सावधान! दिमाग को खोखला कर रहा है हवा में घुला जहर, स्टडी ने चेताया बढ़ सकता है पार्किंसन का खतरा

अध्ययन में सामने आया है कि पीएम2.5 के स्तर में हर 5 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर की वृद्धि से पार्किंसंस का खतरा 10 प्रतिशत तक बढ़ सकता है। इसी तरह पीएम10 के स्तर में हर 15 माइक्रोग्राम की वृद्धि खतरे को 18 फीसदी तक बढ़ा सकती है।
शरीर के लिए बेहद घातक है हवा में घुलता जहर; फोटो: सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई)
शरीर के लिए बेहद घातक है हवा में घुलता जहर; फोटो: सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई)
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सारांश
  • हम अक्सर वायु प्रदूषण को केवल फेफड़ों से जुड़ी समस्या मानते हैं, लेकिन नई वैज्ञानिक चेतावनी इससे कहीं अधिक गंभीर है।

  • कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी से जुड़े वैज्ञानिकों के मुताबिक, हवा में मौजूद पीएम2.5 और पीएम10 जैसे महीन कण न केवल सांस के जरिए शरीर में प्रवेश करते हैं, बल्कि दिमाग तक पहुंचकर पार्किंसंस जैसी गंभीर तंत्रिका संबंधी बीमारी का खतरा भी बढ़ा सकते हैं।

  • अध्ययन में पाया गया कि पीएम2.5 के स्तर में हर 5 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर की वृद्धि से पार्किंसंस का जोखिम 10 प्रतिशत और पीएम10 में हर 15 माइक्रोग्राम की वृद्धि से यह खतरा 18 प्रतिशत तक बढ़ सकता है।

  • वैज्ञानिकों का मानना है कि ये कण मस्तिष्क में सूजन और ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस पैदा कर तंत्रिका कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाते हैं।

  • यह चेतावनी ऐसे समय आई है जब दुनिया में पार्किंसंस के मरीजों की संख्या पिछले 25 वर्षों में दोगुनी होकर 85 लाख से अधिक हो चुकी है और 2050 तक इसके ढाई करोड़ से ज्यादा मामलों की आशंका जताई गई है।

  • विशेषज्ञों का कहना है कि साफ हवा केवल पर्यावरण का नहीं, बल्कि हमारे मस्तिष्क, भविष्य और जीवन के अधिकार का भी सवाल है। इसलिए प्रदूषण कम करने के लिए अब ठोस और तत्काल कदम उठाना बेहद जरूरी है।

हम अक्सर सोचते हैं कि प्रदूषित हवा केवल फेफड़ों को ही नुकसान पहुंचाती है, लेकिन सच इससे कहीं ज्यादा चिंताजनक है। एक नई रिसर्च से पता चला है कि हम जिस जहरीली हवा में सांस ले रहे हैं, वह न सिर्फ हमारे फेफड़ों को बीमार कर रही है, बल्कि हमारे दिमाग को भी धीरे-धीरे खोखला कर रही है।

कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी से जुड़े वैज्ञानिकों द्वारा किए इस नए अध्ययन में खुलासा हुआ है कि लंबे समय तक दूषित हवा के संपर्क में रहने से 'पार्किंसंस' जैसी दिमाग की गंभीर बीमारी का खतरा काफी बढ़ जाता है।

बता दें कि पार्किंसंस एक ऐसी बीमारी है जो इंसान के शरीर का संतुलन और नियंत्रण छीन लेती है। दुनिया भर में करीब 85 लाख लोग इस बीमारी के दर्द से जूझ रहे हैं।

इस स्टडी के नतीजे प्रतिष्ठित वैज्ञानिक जर्नल एनवायरमेंट इंटरनेशनल में प्रकाशित हुए हैं। इस अध्ययन में शोधकर्ताओं ने अब तक हुए 26 वैज्ञानिक अध्ययनों का गहराई से विश्लेषण किया है। अध्ययन में पाया गया कि हवा में मौजूद प्रदूषण के महीन कण पीएम2.5 और पीएम10, हमारे तंत्रिका तंत्र (नर्वस सिस्टम) के लिए सबसे बड़े दुश्मन बन चुके हैं। इनके लम्बे समय तक संपर्क में रहने से पार्किंसन का जोखिम बढ़ जाता है।

पार्किंसंस से पीड़ित हैं 85 लाख से ज्यादा लोग

आपको जानकार हैरानी होगी कि पिछले 25 वर्षों में दुनिया भर में पार्किंसंस के मरीजों की संख्या दोगुणी हो चुकी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) के मुताबिक, 2019 के दौरान दुनिया भर में 85 लाख से अधिक लोग इस बीमारी से पीड़ित थे। इसी वर्ष पार्किंसंस के कारण 58 लाख स्वस्थ जीवन वर्षों (डिसएबिलिटी एडजस्टेड लाइफ ईयर्स) का नुकसान हुआ, जो 2000 की तुलना में 81 फीसदी अधिक है।

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वहीं, 2019 में इस बीमारी से करीब 3.29 लाख लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा था, जो 2000 के मुकाबले 100 फीसदी से भी अधिक की वृद्धि को दर्शाती है।

वहीं एक अन्य अध्ययन में वैज्ञानिकों ने आशंका जताई है कि अगले 25 वर्षों में पार्किंसंस के मामलों में नाटकीय रूप से बढ़ोतरी हो सकती है। अनुमान है कि 2050 तक दुनिया भर में ढाई करोड़ से ज्यादा लोग दिमाग से जुड़ी इस बीमारी से जूझ रहे होंगे। ब्रिटिश मेडिकल जर्नल (बीएमजे) में प्रकाशित नए अध्ययन में 2050 तक पार्किंसंस के मामलों में 112 फीसदी की वृद्धि की आशंका जताई है।

सांसों के रास्ते दिमाग पर हमला

बता दें कि प्रदूषण के ये महीन कण आकार में इतने छोटे होते हैं कि सांस के जरिए फेफड़ों के रास्ते सीधे खून और दिमाग तक पहुंच जाते हैं।

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नतीजे दर्शाते हैं कि गाड़ियों के धुएं, कारखानों, कंस्ट्रक्शन की धूल और अंगीठियों से निकलने वाले प्रदूषण के महीन कण (पीएम2.5) इतने जहरीले हैं कि इनके स्तर में हर 5 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर की वृद्धि से पार्किंसंस का खतरा 10 फीसदी तक बढ़ सकता है।

इसी तरह सड़कों की धूल, डीजल इंजन के धुएं और टायरों के घिसने से पैदा होने वाले पीएम10 के स्तर में हर 15 माइक्रोग्राम की बढ़ोतरी, इस बीमारी के खतरे को 18 फीसदी तक बढ़ा देती है।

कैसे पहुंचता है मस्तिष्क को नुकसान?

वैज्ञानिकों का कहना है कि जब ये महीन कण, खासकर पीएम2.5 हमारे शरीर में जाते हैं, तो दिमाग में 'ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस' और सूजन (न्यूरोइन्फ्लेमेशन) पैदा करते हैं। यह सूजन हमारे उन जीन्स को नुकसान पहुंचाती है जो बीमारियों से लड़ते हैं। नतीजा यह होता है कि दिमाग की जरूरी कोशिकाएं (न्यूरॉन्स) मरने लगती हैं, जिससे इंसान धीरे-धीरे अपने शरीर पर से नियंत्रण खोने लगता है।

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वहीं अगर किसी व्यक्ति में पहले से पार्किंसन की आनुवंशिक आशंका हो, तो यह प्रदूषण बीमारी की प्रक्रिया को और तेज कर सकता है। इससे मस्तिष्क में असामान्य अल्फा-सिन्यूक्लिन प्रोटीन जमा होने लगता है और डोपामिन बनाने वाली तंत्रिका कोशिकाएं तेजी से नष्ट होने लगती हैं। यही बदलाव आगे चलकर पार्किंसन रोग के विकास में अहम भूमिका निभाते हैं।

अध्ययन में नाइट्रोजन डाइऑक्साइड (एनओ₂), कार्बन मोनोऑक्साइड (सीओ), सल्फर डाइऑक्साइड (एसओ₂), ओजोन और कालिख जैसे अन्य प्रदूषकों के साथ पार्किंसन रोग का स्पष्ट संबंध नहीं मिला।

हालांकि वैज्ञानिकों का कहना है कि इसका कारण पर्याप्त और उच्च गुणवत्ता वाले अध्ययनों का अभाव हो सकता है, इसलिए इनके प्रभावों को समझने के लिए और व्यापक अध्ययन की आवश्यकता है। इसी तरह, मल्टीपल स्क्लेरोसिस और मोटर न्यूरॉन रोग के साथ वायु प्रदूषण के संबंध के भी अभी पर्याप्त प्रमाण नहीं मिले हैं।

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रिसर्च से जुड़ीं वैज्ञानिक एलेक्जेंड्रा टीएन-स्मिथ कहती हैं, "यह अध्ययन साबित करता है कि प्रदूषण सिर्फ फेफड़ों की बीमारी नहीं है, बल्कि यह सिर के बाल से लेकर पैर के नाखून तक, हमारे शरीर के हर हिस्से को समय से पहले मौत की तरफ धकेल रहा है।"

अब कार्रवाई का है समय

वहीं, डॉक्टर हानीन ख्रीस ने चेताते हुए कहा, "संदेश बिल्कुल साफ है, हमें अपनी हवा को साफ करने के लिए इसी वक्त कदम उठाने होंगे। अब देर करने की गुंजाइश नहीं है।"

यहां सिर्फ समस्या पर प्रकाश डालना काफी नहीं था, यही वजह है कि शोधकर्ताओं ने दुनिया भर की सरकारों और नीति-निर्माताओं की मदद के लिए एक ओपन-एक्सेस इंटरैक्टिव टूल भी विकसित किया है। इसमें यातायात से होने वाले प्रदूषण को कम करने के 1,000 से अधिक उपायों का वैज्ञानिक मूल्यांकन उपलब्ध है।

इनमें लो-एमिशन जोन, सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा, इलेक्ट्रिक वाहन, साइकिल चलाने को बढ़ावा देना और भीड़भाड़ शुल्क जैसे उपाय शामिल हैं।

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सच कहें तो यह स्टडी रिपोर्ट खतरे को उजागर करते हुए हमें याद दिलाती है कि साफ हवा कोई लग्जरी नहीं, बल्कि जीने का बुनियादी हक है। अगर हम आज अपनी हवा के लिए नहीं लड़े, तो आने वाली पीढ़ियां इसकी कीमत अपनी सेहत और याददाश्त गंवाकर चुकाएंगी।

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