कीटनाशकों का जैव विविधता पर बढ़ता संकट, खतरा 50 प्रतिशत कम करने का वादा दूर की कौड़ी

साल 2013 से 2019 के वैश्विक आंकड़े बताते हैं कि कीटनाशकों की मात्रा और विषाक्तता दोनों बढ़ने से पर्यावरणीय खतरा काफी बढ़ गया है
फल, सब्जियां, अनाज, मक्का, सोयाबीन और चावल मिलकर कुल कीटनाशक विषाक्तता का लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा बनाते हैं।
फल, सब्जियां, अनाज, मक्का, सोयाबीन और चावल मिलकर कुल कीटनाशक विषाक्तता का लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा बनाते हैं।फोटो साभार: आईस्टॉक
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सारांश
  • शोध में 625 कीटनाशकों और आठ जीव समूहों पर उनके पर्यावरणीय प्रभाव का विस्तृत विश्लेषण किया गया।

  • फल, सब्जियां, अनाज, मक्का, सोयाबीन और चावल मिलकर कुल कीटनाशक विषाक्तता का लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा बनाते हैं।

  • ब्राजील, चीन, अमेरिका और भारत दुनिया भर में कीटनाशक विषाक्तता में सबसे बड़े जिम्मेवार देशों के रूप में सामने आए।

  • मौजूदा रुझानों के अनुसार केवल चिली के 2030 तक संयुक्त राष्ट्र लक्ष्य पूरा करने की संभावना जताई गई।

साल 2022 में कनाडा के मांट्रियल शहर में 15वां संयुक्त राष्ट्र जैव विविधता सम्मेलन (कॉप-15) आयोजित हुआ। इस सम्मेलन में दुनिया के कई देशों ने एक अहम वादा किया था। उन्होंने यह तय किया कि साल 2030 तक खेती में इस्तेमाल होने वाले कीटनाशकों से होने वाले खतरे को 50 प्रतिशत तक कम किया जाएगा। इसका उद्देश्य पर्यावरण, जानवरों, पौधों और इंसानों की सेहत को बचाना था।

लेकिन हाल ही में साइंस नाम की वैज्ञानिक पत्रिका में प्रकाशित एक नए अध्ययन ने चिंता बढ़ा दी है। यह अध्ययन जर्मनी के कैसरस्लॉटर्न-लांडाउ विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने किया है। इस शोध के अनुसार, दुनिया अभी इस लक्ष्य से बहुत दूर है और स्थिति लगातार खराब होती जा रही है।

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नया तरीका, नई समझ

इस अध्ययन का सबसे खास पहलू यह है कि वैज्ञानिकों ने कीटनाशकों के खतरे को मापने का एक नया तरीका अपनाया। आमतौर पर यह देखा जाता है कि कितनी मात्रा में कीटनाशक इस्तेमाल हो रहे हैं। लेकिन इस शोध में सिर्फ मात्रा नहीं, बल्कि यह भी देखा गया कि कौन सा कीटनाशक कितना जहरीला है।

इस तरीके को “एप्लाइड टॉक्सिसिटी” यानी “लागू की गई विषाक्तता” कहा गया है। इसका मतलब किसी देश में खेती के दौरान जितने कीटनाशक इस्तेमाल हो रहे हैं और वे पर्यावरण के लिए कितने खतरनाक हैं, दोनों को जोड़कर खतरों को मापना है।

वैज्ञानिकों के अनुसार, यह तरीका हमें पहली बार यह समझने में मदद करता है कि कीटनाशक जैव विविधता के लिए असल में कितना बड़ा खतरा हैं

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क्या कहते हैं आंकड़े?

शोध में 2013 से 2019 तक के दुनिया भर के आंकड़ों का अध्ययन किया गया। इसमें 625 अलग-अलग कीटनाशकों को शामिल किया गया और पौधों व जानवरों के आठ समूहों पर उनके प्रभाव को देखा गया।

नतीजे बहुत चिंताजनक हैं। इस अवधि में दुनिया भर में कीटनाशकों की “लागू की गई विषाक्तता” में काफी वृद्धि हुई है। इसके दो मुख्य कारण हैं। पहला, खेती की जमीन बढ़ रही है और खेती पहले से ज्यादा तीव्र हो गई है। दूसरा, अब ज्यादा जहरीले कीटनाशकों का इस्तेमाल किया जा रहा है, खासकर कीटों को मारने वाले कीटनाशक।

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किन जीवों पर सबसे ज्यादा असर?

इस अध्ययन में पाया गया कि जमीन पर रहने वाले कीट, मिट्टी में रहने वाले जीव और मछलियां सबसे ज्यादा प्रभावित हो रही हैं। ये सभी जीव प्रकृति के संतुलन के लिए बहुत जरूरी हैं।

कुछ मामलों में थोड़े अच्छे संकेत भी मिले। जैसे जलीय कीड़े, परागण करने वाले कीट (जैसे मधुमक्खियां) और कुछ पौधों पर खतरा थोड़ा कम हुआ है। लेकिन कुल मिलाकर नुकसान ज्यादा है।

केवल दो समूह - जलीय पौधे और जमीन पर रहने वाले रीढ़धारी जानवर ऐसे थे जिनमें विषाक्तता में कमी देखी गई।

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कौन से देश सबसे ज्यादा जिम्मेदार?

शोध के अनुसार, ब्राजील, चीन, अमेरिका और भारत दुनिया भर में कीटनाशकों की विषाक्तता के लिए सबसे अधिक जिम्मेवार हैं। वहीं नाइजीरिया जैसे देशों में अभी स्तर कम है, लेकिन वैज्ञानिकों का कहना है कि भविष्य में वहां भी खतरा बढ़ सकता है क्योंकि खेती तेजी से बदल रही है।

दुनिया भर में फल, सब्जियां, मक्का, सोयाबीन, अनाज और चावल की खेती से लगभग 80 प्रतिशत कीटनाशक विषाक्तता जुड़ी हुई है।

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लक्ष्य से बहुत दूर दुनिया

यदि मौजूदा रुझान जारी रहा, तो वैज्ञानिकों का अनुमान है कि सिर्फ चिली ही 2030 का संयुक्त राष्ट्र लक्ष्य पूरा कर पाएगा। चीन, जापान और वेनेज़ुएला में थोड़ी सुधार की प्रवृत्ति दिखी है, लेकिन जर्मनी सहित अधिकतर देशों को अपनी दिशा पूरी तरह बदलनी होगी।

जर्मनी जैसे देशों को कीटनाशकों के खतरे को 15 साल पुराने स्तर तक लाना होगा, जो आसान नहीं है।

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समाधान क्या है?

वैज्ञानिकों का मानना है कि कुछ ही (लगभग 20) अत्यधिक जहरीले कीटनाशक सबसे ज्यादा नुकसान कर रहे हैं। यदि इन्हें कम जहरीले विकल्पों से बदला जाए, तो बड़ा फर्क पड़ सकता है।

इसके अलावा जैविक खेती को बढ़ावा देना, खेती की योजना बेहतर बनाना और हर देश द्वारा हर साल कीटनाशकों के इस्तेमाल का सही आंकड़ा साझा करना बहुत जरूरी है।

यह अध्ययन साफ दिखाता है कि अगर तुरंत और मिलकर कदम नहीं उठाए गए, तो 2030 तक कीटनाशकों से होने वाले खतरे को आधा करने का सपना अधूरा रह जाएगा। जैव विविधता को बचाने के लिए अब सिर्फ वादे नहीं, बल्कि ठोस और तेज कार्रवाई की जरूरत है।

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