जलवायु परिवर्तन की मार: घट रही झीलों की ‘सेल्फ-क्लीनिंग’ पावर

वैज्ञानिकों ने चेताया है कि यदि वैश्विक तापमान बढ़ता रहा, तो झीलें पानी को साफ रखने की अपनी प्राकृतिक क्षमता खो सकती हैं।
प्रतीकात्मक तस्वीर: सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट
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सारांश
  • झीलें केवल सुंदर प्राकृतिक जलाशय नहीं हैं, बल्कि पृथ्वी की एक महत्वपूर्ण ‘सेल्फ-क्लीनिंग’ प्रणाली भी हैं। ये पानी में मौजूद अतिरिक्त नाइट्रोजन को हटाकर पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने में अहम भूमिका निभाती हैं।

  • लेकिन वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि जलवायु में आता बदलाव इस प्राकृतिक व्यवस्था को कमजोर कर रहा है।

  • स्विट्जरलैंड की बाल्डेगर झील पर किए गए एक नए अध्ययन से पता चला है कि सर्दियों में जब झील की विभिन्न जल परतें आपस में मिलती हैं, तब डिनाइट्रीफिकेशन की प्रक्रिया सबसे अधिक सक्रिय होती है और अतिरिक्त नाइट्रोजन को प्रभावी ढंग से हटाती है। हालांकि, बढ़ते वैश्विक तापमान के कारण सर्दियों की अवधि छोटी होती जा रही है, जिससे यह प्राकृतिक सफाई चक्र भी प्रभावित हो सकता है।

  • वैज्ञानिकों का अनुमान है कि बढ़ते तापमान के साथ झीलों के मिश्रण काल में करीब 27 दिनों की कमी आ सकती है, जिससे उनकी नाइट्रोजन हटाने की क्षमता घट जाएगी। इसके परिणाम केवल झीलों तक सीमित नहीं रहेंगे।

  • अतिरिक्त नाइट्रोजन नदियों के जरिए समुद्र तक पहुंचकर शैवाल में भारी वृद्धि, ऑक्सीजन-विहीन ‘डेड जोन’ और समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र के लिए गंभीर खतरा पैदा कर सकती है।

जब भी हम झीलों के बारे में सोचते हैं, तो हमारे जहन में तैरती मछलियां, मेंढक, चहचहाते पक्षी या पिकनिक मनाने की तस्वीरें उभरती हैं। लेकिन प्रकृति के चक्र में झीलें इससे कहीं बड़ी भूमिका निभाती हैं।

आपको जानकार हैरानी होगी कि झीलें दुनिया के लिए एक प्राकृतिक 'फिल्टर' भी हैं। ये पानी में मौजूद अतिरिक्त नाइट्रोजन को हटाकर पर्यावरण को संतुलित बनाए रखने में अहम भूमिका निभाती हैं। लेकिन अब एक नए अध्ययन में खुलासा हुआ है कि जलवायु में आते बदलावों के चलते उनकी पानी को साफ करने की यह प्राकृतिक क्षमता कमजोर पड़ रही है।

स्विट्जरलैंड की यूनिवर्सिटी ऑफ बेसल और ईवाग के वैज्ञानिकों ने अपने नए अध्ययन में पाया है कि बढ़ता तापमान झीलों की नाइट्रोजन हटाने की क्षमता को प्रभावित कर सकता है। इस अध्ययन के नतीजे प्रतिष्ठित जर्नल नेचर माइक्रोबायोलॉजी में प्रकाशित हुए हैं।

डिनाइट्रीफिकेशन: झीलों की अदृश्य ‘सेल्फ-क्लीनिंग’ प्रणाली

गौरतलब है कि दुनिया भर में कृषि और उद्योगों के कारण पानी में नाइट्रोजन (जैसे नाइट्रेट और अमोनिया) की मात्रा लगातार बढ़ रही है। हालांकि झीलों में मौजूद सूक्ष्मजीव इस नाइट्रोजन यौगिकों को डाइनाइट्रोजन गैस में बदल देते हैं। इस तरह यह गैस वातावरण में चली जाती है, जिससे अतिरिक्त नाइट्रोजन प्राकृतिक रूप से हट जाती है। इस प्रक्रिया को डिनाइट्रीफिकेशन कहा जाता है।

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झीलों, नदियों और अन्य आंतरिक जल स्रोतों में होने वाली ऐसी प्रक्रियाएं प्रकृति से अतिरिक्त नाइट्रोजन को हटाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार, इन जल स्रोतों में प्राकृतिक रूप से हटाई जाने वाली कुल नाइट्रोजन का करीब 20 फीसदी हिस्सा इसी तरह की प्रक्रियाओं के जरिए हटता है।

अपनी इस स्टडी में वैज्ञानिकों ने स्विट्जरलैंड की 'बाल्डेगर झील' का अध्ययन किया है। यह झील बिल्कुल वैसी ही है जैसी दुनिया के अधिकांश समशीतोष्ण इलाकों में होती हैं, जहां साल में एक बार पानी की परतें आपस में पूरी तरह मिलती हैं। इस दौरान सतह का गर्म और ऑक्सीजन युक्त पानी, मध्य परत तथा गहराई में मौजूद ठंडा और ऑक्सीजन की कमी वाला पानी एक-दूसरे के साथ मिल जाता है।

जलवायु परिवर्तन ने झीलों की प्राकृतिक ढाल को किया कमजोर

वैज्ञानिकों ने पाया कि सर्दियों के दौरान जब झील में पानी की विभिन्न परतें आपस में मिलती हैं तो डिनाइट्रीफिकेशन की प्रक्रिया गर्मियों की तुलना में करीब 50 फीसदी अधिक सक्रिय हो जाती है।

यहीं पर जलवायु परिवर्तन सबसे बड़ा खतरा बनकर उभरता है। ग्लोबल वार्मिंग के कारण सर्दियों का मौसम छोटा हो रहा है। इसकी वजह से सर्दियों में झीलों के पानी की विभिन्न परताओं के मेल का यह मिश्रण काल भी छोटा हो सकता है।

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अध्ययन से जुड़े प्रमुख शोधकर्ता कैमरन कॉलबेक के मुताबिक, "अगर तापमान इसी तरह बढ़ता रहा, तो सर्दियों में पानी के आपस में मिलने के दिन करीब 27 दिन तक कम हो जाएंगे। इसका सीधा मतलब है कि झीलों की नाइट्रोजन साफ करने की क्षमता भारी रूप से घट जाएगी।"

झीलों से समुद्र तक फैल सकता है नाइट्रोजन का संकट

वैज्ञानिकों ने चेताया है कि यदि झीलें नाइट्रोजन को प्रभावी ढंग से नहीं रोक पाईं, तो यह अतिरिक्त नाइट्रोजन नदियों के जरिए समुद्र तक पहुंच जाएगी। इसके परिणामस्वरूप तटीय क्षेत्रों में शैवाल में बढ़ोतरी हो सकती है। साथ ही ऑक्सीजन की कमी वाले ‘डेड जोन’ बन सकते हैं, जहां ऑक्सीजन खत्म होने से समुद्री जीव मर जाते हैं। साथ ही इससे पूरे पारिस्थितिक तंत्र का संतुलन गड़बड़ा सकता है।

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शोधकर्ताओं का कहना है कि झीलों के मौसमी चक्र में होने वाले छोटे बदलाव भी न केवल स्थानीय स्तर पर, बल्कि वैश्विक नाइट्रोजन चक्र पर भी बड़ा असर डाल सकते हैं। यह अध्ययन एक बार फिर दिखाता है कि जलवायु परिवर्तन के प्रभाव केवल बढ़ते तापमान तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे प्रकृति की उन अदृश्य प्रणालियों को भी प्रभावित कर रहे हैं जो पृथ्वी को रहने योग्य बनाए रखती हैं।

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