यानी अंटार्कटिका में फरवरी के दौरान समुद्री बर्फ का कुल फैलाव लगभग सामान्य के आसपास रहा। यह स्थिति पिछले चार वर्षों से बिल्कुल अलग है, जब यहां बर्फ का स्तर औसत से 25 से 33 प्रतिशत तक कम देखा गया था।
वैज्ञानिकों के अनुमान के अनुसार 22 फरवरी के आसपास अंटार्कटिका में समुद्री बर्फ अपने गर्मी के मौसम के न्यूनतम स्तर पर पहुंच गई। हालांकि यह स्तर पिछले 48 वर्षों के औसत दायरे के बीच में रहा। इससे पहले के चार सालों में बर्फ का स्तर रिकॉर्ड या रिकॉर्ड के करीब निचले स्तर तक गिर गया था। सबसे कम स्तर 2023 में दर्ज किया गया।
विशेषज्ञों का कहना है कि ध्रुवीय इलाकों में बर्फ का यह उतार-चढ़ाव केवल स्थानीय बदलाव नहीं है। इसका असर समुद्री धाराओं, मौसम के पैटर्न और पृथ्वी की जलवायु पर पड़ सकता है। यही वजह है कि दुनिया भर के वैज्ञानिक इन इलाकों पर लगातार नजर बनाए हुए हैं।
बदल रहा सर्दी का मौसम
दिसंबर 2025 से फरवरी 2026 के बीच उत्तरी गोलार्ध में सर्दी का मौसम भी असामान्य रहा। इस दौरान वैश्विक तापमान 1991 से 2020 के औसत तापमान से 0.51 डिग्री सेल्सियस अधिक दर्ज किया गया, जो रिकॉर्ड में पांचवां सबसे गर्म सर्दी का मौसम है। हालांकि यूरोप में स्थिति कुछ अलग रही। यहां बीती सर्दी पिछले 13 वर्षों में दो सबसे ठंडी सर्दियों में से एक रही, जहां तापमान 1991 से 2020 के औसत से महज 0.09 डिग्री सेल्सियस अधिक दर्ज किया गया।
वैज्ञानिकों के अनुसार सर्दियों के इस मौसम में तापमान का रुझान काफी हद तक फरवरी में अलग-अलग क्षेत्रों में देखे गए तापमान और बारिश के असामान्य बदलावों से प्रभावित रहा।
चेतावनी साफ है
वैज्ञानिकों का कहना है कि बढ़ते तापमान के साथ भारी बारिश, बाढ़, सूखा और तूफान जैसी घटनाएं और तेज हो सकती हैं। ऐसे में अब धरती का बढ़ता तापमान केवल पर्यावरण से जुड़ा मुद्दा नहीं रह गया है।
यह अब लोगों की सुरक्षा, आजीविका और भविष्य से जुड़ा सवाल बन चुका है।
फरवरी 2026 की यह कहानी एक बड़ी चेतावनी है, अगर दुनिया ने अभी ठोस कदम नहीं उठाए, तो ये मौसम आपदाएं धीरे-धीरे हमारी रोजमर्रा की नई हकीकत बन सकती हैं।