नियम बने, समयसीमा बढ़ती रही: एसओ₂ मानकों के मामले को सुप्रीम कोर्ट ने एनजीटी में उठाने की बात कही

आवेदक का कहना है, एसओ₂ मानकों की समयसीमा बार-बार बढ़ाए जाने से पर्यावरण और स्वास्थ्य को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है।
थर्मल पॉवर प्लांट; प्रतीकात्मक तस्वीर: आईस्टॉक
थर्मल पॉवर प्लांट; प्रतीकात्मक तस्वीर: आईस्टॉक
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सारांश
  • पर्यावरणीय नियमों के पालन में देरी और कचरे के खुले में डंपिंग के खिलाफ अब न्यायिक दखल बढ़ रहा है।

  • कोयला आधारित थर्मल पावर प्लांटों से सल्फर डाइऑक्साइड (एसओ₂) उत्सर्जन कम करने के लिए 2015 में कड़े मानक तय किए गए थे और दो साल में उनका पालन होना था। लेकिन अनुपालन की समयसीमा बार-बार बढ़ती रही और अब यह 2027 तक पहुंच गई है।

  • इस देरी से पर्यावरण और सार्वजनिक स्वास्थ्य को नुकसान होने का आरोप सुप्रीम कोर्ट में दायर आवेदन में लगाया गया। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता को नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) का रुख करने को कहा और 2027 की समयसीमा को देखते हुए अंतरिम राहत की मांग पर सुनवाई करने का निर्देश दिया।

  • यह मामला देश के केटेगरी-ए के कोयला आधारित थर्मल पावर प्लांटों में फ्ल्यू गैस डीसल्फराइजेशन (एफजीडी) प्रणालियों को अनिवार्य रूप से लगाने और संचालन से जुड़ा है। गौरतलब है कि एफजीडी प्रणाली प्लांट से निकलने वाली गैसों में मौजूद सल्फर डाइऑक्साइड को कम करने के लिए इस्तेमाल की जाती है।

  • इसी बीच, हरियाणा के रेवाड़ी जिले के खरखड़ा गांव में खुले में कचरा डालने और उसे मिट्टी में दबाने की शिकायत पर एनजीटी ने संज्ञान लिया।

  • गांव में लंबे समय से जमा कचरे से दुर्गंध, गंदगी और प्रदूषण की शिकायत की गई है।

  • एनजीटी ने हरियाणा राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, ग्राम पंचायत के सरपंच और रेवाड़ी के जिला मजिस्ट्रेट से जवाब मांगा है। दोनों मामले बताते हैं कि पर्यावरणीय नियम तभी प्रभावी होंगे, जब उनका समय पर और सख्ती से पालन सुनिश्चित किया जाए।

कोयला आधारित थर्मल पावर प्लांटों से निकलने वाले सल्फर डाइऑक्साइड (एसओ₂) के उत्सर्जन पर लगाम लगाने के लिए तय मानकों को लागू करने की समयसीमा बार-बार बढ़ाए जाने से पर्यावरण और स्वास्थ्य को भारी नुकसान हो रहा है। यह बात 8 सितंबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट में दायर एक आवेदन में कही गई है।

यह मामला देश के केटेगरी-ए के कोयला आधारित थर्मल पावर प्लांटों में फ्ल्यू गैस डीसल्फराइजेशन (एफजीडी) प्रणालियों को अनिवार्य रूप से लगाने और संचालन से जुड़ा है। गौरतलब है कि एफजीडी प्रणाली प्लांट से निकलने वाली गैसों में मौजूद सल्फर डाइऑक्साइड को कम करने के लिए इस्तेमाल की जाती है।

क्या है पूरा मामला

इस मामले की शुरुआत पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की 7 दिसंबर 2015 की अधिसूचना से हुई थी। मंत्रालय ने पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के तहत देश के सभी कोयला आधारित थर्मल पावर प्लांटों के लिए पहले से अधिक कड़े उत्सर्जन मानक तय किए थे।

इन मानकों का पालन दो साल के भीतर करना अनिवार्य था। लेकिन इसके बाद अनुपालन की समयसीमा कई बार बढ़ाई गई। आवेदन में कहा गया है कि इस देरी की कीमत पर्यावरण और लोगों के स्वास्थ्य को चुकानी पड़ रही है। सल्फर डाइऑक्साइड जैसे प्रदूषकों के लंबे समय तक संपर्क से खासकर सांस और हृदय संबंधी बीमारियों का खतरा बढ़ता है।

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सुप्रीम कोर्ट ने एनजीटी जाने को कहा

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस मामले को नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) के समक्ष उठाया जाना चाहिए। इसके बाद अदालत ने याचिकाकर्ता अंजनी कुमार को एनजीटी का रुख करने को कहा। चूंकि पहले बढ़ाई गई अनुपालन की समयसीमा 2027 में समाप्त होने वाली है, सुप्रीम कोर्ट ने एनजीटी से कहा कि वह याचिकाकर्ता की अंतरिम राहत की मांग पर सुनवाई करे और उचित आदेश पारित करे।

इसके साथ ही मामला अब एनजीटी के सामने है, जहां यह तय होना है कि सल्फर डाइऑक्साइड से जुड़े उत्सर्जन मानकों और एफजीडी प्रणालियों को लागू करने में लगातार हो रही देरी पर क्या अंतरिम राहत या अन्य उचित कदम उठाए जा सकते हैं।

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बता दें कि सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई) ने भी अपनी रिपोर्ट "डिकार्बनाइजिंग द कोल-बेस्ड थर्मल पावर सेक्टर इन इंडिया" में कहा है कि कोयले का उपयोग पूरी तरह बंद करने की जगह इससे होने वाले प्रदूषण और उत्सर्जन को लक्षित तरीके से कम करने के प्रयास करने चाहिए।

रिपोर्ट के मुताबिक इसके लिए कोयला आधारित थर्मल पावर प्लांट्स की कार्यक्षमता में सुधार के साथ बायोमास का समावेश किया जाए, तो यह उत्सर्जन में उल्लेखनीय कमी लाने की दिशा में एक कारगर कदम साबित हो सकता है।

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हरियाणा: कचरे की खुले में डंपिंग से बिगड़ी खरखड़ा गांव की हालत, एनजीटी ने सरकार से मांगा जवाब

हरियाणा में रेवाड़ी जिले के खरखड़ा गांव में लंबे समय से खुले में कचरा डंप किए जाने और उसे मिट्टी में दबाने के मामले पर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने संज्ञान लिया है। कचरे के कारण गांव में बदबू, गंदगी और प्रदूषण फैलने की शिकायत की गई है। मामले की सुनवाई 8 सितंबर 2026 को हुई।

यह मामला खरखड़ा ग्राम पंचायत के सचिव की ओर से दायर पत्र याचिका के आधार पर सामने आया। याचिका में आरोप लगाया गया है कि गांव में अलग-अलग जगहों पर खुले में बड़ी मात्रा में कचरा डाला जा रहा है। कई जगहों पर कचरे को मिट्टी में दबाए जाने की भी शिकायत है। इससे आसपास के इलाकों में गंदगी फैल रही है, जिसका असर पर्यावरण पर भी पड़ रहा है।

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शिकायत के मुताबिक, पिछले कई महीनों से एचएसवीपी सड़क के पास और खरखड़ा में नवनिर्मित तालाब के नजदीक बड़ी मात्रा में कचरा डंप किया जा रहा है। खुले में पड़े कचरे से लगातार दुर्गंध फैल रही है, जिससे स्थानीय लोगों के लिए परेशानी बढ़ रही है।

एनजीटी ने मांगा जवाब

मामले को गंभीरता से लेते हुए एनजीटी ने हरियाणा राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, खरखड़ा ग्राम पंचायत के सरपंच और रेवाड़ी के जिला मजिस्ट्रेट को नोटिस जारी करने का निर्देश दिया है। ट्रिब्यूनल ने संबंधित पक्षों को मामले में अपना जवाब दाखिल करने के लिए 2 दिसंबर 2026 तक का समय दिया है।

देखा जाए तो खुले में कचरा डालना केवल गांव की स्वच्छता का सवाल नहीं है। लंबे समय तक जमा कचरा मिट्टी, पानी और आसपास के पर्यावरण को प्रभावित कर सकता है। ऐसे में एनजीटी की कार्रवाई यह तय करने में महत्वपूर्ण होगी कि खरखड़ा गांव में कचरे के निपटान की जिम्मेदारी किसकी है और प्रदूषण रोकने के लिए क्या कदम उठाए जाते हैं।

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