'कार्बन बम' बना अरल सागर: छह दशकों में 74.8 करोड़ टन सीओ2 हुई उत्सर्जित

स्टडी में यह भी सामने आया है कि अरल सागर को फिर से पानी मिले, तो सीओ2 के 60.5 करोड़ टन अतिरिक्त उत्सर्जन को रोका जा सकता है और करोड़ों डॉलर के कार्बन क्रेडिट हासिल किए जा सकते हैं।
अरल सागर की सूखी तलहटी, जहां आज भी जहाज फंसे हैं; फोटो: आईस्टॉक
अरल सागर की सूखी तलहटी, जहां आज भी जहाज फंसे हैं; फोटो: आईस्टॉक
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सारांश
  • कभी दुनिया की चौथी सबसे बड़ी झील रहा अरल सागर आज इंसानों की गलत नीतियों और पर्यावरण से खिलवाड़ का ऐसा भयावह प्रतीक बन चुका है, जिसने जलवायु परिवर्तन के लिए गंभीर खतरा पैदा कर दिया है।

  • साइंस में प्रकाशित अध्ययन के मुताबिक, पिछले छह दशकों में इसकी सूखी तलहटी से 74.8 करोड़ टन कार्बन डाइऑक्साइड वातावरण में उत्सर्जित हो चुकी है, जिससे इसे एक विशाल 'कार्बन बम' में बदल गया है।

  • हालांकि अध्ययन बताता है कि यदि अरल सागर को फिर से पानी मिल सके, तो 60.5 करोड़ टन अतिरिक्त सीओ₂ के उत्सर्जन को रोका जा सकता है। इतना ही नहीं, इसके बदले स्वैच्छिक कार्बन बाजार से अरबों डॉलर के कार्बन क्रेडिट भी हासिल किए जा सकते हैं।

  • वैज्ञानिकों का कहना है कि झीलों की तलछट हजारों वर्षों तक कार्बन को सुरक्षित रखती है, लेकिन सूखने पर वही कार्बन वातावरण में पहुंचकर जलवायु संकट को और गहरा देता है।

  • यह अध्ययन केवल अरल सागर की कहानी नहीं, बल्कि दुनिया की सिकुड़ती झीलों के लिए भी गंभीर चेतावनी है। शोधकर्ताओं का मानना है कि बेहतर जल प्रबंधन, क्षेत्रीय सहयोग और जलवायु वित्त के जरिए अरल सागर का आंशिक पुनर्जीवन संभव है, जिससे पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक लाभ—दोनों एक साथ हासिल किए जा सकते हैं।

कभी दुनिया की चौथी सबसे बड़ी झील रहा अरल सागर, आज इंसान की अंधी दौड़ और गलत नीतियों से उपजी दर्दनाक पर्यावरणीय त्रासदियों की दास्तान बन चुका है।

1960 के दशक में सिंचाई परियोजनाओं के लिए इसकी जीवनदायिनी नदियों का पानी मोड़ दिया गया, जिसके बाद धीरे-धीरे इसका करीब 90 फीसदी हिस्सा सूख गया। विशाल जलराशि की जगह अब नमक से ढका बंजर रेगिस्तान है, जिसने न केवल स्थानीय लोगों की आजीविका और जैव विविधता को प्रभावित किया, बल्कि जलवायु परिवर्तन की एक नई और अब तक अनदेखी समस्या भी पैदा कर दी।

प्रतिष्ठित जर्नल साइंस में प्रकाशित एक नए अध्ययन ने खुलासा किया है कि अरल सागर की सूखी तलहटी पिछले छह दशकों में 74.8 करोड़ टन कार्बन डाइऑक्साइड (सीओ₂) वातावरण में छोड़ चुकी है, जो जलवायु के दृष्टिकोण से बेहद हानिकारक है।

हालांकि वैज्ञानिकों ने इस बात की भी पुष्टि की है कि उम्मीदें पूरी तरह नहीं मरी हैं। यदि अरल सागर को फिर से पानी मिल जाए, तो न केवल करोड़ों टन कार्बन को वातावरण में जाने से रोका जा सकता है, बल्कि यह जलवायु परिवर्तन के खिलाफ दुनिया की सबसे बड़ी प्राकृतिक ढालों में से एक भी बन सकता है।

केवल पानी का भंडार नहीं, कार्बन का भी संजोए रखती हैं झीलें

अध्ययन के मुताबिक, अरल सागर की सूखी तलहटी में आज भी इतनी कार्बन दबी है कि यदि इस झील को दोबारा पानी से भर दिया जाए, तो करीब 60.5 करोड़ टन अतिरिक्त कार्बन डाइऑक्साइड को वातावरण में जाने से रोका जा सकता है।

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यह आंकड़ा कितना बड़ा है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यह मात्रा स्पेन में इंसानी गतिविधियों से तीन वर्षों में होने वाले कुल ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन के करीब-करीब बराबर है।

वैज्ञानिकों के अनुसार झीलें और जलाशय हजारों वर्षों तक पौधों और शैवाल से बनने वाले जैविक पदार्थों को अपनी तलछट में जमा कर कार्बन को सुरक्षित रखती हैं। लेकिन जब कोई झील सूख जाती है, तो यही तलछट हवा के संपर्क में आ जाती है। इसके बाद सूक्ष्मजीव सक्रिय होकर जैविक पदार्थों को विघटित करने लगते हैं और वर्षों से दबा कार्बन, कार्बन डाइऑक्साइड के रूप में वातावरण में मुक्त होने लगती है।

सूखी झील के नीचे अब भी छिपा है 'कार्बन का खजाना'

अध्ययन से जुड़े प्रमुख शोधकर्ता राफेल मार्से के मुताबिक, अरल सागर की तलहटी के नीचे अब भी "कार्बन का छिपा खजाना" मौजूद है। लेकिन यदि यह तलहटी यूं ही खुली रही तो कार्बन डाइऑक्साइड लगातार वातावरण में मुक्त होती रहेगी, लेकिन यदि इसे फिर से पानी से ढक दिया जाए तो यही कार्बन जलवायु परिवर्तन से निपटने का अहम साधन बन सकती है।

अध्ययन से जुड़ी शोधकर्ता नूरिया कातलान का इस बारे में कहना है, "जब कोई झील सूखती है, तो यह सिर्फ जल, पर्यावरण या लोगों की आजीविका का संकट नहीं होता। इससे कार्बन चक्र भी प्रभावित होता है, लेकिन अब तक जलवायु परिवर्तन के आकलन में इस पहलू को लगभग नजरअंदाज किया जाता रहा है।"

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पुनर्जीवन से हो सकता है अरबों डॉलर का फायदा

वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यदि 60.5 करोड़ टन कार्बन डाइऑक्साइड के उत्सर्जन को रोका जा सके, तो स्वैच्छिक कार्बन बाजार (वॉलंटरी कार्बन मार्केट) में इसके बदले 360 से 1,800 करोड़ अमेरिकी डॉलर तक के कार्बन क्रेडिट हासिल किए जा सकते हैं।

दूसरे शब्दों में, अरल सागर को पुनर्जीवित करना केवल एक पर्यावरणीय पहल नहीं, बल्कि जलवायु परिवर्तन से निपटने के साथ-साथ अरबों डॉलर के जलवायु निवेश का भी अवसर बन सकता है।

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अध्ययन में यह भी बताया गया है कि यदि जल प्रबंधन पर करीब 970 अरब डॉलर का निवेश किया जाए और सिंचाई की दक्षता बढ़ाने, जल वितरण व्यवस्था में सुधार लाने तथा क्षेत्रीय सहयोग को मजबूत करने जैसे कदम उठाए जाएं, तो अरल सागर के 1960 के मूल क्षेत्रफल का करीब आधा हिस्सा फिर से पानी से भर सकता है।

यह केवल एक सूखी झील को नया जीवन देने का प्रयास नहीं होगा, बल्कि इससे करीब 32.3 करोड़ टन सीओ₂ के बराबर कार्बन क्रेडिट भी उत्पन्न हो सकते हैं। यानी इसकी मदद से पर्यावरणी की बहाली और आर्थिक लाभ, दोनों एक साथ हासिल किए जा सकते हैं।

दुनिया के कई अन्य जलस्रोतों के लिए भी चेतावनी

अरल सागर अकेला नहीं है जो इस तरह की पर्यावरण त्रासदी को झेल रहा है। वैज्ञानिकों का कहना है कि अमेरिका की ग्रेट साल्ट लेक, साल्टन सी, लेक उर्मिया, अफ्रीका की चाड झील और कैस्पियन सागर जैसे कई बड़े जल स्रोत भी सिकुड़ रहे हैं।

ऐसे में यदि इन्हें बचाने के लिए समय रहते कदम नहीं उठाए गए, तो ये भी कार्बन के बड़े स्रोत बन सकते हैं और जलवायु परिवर्तन की रफ्तार को और तेज कर सकते हैं।

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वैज्ञानिकों का यह भी मानना है कि मध्य एशियाई देशों के बीच राजनीतिक खींचतान और जल आवंटन को लेकर मतभेद के कारण अरल सागर को पूरी तरह पुनर्जीवित करना तकनीकी, राजनीतिक और सामाजिक रूप से बेहद चुनौतीपूर्ण है।

फिर भी यदि बेहतर जल प्रबंधन, अंतरराष्ट्रीय सहयोग और जलवायु वित्त को साथ लाया जाए, तो यह केवल एक झील को नहीं, बल्कि उससे जुड़े पूरे पारिस्थितिकी तंत्र और वैश्विक जलवायु को बचाने की दिशा में ऐतिहासिक कदम हो सकता है।

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