गढ़वाल घाटी में प्रदूषण की चिंता, ओजोन का स्तर पहुंचा बेहद ऊंचे स्तर पर

हिमालयी घाटी में प्रदूषण और ओजोन के बढ़ते स्तर ने चिंता बढ़ाई, वैज्ञानिकों ने लगातार निगरानी, जागरूकता और पर्यावरण संरक्षण की जरूरत बताई।
हिमालयी घाटी में वायु प्रदूषण चिंता बढ़ा रहा, ओजोन का स्तर कुछ दिनों में सामान्य सीमा से कई गुना अधिक रहा।
हिमालयी घाटी में वायु प्रदूषण चिंता बढ़ा रहा, ओजोन का स्तर कुछ दिनों में सामान्य सीमा से कई गुना अधिक रहा।फोटो साभार: आईस्टॉक
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सारांश
  • हिमालयी घाटी में वायु प्रदूषण चिंता बढ़ा रहा, ओजोन का स्तर कुछ दिनों में सामान्य सीमा से कई गुना अधिक रहा।

  • एक साल के अध्ययन में पीएम2.5 और पीएम10 प्रदूषण प्रमुख चिंता बने, कई दिनों तक निर्धारित मानक पार हुए।

  • 19 दिसंबर 2025 को ओजोन का स्तर बेहद ऊंचा पहुंचा, वैज्ञानिकों ने स्थानीय मौसम और प्रदूषण जमाव को जिम्मेदार बताया।

  • बारिश के दौरान प्रदूषण घटा, जबकि सर्दियों में तापमान उलटाव और गर्मियों में धूप से प्रदूषक बढ़े।

  • वैज्ञानिकों ने ओजोन संरक्षण, प्रदूषण नियंत्रण और लगातार निगरानी को हिमालयी पर्यावरण तथा आने वाली पीढ़ियों के लिए जरूरी बताया।

हिमालयी वातावरणीय एवं अंतरिक्ष भौतिकी शोध प्रयोगशाला (एचएएसपीआरएल), हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय, श्रीनगर गढ़वाल ने 15 सितंबर 2026 को अपना पांचवां ग्रीनहाउस गैस और वायु गुणवत्ता बुलेटिन जारी किया। बुलेटिन में उत्तराखंड के गढ़वाल हिमालय में ग्रीनहाउस गैसों, वायु प्रदूषण, मौसम और ओजोन की स्थिति का वैज्ञानिक विश्लेषण किया गया है।

एक साल के आंकड़ों से सामने आई तस्वीर

प्रयोगशाला के वायु गुणवत्ता निगरानी केंद्र पर 15 सितंबर 2025 से 15 सितंबर 2026 तक दर्ज आंकड़ों का अध्ययन किया गया। इसमें सतह के पास मौजूद ओजोन, पीएम2.5, पीएम10 और अन्य गैसीय प्रदूषकों के साथ मौसम की स्थिति के संबंध को देखा गया। अध्ययन में पाया गया कि गढ़वाल घाटी में पीएम2.5 और पीएम10 प्रमुख वायु प्रदूषण की चिंताओं में बने हुए हैं। एक वर्ष में पीएम2.5 की औसत मात्रा 73.30 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर और पीएम10 की औसत मात्रा 100.48 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर रही।

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ओजोन का औसत स्तर पूरे साल लगातार अधिक नहीं रहा, लेकिन कुछ विशेष दिनों में इसमें बहुत तेज बढ़ोतरी दर्ज की गई। दैनिक अधिकतम आठ घंटे का औसत ओजोन स्तर 49.02 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर रहा। 339 वैध दिनों में 26 दिन यानी 7.7 प्रतिशत दिनों में ओजोन की मात्रा सीपीसीबी के 100 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर के आठ घंटे के संदर्भ स्तर से अधिक रही।

19 दिसंबर की घटना ने बढ़ाई चिंता

अध्ययन में 19 दिसंबर 2025 की ओजोन घटना विशेष रूप से अहम रही। इस दिन आठ घंटे का औसत ओजोन स्तर 634.13 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर तक पहुंच गया, जबकि एक घंटे की ओजोन सांद्रता 880 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर से अधिक दर्ज हुई।

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वैज्ञानिक आकलन के अनुसार, इस असामान्य वृद्धि के पीछे सर्दियों में स्थानीय स्तर पर बायोमास जलाने से पैदा हुए प्रदूषक और घाटी की ऐसी मौसमीय परिस्थितियां हो सकती हैं, जिनमें प्रदूषक हवा में फंस जाते हैं। वैज्ञानिकों ने कहा कि पहाड़ी क्षेत्रों में इस तरह की छोटी अवधि वाली ओजोन घटनाओं को समझने के लिए लगातार निगरानी जरूरी है।

मौसम के साथ बदलता है प्रदूषण

अध्ययन में मौसम के अनुसार प्रदूषण में बदलाव भी देखा गया। सर्दियों में तापमान प्रतिलोमन और वायुमंडलीय स्थिरता के कारण प्रदूषक ऊपर नहीं फैल पाते और घाटी में जमा हो सकते हैं। गर्मियों में धूल, अधिक तापमान और तेज सौर विकिरण ओजोन और कार्बन मोनोऑक्साइड से जुड़ी रासायनिक प्रक्रियाओं को बढ़ा सकते हैं।

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मानसून के दौरान बारिश वातावरण से प्रदूषकों को हटाने में मदद करती है। इसे ‘वेट स्कैवेंजिंग’ कहा जाता है। इसके कारण इस मौसम में कणीय प्रदूषण अपेक्षाकृत कम रहा। शरद ऋतु में भी प्रदूषण का स्तर कई अन्य मौसमों की तुलना में कम पाया गया। एनओ2 , एसओ2, एनएच3 और बेंजीन जैसे अन्य प्रमुख गैसीय प्रदूषकों की औसत मात्रा रिपोर्ट में संदर्भित सीपीसीबी मानकों के भीतर रही।

पीएम2.5 और पीएम10 भी बड़ी चुनौती

एक साल के आंकड़ों में पीएम2.5 की मात्रा 169 दिनों और पीएम10 की मात्रा 146 दिनों में सीपीसीबी की 24 घंटे की सीमा से अधिक रही। इससे पता चलता है कि गढ़वाल घाटी में केवल ओजोन ही नहीं, बल्कि सूक्ष्म कणीय प्रदूषण भी लगातार निगरानी का विषय है। वैज्ञानिकों ने लंबे समय तक वायु गुणवत्ता की निगरानी और प्रदूषण नियंत्रण उपायों को मजबूत करने की जरूरत बताई है।

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ओजोन की दोहरी भूमिका समझना जरूरी

बुलेटिन में ओजोन की दोहरी भूमिका पर भी जोर दिया गया है। धरातल के पास मौजूद ओजोन एक वायु प्रदूषक है, जबकि पृथ्वी की सतह से लगभग 10 से 50 किलोमीटर ऊपर समतापमंडल में मौजूद ओजोन परत सूर्य की हानिकारक पराबैंगनी किरणों से पृथ्वी की रक्षा करती है।

सतह के पास ओजोन सीधे किसी एक स्रोत से नहीं निकलता। यह सूर्य के प्रकाश की मौजूदगी में नाइट्रोजन ऑक्साइड और वाष्पशील कार्बनिक यौगिकों के बीच होने वाली प्रकाश-रासायनिक प्रतिक्रियाओं से बनता है। इसकी अधिक मात्रा आंखों और गले में जलन तथा श्वसन तंत्र पर असर डाल सकती है।

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ओजोन परत और जलवायु संरक्षण साथ-साथ

बुलेटिन में मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल और किगाली संशोधन के महत्व को भी बताया गया है। मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल के तहत सीएफसीएस, हैलोन, कार्बन टेट्राक्लोराइड, मिथाइल क्लोरोफॉर्म और एचसीएफसीएस जैसे ओजोन-क्षयकारी पदार्थों को चरणबद्ध तरीके से कम करने के प्रयास किए गए हैं।

2016 में अपनाया गया किगाली संशोधन एचसीएफसीएस के उपयोग को चरणबद्ध रूप से कम करने से जुड़ा है। एचसीएफसीएस ओजोन परत को सीधे नुकसान नहीं पहुंचाते, लेकिन कई एचसीएफसीएस में ग्लोबल वार्मिंग की क्षमता अधिक होती है। वैज्ञानिक आकलनों के अनुसार, किगाली संशोधन के सफल क्रियान्वयन से इस सदी के अंत तक वैश्विक तापमान वृद्धि को लगभग 0.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित करने में योगदान मिल सकता है।

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हिमालय में लगातार निगरानी की जरूरत

वैज्ञानिकों के अनुसार, हिमालय जैसे संवेदनशील क्षेत्र में केवल सालाना औसत आंकड़ों पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है। कम समय में होने वाली प्रदूषण और ओजोन की तीव्र घटनाओं की भी निगरानी जरूरी है। उपग्रह और जमीन आधारित निगरानी को एक साथ इस्तेमाल करने से हिमालयी वातावरण में हो रहे बदलावों को बेहतर ढंग से समझने में मदद मिल सकती है।

शोध पत्र में शोधकर्ता के हवाले से कहा गया है कि लोगों से तेज धूप के समय लंबे समय तक सीधे सूर्य के संपर्क से बचने, टोपी, छाता, यूवी-सुरक्षात्मक चश्मे और उपयुक्त कपड़ों का इस्तेमाल करने की सलाह दी। उन्होंने पुराने रेफ्रिजरेटर और एयर-कंडीशनर को खुले में गलत तरीके से नष्ट नहीं करने तथा रेफ्रिजरेंट की सुरक्षित रिकवरी और निपटान सुनिश्चित करने की अपील की।

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शोध में कहा गया है कि ओजोन संरक्षण केवल वैज्ञानिकों या सरकारों की जिम्मेदारी नहीं है। आम नागरिक भी वाहन उत्सर्जन और अन्य प्रदूषण स्रोतों को कम करके इसमें योगदान दे सकते हैं। बुलेटिन का संदेश है कि वैज्ञानिक निगरानी, जनजागरूकता और सामूहिक प्रयासों से हिमालयी पर्यावरण और पृथ्वी की सुरक्षा को मजबूत किया जा सकता है।

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