सर्दियों में बढ़ती गर्मी से भारत की गेहूं की फसल पर छाया संकट: अध्ययन

देश में गेहूं संकट गहराया, 10.7 करोड़ टन उत्पादन के बीच रात का तापमान तेजी से बढ़ा, दानों की गुणवत्ता और उपज हो रही है प्रभावित
रात के तापमान में तेज वृद्धि से पौधों की ऊर्जा खपत बढ़ी, दानों का आकार छोटा और उत्पादन क्षमता कम हुई है
रात के तापमान में तेज वृद्धि से पौधों की ऊर्जा खपत बढ़ी, दानों का आकार छोटा और उत्पादन क्षमता कम हुई हैप्रतीकात्मक तस्वीर, फोटो साभार: आईस्टॉक
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सारांश
  • भारत में गेहूं के लिए अहम राज्य माने जाने वाले पंजाब और हरियाणा अन्य प्रमुख गेहूं उत्पादक क्षेत्रों की तुलना में तेजी से गर्म हो रहे हैं।

  • हरियाणा में गेहूं वृद्धि दर 30 प्रतिशत से घटकर नकारात्मक स्तर पर पहुंची, जलवायु परिवर्तन का गंभीर असर दर्ज किया गया है

  • फरवरी से अप्रैल तापमान हर दशक 0.6 डिग्री सेल्सियस से अधिक बढ़ रहा, फसल का विकास चक्र लगातार छोटा हो रहा है

  • रात के तापमान में तेज वृद्धि से पौधों की ऊर्जा खपत बढ़ी, दानों का आकार छोटा और उत्पादन क्षमता कम हुई है

  • पंजाब-हरियाणा सहित प्रमुख गेहूं क्षेत्रों में गर्म सर्दियों के कारण उत्पादन स्थिरता प्रभावित, राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा पर जोखिम बढ़ा है

भारत, जो दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा गेहूं उत्पादक देश है, अब अपनी ही एक अहम फसल को लेकर गंभीर चुनौती का सामना कर रहा है। देश में हर साल लगभग 10.7 करोड़ टन गेहूं का उत्पादन होता है, जो न केवल घरेलू खाद्य जरूरतों को पूरा करता है बल्कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) और खाद्य सुरक्षा का आधार भी है।

लेकिन हाल ही में आए एक नए अध्ययन में चेतावनी दी गई है कि बदलती जलवायु के कारण आने वाले वर्षों में गेहूं की पैदावार और गुणवत्ता दोनों पर असर पड़ सकता है।

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क्या कहता है अध्ययन?

‘वीट अंडर स्ट्रेस: क्लाइमेट चेंज, राइजिंग हीट एंड अडॉप्शन पाथवेज इन इंडियाज मेजर वीट-ग्रोइंग स्टेट्स ’ नाम की रिपोर्ट, जिसे क्लाइमेट ट्रेंड्स ने जारी किया है। रिपोर्ट बताती है कि भारत के प्रमुख गेहूं उत्पादक राज्यों में जलवायु तेजी से बदल रही है। इस अध्ययन में पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और गुजरात को शामिल किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, पिछले कुछ दशकों में गेहूं की उत्पादकता में वृद्धि धीमी पड़ गई है और कुछ क्षेत्रों में गिरावट भी देखने को मिली है।

सर्दियों में बढ़ता तापमान

रिपोर्ट का सबसे अहम निष्कर्ष यह है कि सर्दियों के दौरान तापमान बढ़ रहा है। खासकर रात के समय तापमान दिन की तुलना में तेजी से बढ़ रहा है। यह बदलाव गेहूं की फसल के लिए बहुत नुकसानदायक है क्योंकि गेहूं को अच्छे विकास के लिए ठंडी रातों की जरूरत होती है।

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रात के समय तापमान बढ़ने से पौधों की सांस लेने की प्रक्रिया तेज हो जाती है। इसका मतलब यह है कि पौधा अपने अंदर जमा ऊर्जा को अधिक खर्च करता है, जिससे दानों के विकास के लिए कम ऊर्जा बचती है। परिणामस्वरूप दाने छोटे और हल्के हो जाते हैं।

फरवरी से अप्रैल तक बढ़ती गर्मी

रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि सर्दियों का मौसम धीरे-धीरे छोटा हो रहा है। फरवरी सबसे तेजी से गर्म हो रहा महीना बन गया है, जहां तापमान हर दशक में लगभग 0.69 डिग्री सेल्सियस बढ़ रहा है। मार्च और अप्रैल में भी तापमान लगातार बढ़ रहा है। इसका असर यह होता है कि गेहूं की फसल जल्दी पकने लगती है और दानों का पूरा विकास नहीं हो पाता।

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हरियाणा और पंजाब में सबसे बड़ा असर

भारत के गेहूं उत्पादन का बड़ा हिस्सा हरियाणा और पंजाब से आता है, जिन्हें हरित क्रांति का केंद्र माना जाता है। लेकिन रिपोर्ट के अनुसार इन राज्यों में गेहूं उत्पादन की वृद्धि दर में भारी गिरावट आई है। हरियाणा में जहां पहले उत्पादन वृद्धि दर लगभग 30 प्रतिशत थी, वहीं अब यह घटकर -2.6 प्रतिशत तक पहुंच गई है। पंजाब में भी इसी तरह की गिरावट देखी गई है।

मौसम की अनिश्चितता और अतिरिक्त खतरे

इस समय जलवायु परिस्थितियां और भी जटिल होती जा रही हैं। भारत मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) ने हाल ही में 2026 के मानसून पूर्वानुमान को घटाकर 90 प्रतिशत औसत बारिश बताई है। इसके साथ ही वैज्ञानिक दुनिया में यह भी निगरानी की जा रही है कि प्रशांत महासागर में एल नीनो की स्थिति फिर से मजबूत हो सकती है। यह स्थिति भारत में सूखा और गर्मी बढ़ा सकती है, जिससे खरीफ और रबी दोनों फसलों पर दबाव पड़ सकता है।

किसानों की चुनौतियां और सीमित उपाय

किसान इन बदलावों से निपटने के लिए बुवाई का समय बदल रहे हैं, गर्मी सहने वाली किस्मों का उपयोग कर रहे हैं और सिंचाई व्यवस्था सुधार रहे हैं। लेकिन रिपोर्ट का कहना है कि ये उपाय अभी जलवायु परिवर्तन की तेज रफ्तार के सामने पर्याप्त नहीं हैं।

फसल पर पड़ता असर

गर्मी और अनियमित मौसम के कारण गेहूं की फसल में कई समस्याएं देखी जा रही हैं। पौधों में सही तरह से दाने नहीं बन पा रहे हैं, फसल जल्दी पक रही है और दाने सिकुड़े हुए मिल रहे हैं। इसके अलावा कीटों का हमला बढ़ रहा है और फसल की गुणवत्ता भी प्रभावित हो रही है।

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खाद्य सुरक्षा पर खतरा

गेहूं भारत की खाद्य सुरक्षा और महंगाई नियंत्रण के लिए बहुत महत्वपूर्ण फसल है। यदि उत्पादन में गिरावट जारी रहती है, तो इसका असर सीधे आम जनता की थाली और बाजार में कीमतों पर पड़ेगा। साल 2022 में भी तेज गर्मी के कारण उत्पादन प्रभावित हुआ था और सरकार को गेहूं निर्यात पर रोक लगानी पड़ी थी।

आगे की राह

विशेषज्ञों का मानना है कि इस समस्या से निपटने के लिए वैज्ञानिक शोध, जलवायु-रोधी फसल किस्मों का विकास, बेहतर जल प्रबंधन और किसानों को अधिक सहायता की जरूरत है। यदि समय रहते कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में गेहूं उत्पादन पर बड़ा संकट खड़ा हो सकता है।

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भारत की गेहूं बेल्ट में धीरे-धीरे बदलता मौसम एक गंभीर चेतावनी है। यह बदलाव तुरंत दिखाई नहीं देता, लेकिन इसका असर लंबे समय में बहुत गहरा हो सकता है। अगर तापमान का यह बढ़ता रुझान जारी रहा, तो देश की खाद्य सुरक्षा और कृषि अर्थव्यवस्था दोनों पर दबाव बढ़ना तय है।

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