प्रदूषण से बीमार पड़ता दिमाग: वैज्ञानिकों ने मोटर न्यूरॉन डिजीज के खतरे को किया उजागर

एक नए अध्ययन में सामने आया है कि लंबे समय तक वायु प्रदूषण के संपर्क में रहने से मोटर न्यूरॉन डिजीज जैसी गंभीर न्यूरोलॉजिकल बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है
फोटो: आईस्टॉक
फोटो: आईस्टॉक
Published on

हवा में घुला जहर सिर्फ फेफड़ों और दिल को ही नहीं, बल्कि दिमाग को भी धीरे-धीरे नुकसान पहुंचा रहा है। मतलब कि कहीं न कहीं वायु प्रदूषण का असर शरीर के भीतर और गहराई तक पहुंच रहा है।

स्वीडन के करोलिंस्का इंस्टीट्यूट से जुड़े वैज्ञानिकों द्वारा किए एक नए अध्ययन में सामने आया है कि लंबे समय तक दूषित हवा के संपर्क में रहने से दिमाग और नसों से जुड़ी गंभीर बीमारियों का जोखिम बढ़ सकता है। इस अध्ययन के नतीजे प्रतिष्ठित मेडिकल जर्नल जामा न्यूरोलॉजी में प्रकाशित हुए हैं।

अपने इस अध्ययन में शोधकर्ताओं ने वायु प्रदूषण और एमायोट्रॉफिक लेटरल स्क्लेरोसिस (एएलएस) जैसी न्यूरोलॉजिकल बीमारियों के बीच खतरनाक संबंध उजागर किया है।

क्या है मोटर न्यूरॉन डिजीज?

गौरतलब है कि एमायोट्रॉफिक लेटरल स्क्लेरोसिस, मोटर न्यूरॉन डिजीज (एमएनडी) का सबसे आम रूप है, जो करीब 85 से 90 प्रतिशत मामलों में पाया जाता है। मोटर न्यूरॉन डिजीज ऐसी गंभीर न्यूरोलॉजिकल बीमारी है जिसमें शरीर की स्वैच्छिक गतिविधियों को नियंत्रित करने वाली नसें धीरे-धीरे कमजोर होकर काम करना बंद कर देती हैं।

इसका नतीजा यह होता है मांसपेशियां सिकुड़ना शुरू कर देती हैं। इसकी वजह से उनमें कमजोर आ जाती है और लकवा तक मार सकता है।

यह भी पढ़ें
बच्चों की दिमागी बनावट पर असर डाल रहा वायु प्रदूषण, अमेरिकी अध्ययन में बड़ा खुलासा
फोटो: आईस्टॉक

शोधकर्ताओं के मुताबिक, यह संबंध उस देश में भी साफ दिखा है जहां वायु प्रदूषण का स्तर दुनिया के कई हिस्सों से काफी कम है। करोलिंस्का इंस्टीट्यूट और अध्ययन से जुड़ी शोधकर्ता जिंग वू का इस बारे में प्रेस विज्ञप्ति में कहना है, “स्वीडन में प्रदूषण का स्तर अपेक्षाकृत कम है, इसके बावजूद हमें स्पष्ट संबंध दिखाई देता है। यह दर्शाता है कि हवा की गुणवत्ता में सुधार लाना कितना जरूरी है।“

पर्यावरण की भूमिका पर पुख्ता संकेत

इन बीमारियों के सटीक कारण अभी तक पूरी तरह स्पष्ट नहीं हैं, लेकिन लंबे समय से माना जाता रहा है कि पर्यावरणीय कारकों की इसमें भूमिका हो सकती है। नया अध्ययन में सामने आया है कि वायु प्रदूषण भी ऐसा ही एक अहम कारण हो सकता है।

इस अध्ययन में स्वीडन के 1,463 मोटर न्यूरॉन डिजीज (एमएनडी) मरीजों की तुलना उनके 1,768 भाई-बहनों और 7,000 से ज्यादा आम लोगों से की गई। वैज्ञानिकों ने मरीजों के घरों के आसपास पिछले 10 वर्षों में मौजूद प्रदूषण के स्तर, जैसे पीएम2.5, पीएम10 और नाइट्रोजन डाइऑक्साइड का विश्लेषण किया।

यह भी पढ़ें
हवा में जहर, शरीर पर वार: रोग-प्रतिरोधक क्षमता को कमजोर कर रहा वायु प्रदूषण
फोटो: आईस्टॉक

हालांकि इन इलाकों में प्रदूषण का औसत स्तर विश्व स्वास्थ्य संगठन की सुरक्षित सीमा के आसपास ही था और बेहद प्रदूषित देशों की तुलना में काफी कम था।

30 फीसदी तक बढ़ा जोखिम

इस अध्ययन के नतीजे बेहद चौंकाने वाले रहे। वैज्ञानिकों के मुताबिक स्वीडन जैसे देशों में जहां प्रदूषण का स्तर अन्य देशों की तुलना में अपेक्षाकृत रूप से कम है, वहां भी लंबे समय तक दूषित हवा में रहने से मोटर न्यूरॉन डिजीज का खतरा 20 से 30 फीसदी तक बढ़ सकता है।

इसके अलावा, जो मरीज अधिक प्रदूषित इलाकों में रह रहे थे, उनमें बीमारी की पहचान के बाद मांसपेशियों और फेफड़ों की हालत तेजी से बिगड़ते देखी गई। ऐसे मरीजों में मृत्यु का खतरा भी अधिक रहा और उन्हें वेंटिलेटर जैसी गहन चिकित्सा की जरूरत पड़ने की आशंका भी अधिक पाई गई।

यह भी पढ़ें
विश्व मौसम संगठन की रिपोर्ट, भारत में स्वास्थ्य के साथ-साथ कृषि पैदावार पर असर डाल सकता है वायु प्रदूषण
फोटो: आईस्टॉक

करोलिंस्का इंस्टीट्यूट की प्रोफेसर कैरोलीन इंग्रे ने निष्कर्ष पर प्रकाश डालते हुए कहा है, “नतीजे दर्शाते हैं कि वायु प्रदूषण सिर्फ बीमारी की शुरुआत में ही नहीं, बल्कि उसके बढ़ने की रफ्तार पर भी असर डाल सकता है।“

जब शोधकर्ताओं ने केवल एमायोट्रॉफिक लेटरल स्क्लेरोसिस (एएलएस) के मरीजों पर अलग से विश्लेषण किया, तो परिणाम करीब-करीब वही रहे। यानी प्रदूषण और बीमारी के बीच संबंध और भी मजबूत दिखाई दिया।

हालांकि शोधकर्ताओं ने स्पष्ट किया है कि यह अध्ययन साबित नहीं करता कि प्रदूषण सीधे तौर पर इस बीमारी की वजह है, लेकिन वैज्ञानिकों का मानना है कि दूषित हवा नसों में सूजन और ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस पैदा कर सकती है, जो तंत्रिका तंत्र को धीरे-धीरे नुकसान पहुंचाता है।

यह भी पढ़ें
सांसों के साथ जहर: प्रदूषित हवा से महिलाओं में बढ़ रहा स्तन कैंसर का खतरा
फोटो: आईस्टॉक

हालांकि यह अध्ययन स्वीडन में किया गया है, जहां वायु प्रदूषण का स्तर अपेक्षाकृत रूप से कम है, लेकिन नतीजे संकेत देते हैं कि भारत जैसे देशों में, जहां वायु गुणवत्ता अक्सर डब्ल्यूएचओ मानकों से कई गुणा खराब रहती है, ऐसे स्वास्थ्य जोखिम और गंभीर हो सकते हैं।

यह शोध साफ संकेत देता है कि स्वच्छ हवा महज फेफड़ों की जरूरत नहीं, बल्कि दिमागी सेहत और जीवन की गुणवत्ता की भी बुनियाद है। ऐसे में भले ही आज वायु प्रदूषण को नजरअंदाज करना आसान लगे, लेकिन इसकी कीमत हमें आने वाले वर्षों में अपनी सेहत से चुकानी पड़ सकती है।

भारत में वायु गुणवत्ता से जुड़ी ताजा जानकारी आप डाउन टू अर्थ के एयर क्वालिटी ट्रैकर से प्राप्त कर सकते हैं।

Related Stories

No stories found.
Down to Earth- Hindi
hindi.downtoearth.org.in