

हिमालय, जिसे कभी शुद्ध और जीवनदायी हवा का प्रतीक माना जाता था, अब इंसानी गतिविधियों से फैल रहे प्रदूषण की चपेट में आता दिख रहा है।
आर्यभट्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट ऑफ ऑब्जर्वेशनल साइंस के वैज्ञानिकों के नए अध्ययन ने खुलासा किया है कि उत्तराखंड के मुनस्यारी जैसे दूरस्थ पर्वतीय क्षेत्र की हवा में भी बेंजीन सहित कई जहरीले रसायन पहुंच चुके हैं।
अध्ययन के अनुसार, एलपीजी, डीजल, वाहनों, पर्यटन और निर्माण गतिविधियों से निकलने वाली नॉन-मीथेन हाइड्रोकार्बन गैसें अब हिमालयी वातावरण को प्रभावित कर रही हैं और ओजोन व सूक्ष्म कणों जैसे द्वितीयक प्रदूषकों के निर्माण में योगदान दे रही हैं।
हालांकि फिलहाल प्रदूषण का स्तर महानगरों जितना नहीं है और तत्काल स्वास्थ्य जोखिम सीमित हैं, लेकिन लंबे समय तक बेंजीन के संपर्क में रहने से कैंसर सहित गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है।
यह अध्ययन चेतावनी देता है कि यदि समय रहते प्रदूषण के स्रोतों पर नियंत्रण, वायु गुणवत्ता की सतत निगरानी और संवेदनशील हिमालयी क्षेत्रों के लिए विशेष नीतियां नहीं बनाई गईं, तो आने वाले वर्षों में हिमालय की स्वच्छ हवा केवल यादों तक सिमट सकती है।
कभी शुद्ध और ताजा हवा का प्रतीक माने जाने वाले हिमालय के दूरदराज के इलाके भी अब वायु प्रदूषण की चपेट में आ रहे हैं। चिंता की बात है कि हिमालय के ऊंचे पहाड़ी इलाकों में भी इंसानी गतिविधियों का धुआं पहुंच चुका है।
इस बारे में किए एक नए अध्ययन ने चेताया है कि उत्तराखंड का खूबसूरत पर्यटन स्थल मुनस्यारी अब प्रदूषण से अछूता नहीं रहा, जिससे आने वाले समय में स्थानीय लोगों और पर्यटकों के स्वास्थ्य को गंभीर खतरा हो सकता है।
हालांकि अध्ययन में इस बात की भी पुष्टि हुई है कि फिलहाल इसका स्वास्थ्य पर तत्काल खतरा कम है, लेकिन लंबे समय तक इस हवा में सांस लेना गंभीर बीमारियों, यहां तक कि कैंसर के जोखिम को भी बढ़ा सकता है।
क्यों दूषित हो रही है पहाड़ों की हवा?
यह अध्ययन आर्यभट्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट ऑफ ऑबर्जवेशनल साइंस के वैज्ञानिकों द्वारा किया गया है, जोकि विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) का स्वायत्त संस्थान है। इस अध्ययन के नतीजे प्रतिष्ठित जर्नल एनवायर्नमेंटल साइंस एंड पॉल्यूशन रिसर्च में प्रकाशित हुए हैं।
इस स्टडी के दौरान वैज्ञानिकों ने 2022-23 में उत्तराखंड के ऊंचाई पर बसे प्रसिद्ध पर्यटन स्थल मुनस्यारी की हवा का पूरे एक साल तक अध्ययन किया है।
इस दौरान वैज्ञानिकों ने विशेष रूप से नॉन-मीथेन हाइड्रोकार्बन (एनएमएचसी) नामक गैसों की निगरानी की। ये गैसें रसोई गैस (एलपीजी), डीजल, वाहनों, निर्माण कार्य और अन्य मानवीय गतिविधियों से निकलती हैं। यही गैसें वातावरण में ओजोन और सूक्ष्म कणों (सेकेंडरी ऐरोसोल्स) के निर्माण में भी अहम भूमिका निभाती हैं, जो जलवायु और मानव स्वास्थ्य दोनों के लिए नुकसानदेह हैं।
मौसम के साथ बदलता प्रदूषण का मिजाज
जांच में पाया गया कि सर्दियों और मानसून के दौरान तो यहां प्रदूषण का स्तर अपेक्षाकृत कम रहता है, लेकिन बसंत और पतझड़ के मौसम में हवा में इन हानिकारक गैसों की मात्रा काफी बढ़ जाती है। शोधकर्ताओं के अनुसार, मुनस्यारी जैसे दूर-दराज के इलाके में भी एलपीजी और डीजल का इस्तेमाल, बढ़ते वाहन, पर्यटन और निर्माण गतिविधियां वायु प्रदूषण के प्रमुख स्रोत बन रहे हैं।
शोध में यह भी सामने आया कि बेंजीन और जाइलीन जैसे सुगंधित हाइड्रोकार्बन बड़ी मात्रा में ओजोन जैसे सेकेंडरी प्रदूषकों के निर्माण में योगदान दे रहे हैं। ये प्रदूषक न केवल जलवायु परिवर्तन को प्रभावित करते हैं, बल्कि सांस और हृदय संबंधी बीमारियों का खतरा भी बढ़ाते हैं।
हालांकि मुनस्यारी में प्रदूषण का तात्कालिक स्तर दिल्ली या हल्द्वानी जैसे बड़े शहरों से कम है, और यह नैनीताल से थोड़ा ही अधिक है। लेकिन, यहां हवा में लगातार बढ़ रही 'बेंजीन' की मात्रा चिंता का विषय है।
बढ़ सकता है कैंसर का जोखिम
शोधकर्ताओं का कहना है कि यह अध्ययन साफ संकेत देता है कि इंसानी प्रदूषण अब हिमालय के उन हिस्सों तक भी पहुंच चुका है जिन्हें अब तक अपेक्षाकृत साफ माना जाता था। फिलहाल तत्काल स्वास्थ्य जोखिम सीमित हैं, लेकिन लंबे समय तक बेंजीन के संपर्क में रहने से कैंसर का खतरा अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा मानकों से अधिक हो सकता है।
वैज्ञानिकों का मानना है कि हिमालय जैसे संवेदनशील पारिस्थितिक क्षेत्रों में वायु गुणवत्ता की लगातार निगरानी, प्रदूषण के स्रोतों पर नियंत्रण और क्षेत्र-विशेष को ध्यान में रखते हुए प्रभावी नीतियां अब पहले से कहीं अधिक जरूरी हो गई हैं। ऐसे में यदि समय रहते कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में हिमालय की साफ हवा भी अतीत की बात बन सकती है।
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