माजुली द्वीप के 4000 वर्षों के जलवायु इतिहास से उठा पर्दा, बाढ़ व जलवायु परिवर्तन पर बड़ा खुलासा

माजुली द्वीप के 4000 वर्षों के जलवायु इतिहास के अध्ययन में घने जंगल, बदलती मानसून स्थितियां और ब्रह्मपुत्र नदी की बढ़ती बाढ़ व कटाव गतिविधियों का खुलासा हुआ
पिछले 500 वर्षों में ठंडक बढ़ी, वर्षा घटी और मानव हस्तक्षेप से वनस्पति में बदलाव तथा पर्यावरणीय दबाव बढ़ा।
पिछले 500 वर्षों में ठंडक बढ़ी, वर्षा घटी और मानव हस्तक्षेप से वनस्पति में बदलाव तथा पर्यावरणीय दबाव बढ़ा।फोटो साभार: आईस्टॉक
Published on
सारांश
  • माजुली द्वीप के 4000 वर्षों के अध्ययन में घने जंगल, गर्म-नम जलवायु और स्थिर पर्यावरण की प्रारंभिक स्थिति सामने आई।

  • अध्ययन में मानसून की बदलती तीव्रता और बाढ़ की अनियमितता के कारण जलवायु उतार-चढ़ाव और पर्यावरणीय अस्थिरता स्पष्ट हुई।

  • मध्यकालीन जलवायु काल में अधिक वर्षा और आर्द्रता दर्ज हुई, जिससे माजुली की वनस्पति और नदी तंत्र प्रभावित हुआ।

  • पिछले 500 वर्षों में ठंडक बढ़ी, वर्षा घटी और मानव हस्तक्षेप से वनस्पति में बदलाव तथा पर्यावरणीय दबाव बढ़ा।

  • ब्रह्मपुत्र नदी के बढ़ते प्रवाह से माजुली में कटाव और बाढ़ की तीव्रता बढ़ी, जिससे भूमि क्षरण गंभीर हुआ।

असम का माजुली द्वीप, जो दुनिया का सबसे बड़ा नदी द्वीप माना जाता है, हाल ही में एक अहम वैज्ञानिक अध्ययन के कारण चर्चा में है। यह अध्ययन लगभग 4000 वर्षों के जलवायु, वनस्पति और नदी में बदलाव के इतिहास को समझने में मदद करता है। माजुली न केवल प्राकृतिक रूप से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह वैष्णव संत श्रीमंत शंकरदेव की नव-वैष्णव भक्ति परंपरा का भी प्रमुख केंद्र है।

यह शोध भारत के लखनऊ स्थित बीरबल साहनी पुराविज्ञान संस्थान के वैज्ञानिकों द्वारा किया गया है। यह संस्थान पृथ्वी के प्राचीन पर्यावरण और जलवायु इतिहास पर काम करने के लिए जाना जाता है।

यह भी पढ़ें
भारत में 25 करोड़ साल पुरानी जंगल की आग के सबूत मिले
पिछले 500 वर्षों में ठंडक बढ़ी, वर्षा घटी और मानव हस्तक्षेप से वनस्पति में बदलाव तथा पर्यावरणीय दबाव बढ़ा।

कैसे किया गया अध्ययन

वैज्ञानिकों ने माजुली द्वीप के साकली वेटलैंड से लगभग 150 सेंटीमीटर गहरा मिट्टी का नमूना (सेडिमेंट कोर) लिया। इस मिट्टी की परतों में हजारों साल पुराने परागकण (पोलन) और रेत के कण सुरक्षित थे।

परागकणों का अध्ययन यह बताता है कि उस समय कौन-कौन से पेड़-पौधे मौजूद थे। वहीं, मिट्टी के कणों का आकार यह समझने में मदद करता है कि उस समय बाढ़ और नदी का प्रवाह कितना तेज या कमजोर था। इन दोनों वैज्ञानिक तरीकों को मिलाकर शोधकर्ताओं ने माजुली के प्राकृतिक इतिहास का एक लंबा और विस्तृत रिकॉर्ड तैयार किया।

यह भी पढ़ें
भूटान में जलवायु परिवर्तन और गांव खाली होने की बढ़ती समस्या: रिपोर्ट का खुलासा
पिछले 500 वर्षों में ठंडक बढ़ी, वर्षा घटी और मानव हस्तक्षेप से वनस्पति में बदलाव तथा पर्यावरणीय दबाव बढ़ा।
यह भी पढ़ें
अनिश्चित होता जा रहा है भारत में मानसूनी बारिश का समय, बिगड़ रहे हालात
पिछले 500 वर्षों में ठंडक बढ़ी, वर्षा घटी और मानव हस्तक्षेप से वनस्पति में बदलाव तथा पर्यावरणीय दबाव बढ़ा।

प्राचीन जलवायु का चित्र

अध्ययन के अनुसार, लगभग 4040 से 2260 साल पहले माजुली का वातावरण गर्म और बहुत नम था। उस समय यहां घने जंगल थे और बारिश भी अधिक होती थी। यह समय वनस्पति के लिए अनुकूल माना गया।

इसके बाद लगभग 2260 से 1100 साल पहले जलवायु में उतार-चढ़ाव बढ़ गया। मानसून की ताकत कभी ज्यादा तो कभी कम होने लगी, जिससे बाढ़ की स्थिति भी अस्थिर हो गई।

मध्यकाल और बदलता मौसम

लगभग 1100 से 500 साल पहले का समय “मध्यकालीन जलवायु अनुकूल अवधि” से जुड़ा पाया गया। इस दौरान वर्षा फिर से बढ़ी और वातावरण अपेक्षाकृत नम रहा। इससे नदी और वनस्पति दोनों पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा।

यह समय वैश्विक स्तर पर भी एक गर्म और आर्द्र जलवायु चरण माना जाता है, जिसे वैज्ञानिक “मेडिवल क्लाइमेटिक एनॉमली” के नाम से जानते हैं।

यह भी पढ़ें
सर्दियों में बढ़ती गर्मी से भारत की गेहूं की फसल पर छाया संकट: अध्ययन
पिछले 500 वर्षों में ठंडक बढ़ी, वर्षा घटी और मानव हस्तक्षेप से वनस्पति में बदलाव तथा पर्यावरणीय दबाव बढ़ा।

पिछले 500 वर्षों में बदलाव

पिछले लगभग 500 वर्षों में तापमान और बारिश दोनों में गिरावट देखी गई। यह समय “लिटिल आइस एज” से जुड़ा माना जाता है, जब दुनिया के कई हिस्सों में ठंडक बढ़ गई थी।

इस दौरान माजुली में मानवजनित गतिविधियां भी बढ़ीं। जंगलों की कटाई, बसावट और खेती के कारण प्राकृतिक वनस्पति में बदलाव आया और जंगल धीरे-धीरे छोटे क्षेत्रों में सिमटने लगे।

यह भी पढ़ें
देश में लू का बढ़ता खतरा, पांच दिन की भीषण गर्मी से 30 हजार अतिरिक्त मौतों की आशंका
पिछले 500 वर्षों में ठंडक बढ़ी, वर्षा घटी और मानव हस्तक्षेप से वनस्पति में बदलाव तथा पर्यावरणीय दबाव बढ़ा।

ब्रह्मपुत्र नदी का प्रभाव

माजुली द्वीप के चारों ओर बहने वाली विशाल ब्रह्मपुत्र नदी ने इस पूरे क्षेत्र को आकार देने में बड़ी भूमिका निभाई है। अध्ययन से पता चलता है कि समय के साथ नदी के प्रवाह में ऊर्जा बढ़ी है, जिससे बाढ़ और कटाव की घटनाएं अधिक तीव्र हो गईं।

मिट्टी के कणों के अध्ययन से यह भी पता चला कि पहले नदी का प्रवाह अपेक्षाकृत शांत था, लेकिन समय के साथ यह अधिक शक्तिशाली और अस्थिर होता गया। इसी कारण माजुली में भूमि कटाव की समस्या गंभीर होती गई।

यह भी पढ़ें
जलवायु परिवर्तन से रिश्ते, समुदाय और मानसिक स्वास्थ्य पर बढ़ता खतरा: नई वैश्विक रिसर्च की चेतावनी
पिछले 500 वर्षों में ठंडक बढ़ी, वर्षा घटी और मानव हस्तक्षेप से वनस्पति में बदलाव तथा पर्यावरणीय दबाव बढ़ा।

पर्यावरण और मानव जीवन पर असर

यह अध्ययन दिखाता है कि माजुली का पर्यावरण हमेशा स्थिर नहीं रहा। यहां जलवायु परिवर्तन, नदी की गतिविधियां और मानव हस्तक्षेप तीनों ने मिलकर भूमि और वनस्पति को प्रभावित किया है।

वैज्ञानिकों का मानना है कि यह जानकारी भविष्य में बाढ़ प्रबंधन, भूमि संरक्षण और पर्यावरण संरक्षण की योजनाओं में बहुत उपयोगी हो सकती है। इससे यह समझने में मदद मिलेगी कि किस तरह के क्षेत्रों में बाढ़ का खतरा ज्यादा है और कैसे उससे निपटा जा सकता है।

यह भी पढ़ें
बढ़ती गर्मी व उमस काल बन रही है पक्षियों के लिए, कई प्रजातियों पर गंभीर संकट
पिछले 500 वर्षों में ठंडक बढ़ी, वर्षा घटी और मानव हस्तक्षेप से वनस्पति में बदलाव तथा पर्यावरणीय दबाव बढ़ा।

भविष्य के लिए सीख

यह शोध माजुली द्वीप को केवल एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं बल्कि एक “प्राकृतिक इतिहास का जीवित रिकॉर्ड” के रूप में प्रस्तुत करता है। यह बताता है कि हजारों वर्षों में जलवायु और नदियों के बदलाव ने कैसे इस द्वीप को लगातार बदलते रखा।

इस अध्ययन से यह भी स्पष्ट होता है कि अगर प्राकृतिक प्रक्रियाओं को सही तरीके से समझा जाए, तो भविष्य में बाढ़ और भूमि क्षरण जैसी समस्याओं से बेहतर तरीके से निपटा जा सकता है। यह शोध रिव्यू ऑफ पैलियोबोटनी एंड पैलिनोलॉजी नामक पत्रिका में प्रकाशित किया गया है।

Down to Earth- Hindi
hindi.downtoearth.org.in