

क्लोरपाइरीफॉस, एक आम कीटनाशक, पार्किंसन रोग के खतरे को बढ़ा सकता है।
यूसीएलए के वैज्ञानिकों के अध्ययन में पाया गया कि इसके लंबे समय तक संपर्क में रहने से दिमाग की कोशिकाएं क्षतिग्रस्त हो सकती हैं। अमेरिका में इसका उपयोग कम हो गया है, लेकिन कई देशों में अब भी इसका व्यापक उपयोग हो रहा है।
2003 के एक भारतीय अध्ययन में इसका स्तर विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा निर्धारित सीमा से 41 गुणा अधिक पाया गया था।
पार्किंसन एक धीरे-धीरे बढ़ने वाला तंत्रिका संबंधी रोग है, जिसमें हाथ-पैर कांपने लगते हैं, शरीर अकड़ने लगता है और चलने-फिरने में कठिनाई होती है। अकेले अमेरिका में ही करीब 10 लाख लोग इस बीमारी से जूझ रहे हैं।
खेतों और घरों के आसपास छिड़का जाने वाला एक आम कीटनाशक इंसानी दिमाग को धीरे-धीरे बीमार बना सकता है। एक नए वैज्ञानिक अध्ययन में सामने आया है कि क्लोरपाइरीफॉस के लंबे समय तक संपर्क में रहने से पार्किंसन का खतरा कई गुणा तक बढ़ सकता है।
यह अध्ययन कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, लॉस एंजिल्स (यूसीएलए) से जुड़े वैज्ञानिकों द्वारा किया गया है, जिसके नतीजे प्रतिष्ठित जर्नल मॉलिक्यूलर न्यूरोडीजेनेरेशन में प्रकाशित हुए हैं। अध्ययन न सिर्फ आंकड़ों के जरिए खतरे की पुष्टि करता है, बल्कि प्रयोगशाला में यह भी दिखाता है कि यह कीटनाशक दिमाग की उन कोशिकाओं को नुकसान पहुंचा सकता है जो शारीरिक गतिविधियों को नियंत्रित करती हैं।
पार्किंसन एक धीरे-धीरे बढ़ने वाला तंत्रिका संबंधी रोग है, जिसमें हाथ-पैर कांपने लगते हैं, शरीर अकड़ने लगता है और चलने-फिरने में कठिनाई होती है। अकेले अमेरिका में ही करीब 10 लाख लोग इस बीमारी से जूझ रहे हैं।
दुनिया में तेजी से पैर पसार रहा है यह रोग
ब्रिटिश मेडिकल जर्नल (बीएमजे) में प्रकाशित एक अन्य अध्ययन में सामने आया है कि अगले 24 वर्षों में पार्किंसंस के मामलों में नाटकीय रूप से बढ़ोतरी हो सकती है। अनुमान है कि 2050 तक दुनिया भर में ढाई करोड़ से ज्यादा लोग इस बीमारी से जूझ रहे होंगे। मतलब की यदि 2021 से तुलना करें तो इससे पीड़ित लोगों की संख्या बढ़कर दोगुनी से भी अधिक हो जाएगी।
गौरतलब है कि अब तक पार्किंसन को मुख्य रूप से आनुवंशिक बीमारी माना जाता था, लेकिन नए शोध बताते हैं कि पर्यावरण और खासकर कीटनाशक भी इसके बड़े कारण हो सकते हैं। क्लोरपाइरीफॉस दशकों तक खेती में बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होता रहा है।
अमेरिका में घरों में इसका इस्तेमाल 2001 से बंद हो चुका है, जबकि कृषि में 2021 में इसके उपयोग को सीमित कर दिया गया, लेकिन आज भी कई देशों में इसका बड़े पैमाने पर उपयोग हो रहा है।
कैसे हुआ अध्ययन?
अपने इस अध्ययन में वैज्ञानिकों ने पार्किंसन से पीड़ित 829 मरीजों और 824 स्वस्थ लोगों के आंकड़ों का विश्लेषण किया है। कैलिफोर्निया के कीटनाशक उपयोग संबंधी रिकॉर्ड और लोगों के घर-काम के पते देखकर यह आकलन किया गया कि कौन कितने समय तक इस कीटनाशक के संपर्क में रहा।
इसके बाद चूहों और जेब्राफिश पर प्रयोग किए गए। उन्हें उसी तरीके से कीटनाशक के संपर्क में रखा गया, जैसा इंसान आमतौर पर सांस के जरिए झेलता है।
क्या दर्शाते हैं निष्कर्ष?
निष्कर्ष दर्शाते हैं कि जिन लोगों के घरों के आसपास लंबे समय तक क्लोरपाइरीफॉस का संपर्क देखा गया, उनमें पार्किंसन का खतरा ढाई गुणा से अधिक पाया गया।
लैब में किए अध्ययन से पता चला कि इसकी वजह से चूहों में चलने-फिरने की दिक्कतें पैदा हुईं और दिमाग की डोपामिन बनाने वाली कोशिकाएं नष्ट होने लगीं, यही पार्किंसन की मुख्य पहचान होती है। इसके साथ ही दिमाग में सूजन बढ़ी और एक खतरनाक प्रोटीन (अल्फा-सिन्यूक्लिन) असामान्य रूप से जमा होने लगा, जो इस बीमारी से जुड़ा है।
वहीं जेब्राफिश पर प्रयोग से पता चला कि यह कीटनाशक दिमाग में क्षतिग्रस्त प्रोटीन को साफ करने वाली प्रक्रिया (ऑटोफैगी) को बिगाड़ देता है। इससे न्यूरॉन्स को नुकसान होता है, जिससे जहरीले प्रोटीन जमा होकर कोशिकाओं को मारने लगते हैं।
वैज्ञानिकों का मानना है कि अगर दिमाग की इस सफाई प्रणाली को मजबूत किया जाए, तो कीटनाशकों से होने वाले नुकसान से बचाव संभव हो सकता है।
साथ ही, जिन लोगों का कभी क्लोरपाइरीफॉस से ज्यादा संपर्क रहा है, उनकी नियमित न्यूरोलॉजिकल जांच फायदेमंद हो सकती है। वैज्ञानिकों का कहना है कि अमेरिका में हाल के वर्षों में क्लोरपाइरीफॉस का इस्तेमाल घटा है, लेकिन पहले बहुत से लोग इसके संपर्क में आ चुके हैं और आज भी ऐसे ही कई कीटनाशक दुनिया भर में बड़े पैमाने पर इस्तेमाल हो रहे हैं।
पर्यावरण के साथ-साथ स्वास्थ्य के लिए खतरा
यूसीएलए हेल्थ में न्यूरोलॉजी प्रोफेसर और इस अध्ययन से जुड़े वरिष्ठ शोधकर्ता डॉक्टर जेफ ब्रॉनस्टीन का प्रेस विज्ञप्ति में कहना है, “यह अध्ययन साफ तौर पर दर्शाता है कि क्लोरपाइरीफॉस पार्किंसन का एक ठोस पर्यावरणीय कारण है।“
उनके मुताबिक यह अध्ययन न केवल इनके बीच के सम्बन्ध को दर्शाता है, बल्कि यह भी साबित करता है कि यह कैसे नुकसान पहुंचाता है। इससे भविष्य में दिमाग को बचाने वाली नई दवाओं का रास्ता खुल सकता है।
बता दें कि अप्रैल 2025 में स्टॉकहोम कन्वेंशन के तहत जिनेवा में हुई बैठक में पेस्टीसाइड एक्शन नेटवर्क (पैन) इंटरनेशनल के वैज्ञानिकों और प्रतिनिधियों ने इस रासायनिक कीटनाशक को बिना किसी छूट के "परिशिष्ट ए" में शामिल करने की सिफारिश की थी।
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इसे “मध्यम रूप से खतरनाक” घोषित किया गया कीटनाशक क्लोरपाइरीफॉस आज भी भारत में कई फसलों पर इस्तेमाल हो रहा है। यह न सिर्फ किसानों और उपभोक्ताओं के लिए, बल्कि आने वाली पीढ़ियों और पूरे पर्यावरण के लिए भी गंभीर खतरा बना हुआ है।
इस मामले में पैन इंडिया के मुख्य कार्यकारी अधिकारी एडी दिलीप कुमार ने भारत में इसके असर पर बात करते हुए बताया था कि क्लोरोपाइरीफॉस के अवशेष कृषि उत्पादों, पानी, इंसानी रक्त और यहां तक कि स्तन दूध में भी पाए गए हैं।
2003 के एक भारतीय अध्ययन में इसका स्तर विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा निर्धारित सीमा से 41 गुणा अधिक पाया गया था।