

दुनिया की थाली पर एक बार फिर महंगाई का दबाव बढ़ने लगा है।
संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) के अनुसार, अगस्त 2026 में वैश्विक खाद्य मूल्य सूचकांक 1.9 फीसदी बढ़कर 133.3 अंक पर पहुंच गया। यह एक साल पहले की तुलना में भी 2.5 फीसदी अधिक है।
सबसे बड़ा झटका चीनी की कीमतों ने दिया, जो एक महीने में 11.9 फीसदी उछल गईं। गेहूं 2.6 फीसदी और मक्का 2.5 फीसदी महंगे हुए, जबकि डेयरी उत्पादों की कीमतों में 2.3 फीसदी और खाद्य तेलों में 0.6 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई।
इन बढ़ती कीमतों के पीछे सिर्फ बाजार की मांग नहीं, बल्कि बदलता मौसम और बढ़ते वैश्विक तनाव भी हैं।
यूरोप में गर्मी और सूखे से फसल व दूध उत्पादन प्रभावित हो रहा है, एशिया में अल नीनो का खतरा बढ़ रहा है और युद्ध व व्यापारिक बाधाएं खाद्य आपूर्ति की राह कठिन बना रही हैं।
भले ही खाद्य कीमतें मार्च 2022 के रिकॉर्ड से अभी 16.8 फीसदी नीचे हैं, लेकिन मौजूदा तेजी एक गंभीर चेतावनी है। क्योंकि महंगाई का असर आखिरकार आंकड़ों में नहीं, करोड़ों परिवारों की रसोई और रोज की थाली में दिखाई देता है।
महंगाई से जूझ रहे आम आदमी के लिए वैश्विक खाद्य बाजार से एक बार फिर चिंताएं बढ़ाने वाली खबर सामने आई है।
अगस्त 2026 में वैश्विक खाद्य कीमतों में 1.9 फीसदी की बढ़ोतरी हुई, जिससे आने वाले महीनों में खाने-पीने की चीजों की कीमतों पर दबाव बढ़ने की आशंका है। संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) के अनुसार, अगस्त में वैश्विक खाद्य मूल्य सूचकांक 133.3 अंकों पर पहुंच गया, जो जुलाई के स्तर से 1.9 फीसदी अधिक है। वहीं एक साल पहले की तुलना में भी यह सूचकांक 2.5 फीसदी ऊपर बना हुआ है।
एफएओ के मुख्य अर्थशास्त्री मैक्सिमो टोरेरो का इस बारे में कहना है, “वैश्विक खाद्य बाजार में एक बार फिर जोखिम बढ़ रहा है। जलवायु संकट, भू-राजनीतिक तनाव और व्यापार मार्गों में रुकावटें मिलकर खाद्य आपूर्ति को प्रभावित कर रही हैं। इसका सबसे सीधा असर उन परिवारों पर पड़ सकता है जिनकी आय का बड़ा हिस्सा रोजमर्रा के भोजन पर खर्च होता है।"
चीनी से गायब हुई मिठास, कीमतों में 11.9 फीसदी का उछाल
अगस्त में खाद्य कीमतों के मामले में सबसे बड़ा झटका चीनी ने दिया। एफएओ का चीनी मूल्य सूचकांक एक महीने में 11.9 फीसदी उछलकर 106.4 अंक पर पहुंच गया। जून 2025 के बाद देखें तो यह अपने उच्चतम स्तर पर है।
एफएओ ने अपनी रिपोर्ट में जानकारी दी है कि यूरोपीय यूनियन में गर्म और शुष्क मौसम के कारण चुकंदर की पैदावार घटने की आशंका है। एशिया के प्रमुख उत्पादक देशों में अल नीनो से जुड़े मौसम संबंधी खतरे भी उत्पादन पर असर डाल रहे हैं। वहीं, ब्राजील के प्रमुख गन्ना उत्पादक क्षेत्र में कम उत्पादन और भारत द्वारा कच्ची चीनी के शुल्क-मुक्त आयात की घोषणा ने भी वैश्विक बाजार में कीमतों को ऊपर धकेला है।
चीनी की कीमतों पर एक साथ कई तरफ से दबाव बन रहा है, जिसमें मौसम की मार, उत्पादन में कमी और बदलता वैश्विक व्यापार प्रमुख कारण हैं।
गेहूं 2.6 फीसदी महंगा, एक साल में 15 फीसदी बढ़ी कीमतें
रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि अनाज की कीमतों में भी तेजी आई है। एफएओ अनाज मूल्य सूचकांक अगस्त में 2.2 फीसदी बढ़कर 116.3 अंकों पर पहुंच गया। यह मई 2024 के बाद इसका सबसे ऊंचा स्तर है। इसमें सबसे बड़ी चिंता गेहूं को लेकर सामने आई है। अगस्त में अंतरराष्ट्रीय बाजार में गेहूं की कीमतों में 2.6 फीसदी की वृद्धि हुई और वे एक साल पहले की तुलना में 15 फीसदी से अधिक हो गई है।
इसके कारणों पर नजर डालें तो यूरोप के कई हिस्सों में गर्मी और सूखे से उत्पादन की संभावनाएं कमजोर हुई हैं। वहीं, काला सागर क्षेत्र से निर्यात की लॉजिस्टिक बाधाएं बनी हुई हैं। कमजोर अमेरिकी डॉलर ने भी डॉलर में कारोबार होने वाले गेहूं को खरीदारों के लिए अपेक्षाकृत आकर्षक बनाया, जिससे मांग बढ़ी है।
गेहूं की कीमतों में यह तेजी दुनिया के उन करोड़ों लोगों के लिए बेहद मायने रखती है जिनकी थाली में रोटी, ब्रेड और अन्य गेहूं आधारित खाद्य पदार्थ रोज शामिल होते हैं।
मक्का भी महंगा, होर्मुज और यूक्रेन संकट का दिखा असर
अगस्त में अंतरराष्ट्रीय बाजार में मक्के की कीमतों में 2.5 फीसदी की बढ़ोतरी हुई। अमेरिका के प्रमुख मक्का उत्पादक क्षेत्रों में पैदावार को लेकर चिंता, यूरोपीय संघ में गर्मी और सूखे तथा इथेनॉल और पशु आहार की मजबूत मांग ने कीमतों को सहारा दिया है। इसके अलावा होर्मुज के बंद होने से कृषि इनपुट की आपूर्ति लेकर चिंताएं बढ़ी हैं, जबकि यूक्रेन के निर्यात में बाधाओं ने भी बाजार पर दबाव डाला है।
इस दौरान जौ की कीमत 2.6 फीसदी और ज्वार की कीमत 3.9 फीसदी बढ़ी है। वहीं धान की कीमतों में अपेक्षाकृत कम, 0.5 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई, जिसका कारण एशिया और अफ्रीका के देशों की लगातार खरीद और आपूर्ति को लेकर चिंता रही।
लगातार तीसरे महीने महंगा हुआ खाद्य तेल
रुझानों से पता चला है कि वनस्पति तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव को दिखाने वाले सूचकांक में अगस्त के दौरान 0.6 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई, जिसके बाद सूचकांक बढ़कर 196.9 अंक पर पहुंच गया।
चिंता की बात यह है कि लगातार तीसरे महीने खाद्य तेल की कीमतों में बढ़ोतरी दर्ज की गई है। इसके साथ ही कीमतें जून 2022 के बाद अब तक के उच्चतम स्तर पर हैं।
वहीं पाम और सोया तेल की कीमतों में वृद्धि ने सूरजमुखी और रेपसीड तेल की कीमतों में आई मामूली गिरावट को पीछे छोड़ दिया। दक्षिण-पूर्व एशिया में अल नीनो से जुड़े मौसम के असर के कारण पाम तेल के उत्पादन को लेकर चिंताएं बढ़ी है।
दुनिया के बाजार में तेल महंगा होने का असर सिर्फ रसोई तक सीमित नहीं रहता। ऐसे में खाद्य तेल की कीमतें बढ़ने से घरों के बजट के साथ-साथ पैकेज्ड फूड और कई अन्य खाद्य उत्पादों की लागत भी प्रभावित हो सकती है।
दूध की आपूर्ति घटी तो डेयरी की कीमतों में आया 2.3 फीसदी का उछाल
डेयरी उत्पादों की कीमतों में बदलाव को दर्शाने वाला सूचकांक अगस्त में 2.3 फीसदी बढ़कर 119.2 अंक पर पहुंच गया। यह चार महीने में पहली वृद्धि है।
कारणों पर नजर डालें तो यूरोप में कई प्रमुख दुग्ध उत्पादक क्षेत्रों में गर्मी और शुष्क मौसम के कारण दूध की आपूर्ति घटी है। इसके चलते स्किम्ड मिल्क पाउडर की कीमत 3 फीसदी और होल मिल्क पाउडर की कीमत 2.4 फीसदी बढ़ गई। पनीर की कीमतों में भी 2.7 फीसदी का उछाल दर्ज किया गया।
हालांकि, डेयरी कीमतें अभी भी एक साल पहले के स्तर से 21.7 फीसदी नीचे हैं।
एफएओ मांस मूल्य सूचकांक में अगस्त में एक प्रतिशत की वृद्धि हुई। इस दौरान पोल्ट्री, सूअर और भेड़ के मांस की कीमतें बढ़ी हैं।
संकट अभी 2022 के रिकॉर्ड से नीचे, लेकिन तेजी से बढ़ रहा खतरा
रिपोर्ट की माने तो भले ही अगस्त में खाद्य कीमतों में तेजी आई है, फिर भी एफएओ खाद्य मूल्य सूचकांक मार्च 2022 के रिकॉर्ड स्तर से 16.8 फीसदी नीचे है। लेकिन मौजूदा रुझान एक गंभीर संकेत जरूर दे रहे हैं।
एक तरफ दुनिया जलवायु परिवर्तन के कारण गर्मी, सूखे और अनिश्चित मौसम का सामना कर रही है, तो दूसरी तरफ युद्ध और भू-राजनीतिक तनाव महत्वपूर्ण व्यापार मार्गों और आपूर्ति श्रृंखलाओं को प्रभावित कर रहे हैं। ऐसे में खाद्य बाजारों में कीमतों का बढ़ना केवल आर्थिक आंकड़ा नहीं है, यह करोड़ों परिवारों की रसोई और खाने की थाली पर बढ़ता दबाव है।
कुल मिलकर कहें तो अगस्त में खाद्य कीमतों में 1.9 फीसदी की बढ़ोतरी भले ही बहुत बड़ी छलांग न लगे, लेकिन इसके पीछे छिपे संकेत गंभीर हैं। चीनी 11.9 फीसदी, गेहूं 2.6 फीसदी, मक्का 2.5 फीसदी और डेयरी उत्पाद 2.3 फीसदी महंगे हुए हैं। यानी दुनिया की थाली पर एक साथ कई तरफ से दबाव बढ़ रहा है।
गर्मी और सूखा फसलों और पशुधन को प्रभावित कर रहे हैं, अल नीनो उत्पादन की चिंता बढ़ा रहा है और युद्ध व व्यापारिक बाधाएं खाद्य आपूर्ति की राह रोक रही हैं।
ऐसे में सवाल सिर्फ यह नहीं है कि अगले महीने चीनी, आटा या तेल कितना महंगा होगा, बल्कि यह है कि बदलते मौसम और बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के बीच दुनिया अपनी थाली को कितनी सुरक्षित रख पाएगी।
मार्च 2022 के रिकॉर्ड से कीमतें अभी 16.8 फीसदी नीचे हैं, लेकिन मौजूदा तेजी चेतावनी दे रही है, अगर जलवायु संकट और आपूर्ति बाधाओं का समाधान नहीं हुआ, तो महंगाई का अगला मोर्चा बाजार नहीं, सीधे करोड़ों लोगों की रसोई हो सकती है।